Sunday, November 18, 2018

मूली की उन्नत खेती।


मूली, सलाद के रूप में उपयोग की जाने वाली सब्जी है। उत्पत्ति स्थान भारत तथा चीन देश माना जाता है। सम्पूर्ण देश में विशेषकर गृह उद्यानों में उगाई जाती है। मूली में गंध सल्फर तत्व के कारण होती है। इसे क्यारियों की मेड़ों पर भी उगा सकते हैं। बीज बोने के 1 माह में तैयार हो जाती है। फसल अवधि 40-70 दिनों की है। सलाद में एक प्रमुख स्थान रखने वाली मूली स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत लाभकारी, गुणकारी महत्व रखती है। साधारणतः इसे हर जगह आसानी से लगाया जा सकता है।

जलवायु
मूली अधिक तापमान के प्रति सहन शील है किन्तु सुगंध विन्यास और आकार के लिए ठंडी जलवायु कि आवश्यकता होती है अधिक तापमान के कारण जड़ें कठोर और चरपरी हो जाती है मूली कि सफल खेती के लिए 10-15 डिग्री सेल्सियस तापमान सर्वोत्तम माना गया है आज के समय में यह कहना कि मूली सिर्फ इसी मौसम में लगाई जाती है या लगाई जाना चाहिए, उचित नहीं होगा, क्योंकि मूली हमें हर मौसम व समय में उपलब्ध हो जाती है।

भूमि
मूली के उत्तम उत्पादन के लिए रेतीली दोमट और दोमट भूमि अधिक उपयुक्त रहती है मटियार भूमि मूली कि फसल उगाने के लिए अनुपयुक्त रहती है क्योंकि इस में भूमि ऐसी जड़ों का समुचित विकास नहीं हो पाता है ।बीज उत्पादन के लिए ऐसी भूमि का चुनाव करना चाहिए जिसमें पानी के निकास की उचित व्यवस्था हो एवं फसल के लिए प्रर्याप्त मात्रा में जैविक पदार्थ उपलब्द्य हो। मृदा गहराई तक हल्की, भुरभुरी व कठोर परतों से मुक्त होनी चाहिए। उसी खेत का चयन करें जिसमें पिछले एक वर्ष में बोई जाने वाली किस्म के अलावा कोई दुसरी किस्म बीज उत्पादन के लिए ना उगाई गई हो। इसकी फसल के लिए खेत सर्वोत्तम पी.एच. मान 6-7 होता है। खेत खरपतवारों व अन्य फसलों के पौद्यों से मुक्त होना चाहिए। खेत की मृदा रोगों व कीटों से मुक्त होनी चाहिए।

भूमि की तैयारी
5-6 जुताई कर खेत को तैयार किया जाए। मूली के लिए गहरी जुताई कि आवश्यकता होती है क्योंकि इसकी जड़ें भूमि में गहरी जाती है गहरी जुताई के लिए ट्रेक्टर या मिटटी पलटने वाले हल से जुताई करें इसके बाद दो बार कल्टीवेटर चलाएँ जुताई के बाद पाटा अवश्य लगाएं

उन्नत किस्म
अन्य फसलों व सब्जियों की ही तरह मूली की भरपूर पैदावार के लिए आवश्यक होता है कि कृषक भाई उन्नत जाति का चयन करें। मूली की उन्नत किस्मों में प्रमुख हैं- पूसा हिमानी, पूसा चेतवी, पूसा रेशमी, हिसार मूली नं. 1, पंजाब सफेद, रैपिड रेड, व्हाइट टिप आदि। पूसा चेतवी जहाँ मध्यम आकार की सफेद चिकनी मुलायम जड़ वाली है, वहीं यह अत्यधिक तापमान वाले समय के लिए भी अधिक उपयुक्त पाई गई है। इसी तरह पूसा रेशमी भी अधिक उपयुक्त है तथा अगेती किस्म के रूप में विशष महत्वपूर्ण है। इसी तरह अन्य किस्में भी अपना विशेष महत्व रखती हैं तथा हर जगह, हर समय लगाई जा सकती हैं।

बोने का समय
मूली साल भर उगाई जा सकती है फिर भी व्यवसायिक स्तर पर इसे मैदानों में सितम्बर से जनवरी तक और पहाड़ों में मार्च से अगस्त तक बोया जाता है साल भर मूली उगाने के मूली का प्रजातियों के अनुसार उनकी बुवाई का समय का चुनाव किया जाता है जैसे कि मूली की पूसा रश्मि पूसा हिमानी का बुवाई का समय मध्य सितम्बर है तथा जापानी सफ़ेद एवं व्हाईट आइसीकिल किस्म कि बुवाई का समय मध्य अक्टूम्बर है तथा पूसा चैत्की कि बुवाई मार्च के अंत समय में करते है तथा पूसा देशी किस्म कि बुवाई अगस्त माह के मध्य समय  ।

बीज की मात्रा
मूली की एक हैक्टेयर खेती के लिए 5-10 किग्रा बीज पर्याप्त होता है। मूली की बुवाई खेत की मेढ़ों पर की जाती है। यहाँ मेढ़ों के बीच की दूरी 45 सेमी तथा ऊँचाई 22-25 सेमी रखी जाती है। किसान भाई यह अवश्य ध्यान रखें कि मूली के बीजों का बीजोपचार अवश्य हो। इसके लिए गौमूत्र 5 ली. प्रति किग्रा बीज के हिसाब से उपयोग कर सकते हैं।

खाद एवं उर्वरक
50 क्विंटल गोबर की खाद या कम्पोस्ट, 20 किलो नीम की खली बुबाई के समय तथा 15 दिनों के पश्चात् 10 ली. गौमूत्र में 250 नीम का काड़ा, 250 ग्राम लहसुन का पेस्ट 15 ग्राम हींग मिलकर 4 दिनों तक छाया में रख दें बाद में उसे छान कर 200 ग्राम लाल मिर्च का पाउडर डाल दें ( छिड्काब करनें के 10 घंटे पहले )६० ली. पानी मिलकर तर बतर कर छिड्काब करें
रासायनिक काद की दशा में 75 किग्रा नत्रजन, 40 किग्रा फास्फोरस तथा 40 किग्रा पोटाश देना चाहिए। गोबर व गोबर कचरे से बनी कम्पोस्ट खाद खेत की तैयारी के समय ही डाल देना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा तथा पोटाश व फास्फोरस की पूरी मात्रा अंतिम जुताई में दे देना चाहिए तो लाभकारी होता है।

सिचाई
वर्षा ऋतू कि फसल में सिचाई कि कोई आवश्यकता नहीं है गर्मी वाली फसल में ४-५ दिन के अंतर से सिचाई करें जबकि सर्दी वाली फसल में १० से १५ दिन के अंतर से सिचाई करनी चाहिए ।

खरपतवार नियंत्रण
खरपतवारों के नियंत्रण के लिए खेत की 2-3 बार निराई-गुङाई करें दूसरी निराई-गुङाई करने के समय पौधों की छटनी कर दें समय पर डौली से ऊपर निकली जङों को ढक दें । साथ ही मेढ़ों पर मिट्टी भी चढ़ाते रहना चाहिए।

कीट नियंत्रण
मूली की फसल पर एफिड, सरसों की मक्खी, पत्ती काटने वाली सूँडी अधिक हानि पहुँचाती है ।

रोकथाम
इसकी रोकथाम के लिए देसी गाय का मूत्र 5 लीटर लेकर 15 ग्राम के आकार के बराबर हींग लेकर पिस कर अच्छी तरह मिलाकर घोल बनाना चाहिए प्रति 2 ली. पम्प के द्वारा तर-बतर कर छिडकाव करे ।

रोग नियंत्रण
आमतौर पर मूली की फसल पर कोई रोग नहीं लगता है कभी-कभी रतुआ का प्रकोप हो जाता है ।

रोकथाम
इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा या गोमूत्र  तम्बाकू मिलाकर पम्प के द्वारा तर-बतर कर छिडकाव करे ।

खुदाई
पूरी बड़ी मूली जब वह नरम व कोमल हो निकालें क्योंकि देरी से विशेषकर यूरोपियन टाईप कि मूली की जड़ों में पिथ बन जाता है जिसका बाजार में भाव कम मिलता है यूरोपियन किस्मों को बोने के २५-३० दिन बाद निकालना शुरू कर दें एशियाई टाईप की मूली 40-50 दिन बाद निकालना शुरू करें ।

उपज
मूली उपज भूमि की उर्वरा शक्ति उसकी उगे जाने वाली जातियों और फसल की देख-भाल पर निर्भर करती है यूरोपियन जातियों से 80-100 क्विंटल और एशियाई जातियों से 250-300 क्विंटल प्रति हे.उपज मिल जाती है।

Sunday, November 11, 2018

आलू में लगने वाले प्रमुख रोग व कीट एवं उनका प्रबंधन.



1) महू या चेंपा (Aphids)
यह गहरे हरे या काले रंग के होते है प्रौढ़ अवस्था में यह दो प्रकार के होते है पंखदार और पंख  हिन् इसके अवयस्क और प्रौढ़ दोनों ही पत्तियों और शाखाओं का रस चूसते है अधिक प्रकोप होने पर पत्तियां निचे की ओर मुड जाती है और पीली पड़कर सुख जाती है इसकी पंखदार जाती विषाणु फ़ैलाने में सहायता करती है माहुं कीट एक सर्वव्यापी व बहुभक्षी कीट है। ये रस चूसने वाले कीट की श्रेणी में आते हैं।

2) माइजस परसिकी (Myzus
persicae) व एफिस गौसिपी (Aphis gossypii) नामक मांहू आलू की फसल पर प्रत्यक्ष रूप से तो ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाते परंतु ये विषाणुओं को फैलाते हैं। रोग मुक्त बीज आलू उत्पादन में ये कीट प्रमुख बाधक हैं।

रोकथाम के उपाय
हमारे देश के गंगा के मैदानी इलाकों में ही लगभग 90 बीज % आलू की खेती की जाती है। इन क्षेत्रों में बीज आलू की फसल माहुं रहित अवधि में करनी चाहिए। बीज आलू की फसल तथा अन्य सब्जियों की फसल के बीच कम 50 मीटर की दूरी रखें। खेतों में या आसपास उगे माहुं ग्रसित पौधों, विशेषकर पीले रंग के फूल वाले
पौधो को उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए। जैसे हि प्रति 100 पत्तियों पर माहुं की संख्या 20 से ज्यादा होने लगे तो फसल के डंठलों को काट दें।

उपचार
देसी गाय का 5 लीटर मट्ठा लेकर उसमे 5 किलो नीम कि पत्ती या 2 किलोग्राम नीम कि खली या 2 किलोग्राम नीम की पत्त्ती एक बड़े मटके में 40-50 दिन भरकर तक सडा कर - सड़ने के बाद उस मिश्रण में से 5 लीटर मात्रा को 200 लीटर पानी में डालकर अच्छी तरह मिलाकर तर बतर कर प्रति एकड़ छिड़काव करे

3) कुतरा
इस किट कि सुंडिया आलू के पौधों और शाखाओं और उगते हुए कंदों को काट देती है बाद कि अवस्था में इसकी सुंडी आलुओं में छेद कर देती है जिससे कंदों का बाजार भाव कम हो जाता है यह किट रात में फसल को क्षति पहुंचाती है .

उपचार
10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ की पत्ती 2किलो नीम की पत्ती 2किलो बेसरम की पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे .

4) व्हाईटगर्ब
इसे कुरमुला कि संज्ञा भी दी जाती है जो सफ़ेद या सलेटी रंग कि होती है इसका शरीर मुडा हुआ और सर भूरे रंग का होता है यह जमीन के अन्दर रहकर पौधों कि जड़ो को क्षति पहुंचता है इसके अतिरिक्त आलू में छिद्र कर देती है जिसके कारण आलू का बाजार भाव कम हो जाता है .

उपचार
10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ कि पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे .

5) एपिलेकना
यह छोटा , पीलापन लिए हुए भूरे रंग का किट है इसक पीठ का भाग उठा हुआ होता है जिस पर काफी बिंदिया पाई जाती है अवयस्क और प्रौढ़ किट दोनों ही क्षति पहुंचे है पौधों कि पत्तियों को किट इस के बच्चे धीरे धीरे खुरच कर खा जाते है और पत्तियां सुख जाती है .

उपचार
10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ की पत्ती 2किलो नीम की पत्ती 2किलो बेसरम की पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे

रोग एवं उपचार

1) अगेतीअंगमारी
यह रोग आल्तेरनेरिया सोलेनाई नामक फफूंदी के कारण लगता है उत्तरी भारत में इस रोग का आक्रमण शरद ऋतू के फसल पर नवम्बर में और बसंत कालीन फसल में फरवरी में होता है यह रोग कंद निर्माण से पहले ही लग सकता है निचे वाली पत्तियों पर सबसे पहले प्रकोप होता है जंहा से रोग बाद में ऊपर कि ओर बढ़ता है पत्तियों पर छोट छोटे गोल अंडाकार या कोणीय धब्बे बन जाते है जो भूरे रंग के होते है ये धब्बे सूखे एवं चटकने वाले होते है बाद में धब्बे के आकार में बृद्धि हो जाती है जो पूरी पत्ती को ढक लेती है रोगी पौधा मर जाता है .

उपचार
10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ की पत्ती 2किलो नीम की पत्ती 2किलो बेसरम की पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे

2) पछेती अंगमारी
यह रोग फाइटो पथोरा इन्फैस्तैन्स नामक फफूंदी के द्वारा होता है इस रोग में पत्तियों कि शिराओं , तानो डंठलो पर छोटे भूरे रंग के धब्बे उभर आते है जो बाद में काले पड़ जाते है और पौधे के भूरे भाग गल सड़ जाते है रोकथाम में देरी होने पर आलू के कंद भूरे बैगनी रंग में परवर्तित होने के उपरांत गलने शुरू हो जाते है .

उपचार
10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ की पत्ती 2किलो नीम की पत्ती 2किलो बेसरम की पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे 500 ग्राम लहसुन और 500 ग्राम तीखी चटपटी हरी मिर्चलेकर बारीक़ पीसकर 200 लीटर पानी में घोलकर थोडा सा शैम्पू झाग के लिए मिलाकर तर बतर कर अच्छी तरह छिड़काव प्रति एकड़ करे .

3) काली रुसी ब्लैक स्कर्फ
यह रोग राइजोक्टोनिया सोलेनाई नामक फफूंदी के कारण होता है इस रोग का आक्रमण मैदानी या पर्वतीय क्षेत्र में होता है रोगी कंदों प़र चाकलेटी रंग के उठे हुए धब्बो का निर्माण हो जाता है जो धोने से साफ नहीं होते है है इस फफूंदी का प्रकोप बुवाई के बाद आरम्भ होता है जिससे कंद मर जाते है और पौधे दूर दूर दिखाई पड़ते है .

उपचार
10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ की पत्ती 2किलो नीम की पत्ती 2किलो बेसरम की पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे भूमि जनित बीमारी जड़ सडन रोग , दीमक आदि के लिए अरंडी कि खली
और नीम खाद अपने खेतो में प्रयोग करें।

जड़ युक्त सब्जियों की जैविक खेती।


हमारे जीवन में हरी पत्तेदार व जड़ वाली सब्जियों का महत्व है। जिसमें शलजम, मूली, गाजर,  अरबी, कमल आदि अति आवश्यक है, जिसका अनुमान हम इस तथ्य से स्पष्ट कर सकते हैं कि विश्व में लगभग 46 करोड़ लोग कुपोषण के शिकार हैं। भारत में कुल जनसंख्या का बहुत बड़ा हिस्सा, विशेषकर महिलाए तथा बच्चे कुपोषण से ग्रस्त हैं, जिसका मुख्य कारण आहार में कम सब्जियों का उपयोग होना है। आहार विशेषज्ञों के अनुसार संतुलित आहार में प्रतिदिन मनुष्य को 285 ग्राम सब्जिया लेनी चाहिए, जिसमें 100 ग्राम जड़ व कन्दीय सब्जिया, 115 ग्राम पत्तेदार सब्जिया एवं 75 ग्राम अन्य सब्जिया होनी चाहिए।
जड़ वाली सब्जियों में विभिन्न प्रकार के विटामिन ए, एस्कार्बिक अम्ल, लोहा, कैल्शियम, फास्फोरस, पोटेशियम तथा अमीनों अम्ल की पूर्ति होती है। साथ ही हम कुपोषण की समस्या से मुक्त हो सकते हैं तथा शारीरिक व मानसिक कमजोरी/अस्वस्थता को भी दूर कर सकते हैं विभिन्न प्रकार की सब्जियों में पेट के विकार को दूर करने की क्षमता के साथ-साथ भोजन को पचाने की शक्ति भी होती है। फसल उत्पादन के लिए रासायनिक उर्वरकों के लगातार व ज्यादा मात्रा में प्रयोग करने पर मृदा की उत्पादकता, उर्वरता, शक्ति एवं सब्जियों की गुणवत्ता व भंडारण क्षमता में गिरावट आ रही है। इसका कारण यह है कि जड़ वाली सब्जियों व अन्य खाद्य पदार्थों को उगाने में नत्रजन का प्रयोग सर्वाधिक होता है। ज्यादा नाइट्रेट उर्वरकों के प्रयोग से मृदा एवं भूमिगत जल लगातार प्रदूषित हो रहे हैं, जो मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत
हानिकारक है। अतः कार्बनिक खादों के प्रयोग से मृदा की उर्वरता व उत्पादन के टिकाऊपन को बढ़ाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त कार्बनिक खादों का मूल्य कम होता है, किन्तु उत्पादन का मूल्य अधिक मिलता है। अतः इनके इस्तेमाल से कम लागत पर जड़ वाली सब्जिया उगाई जा सकती हैं तथा सब्जियों की गुणवत्ता अधिक उत्पादन एवं भूमि की उर्वरकता को बनाए रखा जा सकता है। कार्बनिक खादों को जड़ वाली सब्जियों में बुवाई या रोपाई के 10-15 दिन पूर्व प्रयोग करना चाहिए। कार्बनिक खाद अच्छे से तैयार होना चाहिए, अन्यथा कीट एवं व्याधियों को आश्रय प्रदान करती है। कार्बनिक खेती में जैविक उर्वरकों जैसे एजोस्पाइरिलम, एजोटोबैक्टर, राइजोबियम, फाॅस्फेट, बायोजाइम (दानेदार एवं तरल), घुलनशील बनाने वाले सूक्ष्म जीव, वैस्कुलर आरवेस्कुलर कवक आदि के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाता है। इसके
उपयोग से गुणवत्ता अधिक उत्पादन होने के साथ-साथ हानिकारक रसायनिक उर्वरकों की मात्रा में भी कटौती की जानी चाहिए।

Tuesday, October 30, 2018

( Wheat ) गेहूं , महत्वपूर्ण जानकारी


Wheat ( गेंहू)

1) वानस्पतिक नाम - ट्रिटिकम एस्टिवम
2) कुल - पोएसी
3) अधिक उत्पादन करने वाला राज्य है - यूपी
4) ज्यादा उत्पादित देश है - चीन, भारत
5) बौनी प्रजाति के जनक है - डा. नार्मल ई बोरलॉग थे।
6) विश्व में लगभग 24 करोड़ हे. भूमि पर गेहू की खेती होती है।
7) विश्व में लगभग उत्पादन - 65 करोड़ टन।
8) यूपी के अलीगढ़ जिले में सबसे ज्यादा गेहू उत्पादित होता हैं।
9) इसकी खेती के लिए दोमट भूमि सर्वोत्तम होती हैं।
10) यह शीतोष्ण जलवायु की फसल है।
11) इसकी बुआई के समय तपमान - 20 - 25℃ उपयुक्त रहता हैं।
12) बुआई के समय पंक्ति से पंक्ति की दूरी 15 से 18 सेमि.
13) बुआई के समय मृदा तापमान 20℃ से कम 35℃ अधिक नही होना चाहिए।
14) इसकी बुआई लगभग 15 से 30 नवम्बर तक कर देनी चाहिए।

15) बीज की मात्रा -
⚫ हल के पीछे- 90-100 kg/h
⚫सिड्रिल - 80 -100 kg/h
⚫डिबलर - 25 - 30 kg/h

16) गेहू बीज शोध करने की दवा - ट्राइकोडर्मा, विरडी, सियुडोमोन्स, फ्लोरोसेन्स+बाविस्टिन है।

17) उर्वरक -
⚫देशी प्रजाति में - NPK 60,30,30 KG/H
⚫बौनी प्रजाति में - NPK 120,60,40 kg/h

18) दीमक से बचाव - 25kg 5% एल्ड्रिन धूल/है ।
19) इसकी बुआई 4,5 सेमी की गहराई पर करनी चाहिए।

20) सिंचाई
⚫ पहली -  21 - 25 दिन में
⚫ दूसरा -  40-45 दिन के बाद
⚫ तीसरा - 65-70 दिन के बाद
⚫ चौथा -  90-95 दिन के बाद
⚫ पांचवा जरूरत पड़ने पर.

21) चूहे के नियंत्रण हेतु जिंक फॉस्फाइड का प्रयोग करते है।
22) इसकी फसल में गेरुई,कंडुआ,बाँट रोग,सेंहू रोग का प्रकोप होता है।

Thursday, October 25, 2018

जहरीली खेती से फैल रही हैं बीमारियां ।


आज की कृषि पूर्ण रूप से जहरीली हो चुकी है। अंधाधुंध कीटनाशकों का प्रयोग एक तरफ भूमि की उर्वरकता को नष्ट कर रहा है, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है। उपभोक्ता पैसे देकर जहर खरीद रहा है। जानलेवा बीमारियां जैसे हार्ट अटैक, कैंसर, दस्त, उल्टियां, अपच कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग का ही नतीजा है। एक तरफ आज की युवा पीढ़ी कृषि से अपना मुंह मोड़ रही है, वहीं औद्योगिकीकरण, विकासशील गतिविधियों तथा बढ़ती जनसंख्या भूमि को सिकोड़ रही है। ऐसी परिस्थिति में जिस बची-खुची भूमि पर खेती हो रही है, वह पूर्ण रूप से विषैली हो चुकी है। कभी मौसम की मार, कभी बीज व अन्य कृषि उपकरणों के अभाव से किसान पिसता रहता है।
ऐसे में कृषि व्यवस्था को अपनाना घाटे का सौदा बन गया है। यही कारण है कि युवा पीढ़ी कृषि से हट कर महज चंद रुपए के लिए नौकरी करने को मजबूर हो गई है। गर्त में जाती कृषि व्यवस्था को बचाने का एकमात्र उपाय जीरो बजट आर्गेनिक खेती ही हो सकती है। जैविक खेती बिना कोई धन खर्च करके की जा सकती है। किसानों को देशी गउओं के गोबर और गोमूत्र का प्रयोग कीटनाशकों और खाद के रूप में करके, महंगे व हानिकारक कीटनाशकों पर पैसा खर्च नहीं करना पड़ेगा। गोमूत्र में जहरीले पौधे खासकर नीम का प्रयोग करके फसलों की गुणवत्ता को बरकरार रखा जा सकता है।

Tuesday, October 16, 2018

डबिंग ( जागृति फिल्म )

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डबिंग ( जागृति फिल्म )
 
आओ बच्चो तुम्हे दिखाये हरियाली इस गाँव की,
हरियाली जो देख रहे हो मेहनत है किसान की।
किसान है हम….. किसान है हम।। 4
 
धूप छाव ये कुछ ना देखे इनके कर्म महान है,
सबका ये है भूख मिटाते इनपर तो अभिमान है,
देखो धरती माँ है अपनी नदियां गंगा घाट है,
हरी भरी हैं खेती देखों यहा मौज की ठाठ है,

विनम्र निवेदन करते है बात नही अभिमान की,
हरियाली जो देख रहे हो मेहनत है किसान की।
किसान है हम….. किसान है हम।। 4
 
हमको इज्जत प्यारी है रहते नही उधारों पे,
हमने सारा जीवन काटा धोती और रूमालों पे,
जन जीवन है सभी पले कृषि कर्म प्रधानों पे,
कड़ी धूप की क्या औकात चलते हैं अंगारो पे,
डट जाते है सीना ताने बात आये जब शान की,
हरियाली जो देख रहे हो मेहनत है किसान की।
किसान है हम….. किसान है हम ।। 4
 
मन में लेके नई उमंग बीज फसल की बोते है,
कई महीनो बाद ही जाके दाना पैदा होते है,
अपने सारे जीवन को संघर्षो पे तोला है,
रहे सलामत दुनिया सबकी सच्चे दिल से बोला है,
चैन सुकून सब उड़ जाता हैं खेती नही आसान की,
हरियाली जो देख रहे हो मेहनत है किसान की।
किसान है हम….. किसान है हम ।। 4
 
प्रेम भाव से सभी मनाते दीवाली और होलियां,
एक साथ में चलती अपनी ख़ुशी ख़ुशी टोलियां,
संस्कार से ओतप्रोत है गांव गांव की गोरियां,
बच्चा बच्चा बोल रहा है कृषिक्रांति की बोलियां,
पगड़ी ऊँचा रहे हमेशा आन बान और शान की
हरियाली जो देख रहे हो मेहनत है किसान की।
किसान है हम….. किसान है हम।। 4
 
जैविक खेती अपनाते हैं खेत खेत हरियाली है,
घर आँगन में जा के देखो झूम रही ख़ुशहाली है,
कोई किसी का वैर नहीं हर मौसम दीवाली है,
बोले पपीहा पीहू पीहू बारिस होने वाली है,
धन धान्य कटने से पहले नमन करो खलिहान की
हरियाली जो देख रहे हो मेहनत है किसान की।
किसान है हम….. किसान है हम।। 4
 
आओ बच्चो तुम्हे दिखाये हरियाली इस गाँव की,
हरियाली जो देख रहे हो मेहनत है किसान की।
किसान है हम….. किसान है हम।। 4

Sunday, October 14, 2018

जैविक कीटनाशकों से लाभ



जैविक कीटनाशकों से लाभ
 
1) जीवों एवं वनस्पतियों पर आधारित उत्पाद होने के कारण, जैविक कीटनाशक लगभग एक माह में भूमि में मिलकर अपघटित हो जाते है तथा इनका कोई भी अंश अवशेष नही रहता | यही कारण है इन्हें परिस्तिथतकीय मित्र के रूप में जाना जाता है |
 
2) जैविक कीटनाशक केवल लक्षित कीटों एवं बिमारियों को मारते है जब की कीटनाशक से मित्र कीट भी नष्ट हो जाते है |
 
3) जैविक कीटनाशकों के प्रयोग से कीटों/व्याधियों में सहनशीलता एवं प्रतिरोध नही उत्पन्न होता जबकि अनेक रसायन कीटनाशकों के प्रयोग से कीटों में प्रतिरोध क्षमता उत्पन्न होती जा रही है जिनके कारण उनका प्रयोग अनुपयोगी होता जा रहा है |
 
4) जैविक कीटनाशकों के प्रयोग से कीटों के जैविक स्वभाव में कोई परिवर्तन नही होता जबकि रासायनिक कीटनाशकों के प्रयोग से ऐसे लक्षण परिलक्षित हुए है | सफ़ेद मक्खी अब अनेक फसलों तथा चने का छेदक अब कई अन्य फसलों को भी नुकसान पहुँचाने लगा है |
 
5) जैविक कीटनाशकों के प्रयोग के तुरंत बाद फलियों, फलों, सब्जियों की कटाई कर प्रयोग में लाया जा सकता है जबकि रासायिनक कीटनाशकों के अवशिष्ट प्रभाव को कम करने के लिए कुछ दिनों की प्रतीक्षा करनी पड़ती है |

6) विक कीटनाशकों के सुरक्षित, हानिरहित तथा परिस्तिथतकीय मित्र होने के कारण विश्व में इनके प्रयोग से उत्पादित चाय, कपास, फल, सब्जियां, तम्बाकू तथा खद्ध्यानो, दलहन एवं तिलहन की मांग एवं मूल्यों में वृद्धि हो रही है, जिसका परिणाम यह है की कृषकों को उनके उत्पादों का अधिक मूल्य मिल रहा है |
 
7) कीटनाशकों के विषहीन एवं हानिरहित होने के कारण ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में इनके प्रयोग से आत्महत्या की सम्भावना शून्य हो गयी है जबकि कीटनाशी रसायनों से अनेक आत्म हत्यांए हो रही है |
 
8 कीटनाशक पर्यावरण, मनुष्य एवं पशुओं के लिए सुरक्षित तथा हानिरहित है | इनके प्रयोग से जैविक खेती को बढ़ावा मिलता है जो पर्यावरण एवं परिस्तिथतकीय का संतुलन बनाये रखने में सहायक है |

पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों का वर्गीकरण



पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों का वर्गीकरण

पौधे जडो द्वारा भूमि से पानी एवं पोषक तत्व, वायु से कार्वन डाई आक्साइड तथा सूर्य से प्रकाश ऊर्जा लेकर अपने विभिन्न भागों का निर्माण करते है।
पोषक तत्वों को पौधों की आवश्यकतानुसार निम्न प्रकार वर्गीकृत किया गया है।

मुख्य पोषक तत्व-
नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश।

गौण पोषक तत्व-
कैल्सियम, मैग्नीशियम एवं गन्धक।

सूक्ष्म पोषक तत्व-
लोहा, जिंक, कापर, मैग्नीज, मालिब्डेनम, बोरान एवं क्लोरीन.


🌱पौधों में आवश्यक पोषक तत्व एवं उनके कार्य

1) पौधों के सामान्य विकास एवं वृद्धि हेतु कुल 16 पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। इनमें से किसी एक पोषक तत्व की कमी होने पर पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और भरपूर फसल नहीं मिलती ।

2 कार्बन , हाइड्रोजन व आक्सीजन को पौधे हवा एवं जल से प्राप्त करते है।

3) नाइट्रोजन , फस्फोरस एवं पोटैशियम को पौधे मिट्टी से प्राप्त करते है। इनकी पौधों को काफी मात्रा में जरूरत रहती है। इन्हे प्रमुख पोषक तत्व कहते है।

4) कैल्शियम, मैग्नीशियम एवं गन्धक को पौधे कम मात्रा में ग्रहण करते है। इन्हे गौड अथवा द्वितीयक पोषक तत्व कहते है।

5) लोहा, जस्ता, मैगनीज, तांबा, बोरोन, मोलिब्डेनम और क्लोरीन तत्वों की पौधों को काफी मात्रा में आवश्यकता पड़ती है। इन्हे सूक्ष्म पोषक तत्व कहते है।
पोषक तत्वों के कार्य

🌱नाइट्रोजन
👉 सभी जीवित ऊतकों यानि जड़, तना, पत्ति की वृद्दि और विकास में सहायक है।
👉 क्लोरोफिल, प्रोटोप्लाज्मा प्रोटीन और न्यूक्लिक अम्लों का एक महत्वपूर्ण अवयव है।
👉 पत्ती वाली सब्जियों और चारे की गुणवत्ता में सुधार करता है।

🌱 फास्फोरस
👉 पौधों के वर्धनशील अग्रभाग, बीज और फलों के विकास हेतु आवश्यक है। पुष्प विकास में सहायक है।
👉 कोशिका विभाजन के लिए आवश्यक है। जड़ों के विकास में सहायक होता है।
👉 न्यूक्लिक अम्लों, प्रोटीन, फास्फोलिपिड और सहविकारों का अवयव है।
👉 अमीनों अम्लों का अवयव है।

🌱पोटेशियम
👉 एंजाइमों की क्रियाशीलता बढाता है।
ठण्डे और बादलयुक्त मौसम में पौधों द्वारा प्रकाश के उपयोग में वृद्धि करता है, जिससे पौधों में ठण्डक और अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता बढ़ जाती है।
👉 कार्बोहाइड्रेट के स्थानांतरण, प्रोटीन संश्लेषण और इनकी स्थिरता बनाये रखने में मदद करता है।
👉 पौधों की रोग प्रतिरोधी क्षमता में वृद्धि होती है।
👉 इसके उपयोग से दाने आकार में बड़े हो जाते है और फलों और सब्जियों की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

🌱 कैल्शियम
👉 कोशिका भित्ति का एक प्रमुख अवयव है, जो कि सामान्य कोशिका विभाजन के लिए आवश्यक होता है।
👉 कोशिका झिल्ली की स्थिरता बनाये रखने में सहायक होता है।
👉 एंजाइमों की क्रियाशीलता में वृद्धि करता है।
👉 पौधों में जैविक अम्लों को उदासीन बनाकर उनके विषाक्त प्रभाव को समाप्त करता है।
👉 कार्बोहाइट्रेड के स्थानांतरण में मदद करता है।

🌱मैग्नीशियम
👉 क्लोरोफिल का प्रमुख तत्व है, जिसके बिना प्रकाश संश्लेषण (भोजन निर्माण) संभव नहीं है।
👉 कार्बोहाइट्रेड-उपापचय, न्यूक्लिक अम्लों के संश्लेषण आदि में भाग लेने वाले अनेक एंजाइमों की क्रियाशीलता में वृद्धि करता है।
👉 फास्फोरस के अवशोषण और स्थानांतरण में वृद्दि करता है।

🌱गंधक
👉 प्रोटीन संरचना को स्थिर रखने में सहायता करता है।
👉 तेल संश्लेषण और क्लोरोफिल निर्माण में मदद करता है।
👉 विटामिन के उपापचय क्रिया में योगदान करता है।

🌱जस्ता
👉 पौधों द्वारा फास्फोरस और नाइट्रोजन के उपयोग में सहायक होता है
👉 न्यूक्लिक अम्ल और प्रोटीन-संश्लेषण में मदद करता है।
👉 हार्मोनों के जैव संश्लेषण में योगदान करता है।
👉 अनेक प्रकार के खनिज एंजाइमों का आवश्यक अंग है।

🌱तांबा
👉 पौधों में विटामिन ‘ए’ के निर्माण में वृद्दि करता है।
👉 अनेक एंजाइमों का घटक है।

🌱लोहा
👉 पौधों में क्लोरोफिल के संश्लेषण और रख रखाव के लिए आवश्यक होता है।
👉 न्यूक्लिक अम्ल के उपापचय में एक आवश्यक भूमिका निभाता है।
👉 अनेक एंजाइमों का आवश्यक अवयव है।

🌱मैगनीज
👉 प्रकाश और अन्धेरे की अवस्था में पादप कोशिकाओं में होने वाली क्रियाओं को नियंत्रित करता है।
👉 नाइट्रोजन के उपापचय और क्लोरोफिल के संश्लेषण में भाग लेने वाले एंजाइमों की क्रियाशीलता बढ़ा देता है।
👉 पौधों में होने वाली अनेक महत्वपूर्ण एंजाइमयुक्त और कोशिकीय प्रतिक्रियओं के संचालन में सहायक है।
👉 कार्बोहाइट्रेड के आक्सीकरण के फलस्वरूप कार्बन आक्साइड और जल का निर्माण करता है।

🌱बोरोन
👉 प्रोटीन-संश्लेषण के लिये आवश्यक है।
👉 कोशिका –विभाजन को प्रभावित करता है।
👉 कैल्शियम के अवशोषण और पौधों द्वारा उसके उपयोग को प्रभावित करता है।
👉 कोशिका झिल्ली की पारगम्यता बढ़ाता है

Thursday, October 11, 2018

आईएसआई निर्धारित पशु आहार के मानक


आईएसआई निर्धारित पशु आहार के मानक
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क्रम सं       %मात्रा                    अवयव 
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1)             20-21                  प्रोटीन
2)             2.5-3                   चिकनाई
3)             1.00                    कैल्शियम
4)             0.5                      फास्फोरस
5)             4. 00                   सेड सिलिका
6)             12.00                  फाइबर
7)             3.00                    खनिज लवण
8)             5000 IU/KG      विटामिन ए /डी
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बछड़े की देख भाल करना


✍शुरुआती देखभाल
1) जन्म के ठीक बाद बछड़े के नाक और मुंह से कफ अथवा श्लेष्मा इत्यादि को साफ करें।

2) आमतौर पर गाय बछड़े को जन्म देते ही उसे जीभ से चाटने लगती है। इससे बछड़े के शरीर को सूखने में आसानी होती है और श्वसन तथा रक्त संचार सुचारू होता है। यदि गाय बछड़े को न चाटे अथवा ठंडी जलवायु की स्थिति में बछड़े के शरीर को सूखे कपड़े या टाट से पोंछकर सुखाएं। हाथ से छाती को दबाकर और छोड़कर कृत्रिम श्वसन प्रदान करें।

3) नाभ नाल में शरीर से 2-5 सेमी की दूरी पर गांठ बांध देनी चाहिए और बांधे हुए स्थान से 1 सेमी नीचे से काट कर टिंक्चर आयोडीन या बोरिक एसिड अथवा कोई भी अन्य एंटिबायोटिक लगाना चाहिए।

4) बाड़े के गीले बिछौने को हटाकर स्थान को बिल्कुल साफ और सूखा रखना चाहिए।

5) बछड़े के वजन का ब्योरा रखना चाहिए।

6) गाय के थन और स्तनाग्र को क्लोरीन के घोल द्वारा अच्छी तरह साफ कर सुखाएं।

7) बछड़े को मां का पहला दूध अर्थात् खीस का पान करने दें।

8) बछड़ा एक घंटे में खड़े होकर दूध पीने की कोशिश करने लगता है। यदि ऐसा न हो तो कमजोर बछड़े की मदद करें।

✍पानी का महत्व
ध्यान रखें हर वक्त साफ और ताजा पानी उपलब्ध रहे। बछड़े को जरूरत से ज्यादा पानी एक ही बार में पीने से रोकने के लिए पानी को अलग-अलग बरतनों में और अलग-अलग स्थानों में रखें।

✍खिलाने की व्यवस्था
बछड़े को खिलाने की व्यवस्था इस बात पर निर्भर करती है कि उसे किस प्रकार का भोज्य पदार्थ दिया जा रहा है। इसके लिए आमतौर पर निम्नलिखित व्यवस्था अपनाई जाती है:

१) बछड़े को पूरी तरह दूध पर पालना
२) मक्खन निकाला हुआ दूध देना
३) दूध की बजाए अन्य द्रव पदार्थ जैसे ताजा #छाछ, @दही का मीठा @पानी, @दलिया इत्यादि देना
४) दूध के विकल्प देना
काफ स्टार्टर देना
५) पोषक गाय का दूध पिलाना।

✍पूरी तरह दूध पर पालना
50 किलो औसत शारीरिक वजन के साथ तीन महीने की उम्र तक के नवजात बछड़े की पोषण आवश्यकता इस प्रकार है:

⚫सूखा पदार्थ
(डीएम). 1.43 किग्रा
⚫पचने योग्य कुल पोषक पदार्थ (टीडीएन)               1.60 किग्रा
⚫कच्चे प्रोटीन 315 ग्राम

१) यह ध्यान देने योग्य है कि टीडीएन की आवश्यकता डीएम से अधिक होती है क्योंकि भोजन में वसा का उच्च अनुपात होना चाहिए। 15 दिनों बाद बछड़ा घास टूंगना शुरू कर देता है जिसकी मात्रा लगभग आधा किलो प्रतिदिन होती है जो 3 महीने बाद बढ़कर 5 किलो हो जाती है।

२) इस दौरान हरे चारे के स्थान पर 1-2 किलो अच्छे प्रकार का सूखा चारा (पुआल) बछड़े का आहार हो सकता है जो 15 दिन की उम्र में आधा किलो से लेकर

३) 3 महीने की उम्र में डेढ किलो तक दिया जा सकता है। 3 सप्ताह के बाद यदि संपूर्ण दूध की उपलब्धता कम हो तो बछड़े को मक्खन निकाला हुआ दूध, छाछ अथवा अन्य दुग्धीय तरल पदार्थ दिया जा सकता है।

✍ मिश्रित आहार
१) बछड़े का मिश्रित आहार एक सांद्र पूरक आहार है जो ऐसे बछड़े को दिया जाता है जिसे दूध अथवा अन्य तरल पदार्थों पर पाला जा रहा हो। बछड़े का मिश्रित आहार मुख्य रूप से मक्के और जई जैसे अनाजों से बना होता है।

२) जौ, गेहूं और ज्वार जैसे अनाजों का इस्तेमाल भी इस मिश्रण में किया जा सकता है। बछड़े के मिश्रित आहर में 10% तक गुड़ का इस्तेमाल किया जा सकता है।

३) एक आदर्श मिश्रित आहार में 80% टीडीएन और 22% सीपी होता है।

✍ रेशेदार पदार्थ
१) अच्छे किस्म के तनायुक्त पत्तेदार सूखे दलहनी पौधे छोटे बछड़े के लिए रेशे का अच्छा स्रोत हैं। दलहन, घास और पुआल का मिश्रण भी उपयुक्त होता है।

२) धूप लगाई हुई घास जिसकी हरियाली बरकरार हो, विटामिन-ए, डी तथा बी-कॉम्प्लैक्स विटामिनों का अच्छा स्रोत होती है।

३) 6 महीने की उम्र में बछड़ा 1.5 से 2.5 किग्रा तक सूखी घास खा सकता है। उम्र बढने के साथ-साथ यह मात्रा बढ़ती जाती है।

४) 6-8 सप्ताह के बाद से थोड़ी मात्रा में साइलेज़ अतिरिक्त रूप से दिया जा सकता है। अधिक छोटी उम्र से साइलेज़ खिलाना बछड़े में दस्त का कारण बन सकता है।

५) बछड़े के 4 से 6 महीने की उम्र के हो जाने से पहले तक साइलेज़ को रेशे के स्रोत के रूप में उसके लिए उपयुक्त नहीं माना जा सकता।

६) मक्के और ज्वार के साइलेज़ में प्रोटीन और कैल्शियम पर्याप्त नहीं होते हैं तथा उनमें विटामिन डी की मात्रा भी कम होती हैं।

✍ पोषक गाय के दूध पर बछड़े को पालना
१) 2 से 4 अनाथ बछड़ों को दूध पिलाने के लिए उनकी उम्र के पहले सप्ताह से ही कम वसा-युक्त दूध देने वाली और दुहने में मुश्किल करने वाली गाय को सफलतापूर्वक तैयार किया जा सकता है।

२) सूखी घास के साथ बछड़े को सूखा आहार जितनी कम उम्र में देना शुरू किया जाए उतना अच्छा। इन बछड़ों का 2 से 3 महीने की उम्र में दूध छुड़वाया जा सकता है।

✍बछड़े को दलिए पर पालना
१) बछड़े के आरंभिक आहार (काफ स्टार्टर) का तरल रूप है दलिया। यह दूध का विकल्प नहीं है। 4 सप्ताह की उम्र से बछड़े के लिए दूध की मात्रा धीरे-धीरे कम कर भोजन के रूप में दलिया को उसकी जगह पर शामिल किया जा सकता है। 20 दिनों के बाद बछड़े को दूध देना पूरी तरह बंद किया जा सकता है।

✍काफ स्टार्टर पर बछड़े को पालना
१) इसमें बछड़े को पूर्ण दुग्ध के साथ स्टार्टर दिया जाता है। उन्हें सूखा काफ स्टार्टर और अच्छी सूखी घास या चारा खाने की आदत लगाई जाती है। 7 से 10 सप्ताह की उम्र में बछड़े का दूध पूरी तरह छुड़वा दिया जाता है।

✍दूध के विकल्पों पर बछड़े को पालना
✡ यह अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए कि नवजात बछड़े के लिए पोषकीय महत्व की दृष्टि से दूध का कोई विकल्प नहीं है। हालांकि, दूध के विकल्प का सहारा उस स्थिति में लिया जा सकता है जब दूध अथवा अन्य तरल पदार्थों की उपलब्धता बिल्कुल पर्याप्त न हो।
दूध के विकल्प ठीक उसी मात्रा में दिए जा सकते हैं जिस मात्रा में पूर्ण दुग्ध दिया जाता है, अर्थात् पुनर्गठन के बाद बछड़े के शारीरिक वजन का 10%। पुनर्गठित दूध के विकल्प में कुल ठोस की मात्रा तरल पदार्थ के 10 से 12% तक होती है।

✍दूध छुड़वाना
१) बछड़े का दूध छुड़वाना सघन डेयरी फार्मिंग व्यवस्था के लिए अपनाया गया एक प्रबन्धन कार्य है। बछड़े का दूध छुड़वाना प्रबन्धन में एकरूपता लाने में मदद करता है और यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक बछड़े को उसकी आवश्यकता अनुसार दूध की मात्रा उपलब्ध हो और दूध की बर्बादी अथवा दूध का आवश्यकता से अधिक पान न हो।

२) अपनाई गई प्रबन्धन व्यवस्था के आधार पर जन्म के समय, 3 सप्ताह बाद, 8 से 12 सप्ताह के दौरान अथवा 24 सप्ताह में दूध छुड़वाया जा सकता है। जिन बछड़ों को सांड के रूप में तैयार करना है उन्हें 6 महीने की उम्र तक दूध पीने के लिए मां के साथ छोड़ा जा सकता है।

3) संगठित रेवड़ में, जहां बड़ी संख्या में बछड़ों का पालन किया जाता है जन्म के बाद दूध छुड़ाना लाभदायक होता है।

४) जन्म के बाद दूध छुड़वाने से छोटी उम्र में दूध के विकल्प और आहार अपनाने में सहूलियत होती है और इसका यह फायदा है कि गाय का दूध अधिक मात्रा में मनुष्य के इस्तेमाल के लिए उपलब्ध होता है।

✍दूध छुड़वाने के
दूध छुड़वाने के बाद 3 महीने तक काफ स्टार्टर की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाई जानी चाहिए। अच्छे किस्म की सूखी घास बछड़े को सारा दिन खाने को देना चाहिए। बछड़े के वजन के 3% तक उच्च नमी वाले आहार जैसे साइलेज़, हरा चारा और चराई के रूप में घास खिलाई जानी चाहिए। बछड़ा इनको अधिक मात्रा में न खा ले इसका ध्यान रखना चाहिए क्योंकि इसके कारण कुल पोषण की प्राप्ति सीमित हो सकती है।

✍बछड़े की बृद्धि
१) बछड़े की वृद्धि वांछित गति से हो रही है या नहीं इसे निर्धारित करने के लिए वजन की जांच करें।

२) पहले 3 महीनों के दौरान बछड़े का आहार बहुत महत्वपूर्ण होता है।

३) इस चरण में बछड़े का खानपान अगर सही न हो तो मृत्यु दर में 25 से 30% की वृद्धि होती है।

४) गर्भवती गाय को गर्भावस्था के अंतिम 2-3 महीनों के दौरान अच्छे किस्म का चारा और सांद्र आहार दिया जाना चाहिए।

५) जन्म के समय बछड़े का वजन 20 से 25 किग्रा होना चाहिए।

६) नियमित रूप से कृमिनाशक दवाई दिए जाने के साथ-साथ उचित आहार दिए जाने से बछड़े की वृद्धि दर 10-15 किग्रा प्रति माह हो सकती है।

✍बछड़े को स्वस्थ रखाना
नवजात बछड़ों को बीमारियों से बचाकर रखना उनकी आरंभिक वृद्धि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और इससे उनकी मृत्यु दर कम होती है, साथ ही बीमारी से बचाव बीमारी के इलाज की तुलना में कम खर्च में किया जा सकता है। बछड़े का नियमित निरीक्षण करें, उन्हें ठीक तरह से खिलाएं और उनके रहने की जगह और परिवेश को स्वच्छ रखें।

Tuesday, October 2, 2018

अक्टूबर माह में बुआई की जाने वाली फसले।


गाजर, शलगम, फूलगोभी, आलू, टमाटर, काली सरसों के बीज, मूली, पालक, पत्ता गोभी, कोहीराबी, धनिया, सौंफ के बीज, राजमा, मटर, ब्रोकोली, सलाद, बैंगन, हरी प्याज, ब्रसल्स स्प्राउट, लहसुन. इत्यादि।

Wednesday, September 26, 2018

जैविक कीटनाशक👇👇


रासायनिक कीटनाशकों के कृषि, पर्यावरण एवं स्वास्थ्य विरोधी परिणामों को देखते हुए अब ऐसे वैकल्पिक कीटनाशकों के अनुसंधान पर जोर दिया जाने लगा है, जो

🌱मनुष्य एवं मानवेतर जीवों के लिए अल्प या शून्य हानिकारक तथा सुरक्षित हों

🌱जिसके जैवकीय विघटन होने से मिट्टी, जल एवं वायु दूषित न हों।

🌱जिससे प्रतिकूल कीड़े ही मारे जा सकें, अनुकूल कीड़े नहीं ।

🌱जो लक्षित कीटों की प्रतिरोधी क्षमता विकसित न होने दे ।

🌱जो रासायनिक कीटनाशकों की अपेक्षा सस्ता, सहज प्राप्य एवं पार्श्व प्रभाव रहित हो ।

🌱जिनका प्रभाव भले ही रासायनिक कीटनाशकों की तरह न हो, धीमी ही हो और कीटों द्वारा कुछ नुकसान भी उठाना पड़े, किन्तु खाद्यान्न, मिट्टी, जल, वायु एवं जीवन में विषाक्तता का प्रवेश न हो। इन अपेक्षाओं की पूर्ति सिर्फ वनस्पति जगत से ही हो सकती है और विकल्प की तलाश में 'नीम' एक सर्वोत्तम कीटनाशक रूप में सामने आया है।

भारत सहित विश्व के विभिन्न देशों, मुख्यत: जर्मनी, अमेरिका एवं जापान में विगत ३०-४० वर्षों के दौरान नीम वृक्ष के कीटनाशक तत्वों की खोज के लिए बड़े पैमाने पर सघन अनुसंधान हुए हैं और पाया गया है कि इस वृक्ष के फल, बीज, गिरी तथा डाल, तना एवं जड़ की छाल में कीट-विरोधी कई गुण मौजूद हैं। यह एक ही साथ कीट-भरण प्रतिरोधक (antifeedant), कीटनाशी (Insecticidal), कीट-वृद्धि विघटक (Insect-growth disrupting), गोल-कृमि प्रतिरोधी (Nematicidal), कवक/फफुंदनाशी (Fungicidal), जीवाणुनाशी (Bactericidal), कीट/वायरस/बैक्टेरिया विकर्षक (Insect/Virus/Bacteria-repellent) और कीटों के विरुद्ध बन्ध्यीकरण (Sterilizing) गुण वाला है। वैज्ञानिकों का अभिमत है कि प्रकृति-प्रदत्त नीम वृक्ष कीटनाशक (एवं उर्वरक रूप में भी) बेमिसाल है और इसे व्यापक पैमाने पर उपयोग में लाया जा सकता है।

Wednesday, September 12, 2018

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गाय व भैंस मे मद से जुडी कुछ बातें।



मद की प्रारम्भिक अवस्था:

(1) पशु की भूख में कमी आना |

(2) दूध उत्पादन में कमी|

(3) पशु का रम्भावना (बोलना)व बेचैन रहना |

(4) योनि से पतले श्लैष्मिक पदार्थ का निकलना |

(5) दूसरे पशुओं से अलग रहना|

(6) पशु का पूंछ उठाना|

(7) योनि द्वार (भग) का सूजना तथा बार-बार पेशाब करना |

(8) शरीर के तापमान में मामूली सी वृद्धि|

 

मद की मध्यव्स्था:

गर्मीं की यह अवस्था बहुत महवपूर्ण होती है क्योंकि कृत्रिम ग्रंह धान के लिए यही अवस्था सबसे उपयुक्त मानी जाती है |

इसकी अवधि लगभग 10 घटे तक रहती है |

इस अवस्था में पशु काफी उत्तेजित दीखता है तथा वह अन्य पशुओं में रूचि दिखता है |

 

यह अवस्था निम्नलिखित लक्षणों से पहचानी जा सकती है |

(1) योनि द्वार (भग) से निकलने वाले श्लैष्मिक पदार्थ का गढा होना जिससे वह बिना टूटे नीचे तक लटकता हुआ दिखाई देता है |

(2) पशु ज़ोर-ज़ोर से रम्भावना (बोलने) लगता हैं |

(3) भग (योनि द्वार)की सूजन तथा श्लैष्मिक झिल्ली की लाली में वृद्धि हो जाती है |

(4) शरीर का तापमान बढ़ जाता हैं |

(5) दूध में कमी तथा पीठ पर टेढ़ापन दिखाई देता है |

(6) पशु अपने ऊपर दूसरे पशु को चढने देता हैं अथवा वह खुद दूसरे पशुओं पे चढने लगता |

 

मद की अन्तिम अवस्था:

(1) पशु की भूख लगभग सामान्य हो जाती है |

(2) दूध में कमी भी समाप्त हो जाती है |

(3) पशु का रम्भाना कम हो जाता हैं |

(4) भग की सूजन व श्लैष्मिक झिल्ली की लाली में कमी आ जाती है |

(5) श्लेष्मा का निकलना या तो बन्द या फिर बहुत कम हो जाता है तथा यह बहुत गाढ़ा व कुछ अपारदर्शी होने लगता है |

Sunday, September 9, 2018

जयपुर शिवानी माहेश्वरी



कोई कार्य क्षेत्र ऐसा नहीं जहाँ सफलता की गुंजाईश ना हो बस आवश्यकता होती है तो लगन मेहनत और ख़ुद पर विश्वास की। हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है लेकिन बदलते आधुनिक परिवेश ने खेती और किसान दोनों की परिभाषा बदल दी है। हमारी आज की कहानी भी आधुनिक भारत की ऐसी दो बेटियों की है जो धरती पुत्री अर्थात किसान बनकर खेती को एक व्यवसाय के रूप में विकसित कर रही हैं।

जयपुर की शिवानी माहेश्वरी और दिल्ली की वामिका बेहती ने अच्छी ख़ासी नौकरी छोड़ कर हरियाणा में फूलों की खेती का व्यवसाय करने की तरफ रुख़ किया। और आज एक सफल किसान के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं।
आपको बता दें कि भारत की फ्लोरिकल्चर इंडस्ट्री की सालाना कुल ग्रोथ 30 फीसदी की रफ्तार से भी तेज हो रही है।वहीं इंडस्ट्री बॉडी एसोचैम की मानें तो आने वाले 2015 तक इस इंडस्ट्री का मार्केट कैप 10,000 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगी। ऐसे स्थिति में इस क्षेत्र में कारोबार की बड़ी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में हरियाणा में वामिका और शिवानी की पहल ने किसानों की मदद की है साथ ही उन्हें उन्नत खेती की तकनीकों और व्यावसायिक खेती से अवगत कराया है ।
जयपुर की रहने वाली 23 साल की शिवानी एमबीए ग्रैजुएट हैं तो दिल्ली की 25 साल की वामिका चार्ट्रड अकाउंटेंट हैं।
साल 2015 में शिवानी को फूलों का व्यवसाय करने का ख्याल उस समय आया जब उन्हें रोहतक-दिल्ली जानेे के दौरान एक बार पॉलीहाउस फार्मिंग नेट देखने का अवसर प्राप्त हुआ। शिवानी वहाँ की कुछ तस्वीरें कैमरे में क़ैद कर लाई और फूलों के व्यवसाय के बारे में इंटरनेट पर रिसर्च करना शुरू किया। उसी समय उनकी मुलाकात वामिका से हुई और फिर दोनों ने मिलकर इस पर काम शुरू किया।
हरियाणा खास तौर पर अपने क्षेत्र के किसानों और उनकी खेती के लिये मशहूर है इसलिए दोनों के लिये व्यवसाय से जुड़ी सारी चीजें खुद-ब-खुद बेहतर होने लगी। वामिका की बहादुरगढ़ में एक फैक्ट्री और झझर जिले के तंडाहेरी गांव में खाली जमीन भी थी जिस पर दोनों ने मिलकर यूनिस्टार एग्रो नाम की एक फार्म शुरू कर दी जहाँ लिलियम, गेरबेरा, गुलाब, रजनीगंधा और ग्लेडियोलस की खेती की जाने लगी।
दोनों ने मिलकर अपने फूलों के व्यवसाय में अपनी पढ़ाई का भी पूरा प्रयोग करना शुरू किया जिसका फायदा इन्हें अपने व्यवसाय में मिल रहा है। साथ में ही वामिका को उनके बिजनेसमैन पति की उपयोगी सलाह भी मिलती है।
इन दोनों के उद्यम यूनिस्टार एग्रो को अब हरियाणा सरकार भी सहायता प्रदान कर रही है क्योंकि वामिका और शिवानी की पढ़ाई और तकनीकी जानकारी की वजह से ऑर्गेनिक खेती करने के लिये कई किसानों को सहायता मिल रही हैं।
आज उनका फूलों का व्यवसाय खूब फल-फूल रहा है। उनकी मेहनत और किसानों के फायदों को देखते हुए सरकार ने उन्हें पुरस्कार सब्सिडी और इनसेनटिव भी देना शुरू कर दिया। वामिका और शिवानी अब अपने व्यवसाय को और आगे बढ़ाना चाहती हैं और देश में ही नहीं बल्कि मौका मिला तो विदेशों तक अपने कारोबार को फैलाना चाहती हैं। साथ ही किसानों का आर्थिक स्तर भी सुधारना उनका लक्ष्य हैं।
वाक़ई यदि देश की युवा पीढ़ी इस तरह अपने ज्ञान का उपयोग करेगी तो वो दिन दूर नहीं जब भारत फिर से सोने की चिड़िया कहलाने लगेगा।

विभिन्न फसलों में लगने वाले प्रमुख रोग


1. खेरा रोग - धान
2. लाल सड़न रोग - गन्ने
3. करनाल बंट रोग - गेहूँ
4. श्वेत फफोला रोग - सरसों
5. पनामा सूखा रोग - केले
6. अर्गट रोग - बाजरा
7. उक्ठा रोग - चना
8. टिक्का रोग - मूंगफली
9. ब्लेक आर्म रोग - कपास
10. केंकर रोग - निम्बू
11. ईयर कोकल रोग - गेहूँ
12. कोयलिया रोग - आम
13. फाईलोडी रोग - तिल
14. टुंगरू रोग - धान
15. पीत शिरा रोग - भिंडी, पपीता, तम्बाकू
16. हेन व चिकन रोग - अंगूर
17. बक आई रोट रोग - टमाटर
18. ग्राशि शूट रोग - गन्ने
19. मोल्या रोग - गेहूँ और जौ
20. चूर्णल फफूंद रोग - मटर
21. हरित बाली रोग - बाजरा


पशु पालन


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पशुओं को स्वस्थ और दुधारू बनाये रखने के लिए पशुपालन से सम्बंधित कुछ जरुरी बातें और नियम हैं ,जिसे की  पशुपालकों को पालन करनी चाहिए . पशुओं को हमेशा साफसुथरे माहौल में रखना चाहिए. बीमार होने पर पशुओं को सेहतमंद पशुओं से तुरंत अलग कर देना चाहिए और उन का इलाज कराना चाहिए. इस के अलावा पशुपालकों को पशुपालन से सम्बंधितनिम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए. 
  • पशुओं को सेहतमंद रखने और बीमारी से बचाने के लिए उचित समय पर टीका लगवाना चाहिए.गायभैंसों को गलघोंटू, एंथ्रैक्स लंगड़ी, संक्रामक गर्भपात, खुरपकामुंहपका, पोकनी वगैरह बीमारियों से बचाना चाहिए. पशुओं को ऐसी बीमारियों से बचाव का एकमात्र उपाय टीकाकरण है.
  • दुधारू पशुओं को नियमित रूप से पशु डाक्टर को दिखाना चाहिए. बीमार पशुओं का इलाज जल्दी कराना चाहिए, ताकि पशु रोगमुक्त हो सके. साथ ही, बीमार पशु के बरतन व जंजीरें पानी में उबाल कर विराक्लीन -Viraclean से  जीवाणुरहित करने चाहिए. फर्श और दीवारों को भी विराक्लीन -Viraclean से साफ करना चाहिए. विराक्लीन -Viraclean का हमेशा पशुओं के बाड़ें में और बाड़ें के आस-पास छिड़काव करते रहना चाहिये , यह माहमारी होने और फैलने से बचाता है .
  • पशुओं को भीतरी व बाहरी परजीवियों के प्रकोप से भारी नुकसान होता है और उन का दूध उत्पादन घट जाता है. पशु कमजोर हो जाते हैं. भीतरी परजीवियों के प्रकोप से भैंस के बच्चों में 3 महीने की उम्र तक 33 फीसदी की मौत हो जाती है और जो बच्चे बचते हैं, उन का विकास बहुत धीमा होता है.
  • परजीवी के प्रकोप से बड़े पशुओं में भी कब्ज, एनीमिया, पेटदर्द व डायरिया वगैरह के लक्षण दिखाई देते हैं, इसलिए साल में 2 बार भीतरी परजीवियों के लिए कृमिनाशक दवा का प्रयोग करना चाहिए.
  • बाहरी परजीवियों जैसे किलनी, कुटकी व जूं से बचाने के लिए समयसमय पर पशुओं की सफाई की जानी चाहिए. पशुओं में इन का ज्यादा प्रकोप हो जाने पर निकट के पशु डाक्टर से तुरंत संपर्क करना चाहिए.
  • नए खरीदे गए पशुओं को लगभग एक महीने तक अलग रख कर उन का निरीक्षण करना चाहिए. इस अवधि में अगर पशु सेहतमंद दिखाई दें और उन्हें टीका न लगा हो, तो टीकाकरण अवश्य करा देना चाहिए.
  • पशुओं को साफसुथरे माहौल में रखा जाए,  पशुओं के आवास को हमेशा विराक्लीन -Viraclean से छिड़काव करें उन्हें साफ पानी और पौष्टिक आहार दिया जाए और नियमित रूप से टीकाकरण कराया जाए, तो वे हमेशा सेहतमंद बने रहते हैं और उन से पर्याप्त मात्रा में दूध मिलता रहता है.
 
दुधारू पशुओं में प्रजनन प्रबंध :
पशुपालक कोपशुपालन से सम्बंधित इस बात का खास खयाल रखना चाहिए कि उस का पशु समय से गर्भधारण करे. ब्याने के बाद 2-3 महीने के अंदर दोबारा गाभिन हो जाए व बच्चा देने का अंतर 12-13 महीने से ज्यादा न हो. यह तभी संभव है, जब गायभैंस को भरपूर संतुलित आहार मिले और उन की प्रबंधन व्यवस्था अच्छी हो. गायभैंस के ब्याने से 2 महीने पहले उस का दूध सुखा देना चाहिए. दूध सुखाने के लिए 15-20 दिन पहले से थनों से धीरेधीरे कम दूध निकालते हैं. इस प्रकार दूध सूख जाता है. अब इन 2 महीनों में पशु को पौष्टिक हरा चारा व दाना मिश्रण देना चाहिए. इस अवस्था में जितनी अच्छी देखरेख होगी, उतना ही ब्याने के
बाद अच्छा दूध उत्पादन लंबे समय तक प्राप्त होगा. एक दुधारू पशु की दूध न देने की अवधि जितनी कम होगी, पशुपालक के लिए उतना ही फायदेमंद होगा. इस के लिए जरूरी है कि ब्याने के 8-12 हफ्ते के अंदर गायभैंस को दोबारा गाभिन करा दिया जाए. यदि पशु इस अवधि में गरम न हो, तो उसे गरम होने की दवा देनी चाहिए.
पशुओं में गर्भाधान :
पशुओं में गर्भाधान आमतौर पर 2 विधियों द्वारा किया जाता है. पहली विधि, जिस में सांड़भैंसे द्वारा गर्भाधान कराया जाता है, जिसे प्राकृतिक गर्भाधान कहा जाता है. दूसरी विधि में सांड़भैंसे के वीर्य को कृत्रिम साधनों से मादा में प्रवेश कराते हैं. इसे कृत्रिम गर्भाधान कहते हैं.

प्राकृतिक गर्भाधान :
प्रजनन हेतु भैंसा या सांड़ राजकीय संस्थाओं से प्रमाणित नस्ल का होना चाहिए. अगर गांवों में किसी भैंसे या सांड़ से गर्भाधान कराना हो, तो कम से कम भैंसे या सांड़, जिस की मातादादीनानी अच्छी दुधारू गाय या भैंस व पितादादानाना उत्तम गुण के सिद्ध हो चुके हों, का रिकौर्ड पता होना चाहिए. अगर दादादादी, नाना का रिकौर्ड न पता हो, तो मातापिता का रिकौर्ड अवश्य मालूम होना चाहिए.
सांड़ की उम्र कम से कम 3 साल व भैंसे की उम्र 4 साल या 10 साल से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. एक सांड़ या भैंसे से दिन में एक बार एक मादा से अधिक गाभिन नहीं कराना चाहिए और उसे बीमार मादा के संपर्क से भी बचाना चाहिए.
कृत्रिम गर्भाधान :
इस विधि में मादा को नर से सीधे नहीं मिलाया जाता है, बल्कि कृत्रिम विधि से गाय को गाभिन करा दिया जाता है, क्योंकि गर्भाधान के लिए 1 या 2 शुक्राणु ही काफी होते हैं. लिहाजा, कृत्रिम विधि से निकाले गए वीर्य को पतला कर जरूरत के मुताबिक सैकड़ों मादाओं को गाभिन किया जा सकता है. यही नहीं, अत्यधिक दूध बढ़ाने की क्षमता रखने वाले सांड़ों के वीर्य से दुनिया के किसी भी हिस्से में मादाओं को गाभिन कर के उन की संततियों में दूध की मात्रा बढ़ाई जा सकती है. तरल नाइट्रोजन की मदद से वीर्य को -196 डिगरी सेंटीग्रेड तक ठंडा किया जा सकता है, जिसे कई सालों तक संभाल कर रखा जा सकता है. हमारे देश में जो दुग्ध उत्पादन में वृद्धि हुई है, उस में कृत्रिम गर्भाधान का खास योगदान है.
गर्भ परीक्षण : वीर्य सेचन के बाद जल्दी ही गर्भ परीक्षण आर्थिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है. गाय व भैंस की परीक्षा कुछ लक्षणों को देख कर ही की जाती हैं, जिस की सफलता कार्यकर्ता के प्रशिक्षण व अनुभवों पर आधारित होती है.लक्षणों पर आधारित गर्भ परीक्षा की परंपरागत विधियों में मादा को देख कर गर्भ का अनुमान लगाना, पेट थपथपाना, प्रजनन अभिलेख, वीर्य सेचन के बाद मद में न आना आदि शामिल हैं.

कृत्रिम गर्भाधान से लाभ:
  • अच्छी नस्ल के सांड़भैंसे, जिन की तादाद कम हैं, इस विधि से उन से अधिक संख्या (प्राकृतिक गर्भाधान से 80-100 बच्चे और कृत्रिम गर्भाधान से 2000 बच्चे एक नर से प्राप्त किए जा सकते हैं) में संतति प्राप्त की जा सकती है.
  • उत्तम सांड़भैंसे से इकट्ठा किया हुआ वीर्य एक देश से दूसरे देश, एक स्थान से दूसरे स्थान व दुर्गम क्षेत्रों में भी आसानी से भेज कर नस्ल सुधार का काम किया जा सकता है.
  • नर या मादा के वीर्य या अंडाणु में कोई खराबी है, तो परीक्षण के बाद पता चल जाता है.
  • पशुपालकों को सांड़ या भैंसे के लिए दरदर भटकना नहीं पड़ता है, जिस से समय व पैसे की बचत होती है.
नवजात पशुओं की देखभाल व आहार : नवजात बच्चे भविष्य के पशुधन होते हैं. अगर शुरुआत से ही उन पर ध्यान दिया जाए, तो आगे चल कर उन से अच्छा उत्पादन ले सकते हैं. पैदा होने के बाद उचित देखरेख न होने से 3 महीने की उम्र होने तक 30-32 फीसदी बच्चों की मौत हो जाती है. बच्चे के जन्म लेने के आधे से एक घंटे के अंदर मां का पहला दूध (खीस) जरूर पिलाना चाहिए, जिस से उस के शरीर में किसी भी संक्रमण से लड़ने के लिए प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो जाए. खीस को जरूरत से ज्यादा नहीं पिलाना चाहिए, वरना दस्त होने का खतरा पैदा हो जाता है. दूध 4-4 घंटे के अंतर से 3 बार पिलाना चाहिए. 15-20 दिन के बाद बच्चों को सूखी घास, जितनी वे आराम से खा सके, खिलानी चाहिए. इस से उन के पेट का विकास तेजी से होगा. दाने की मात्रा हर हफ्ते 50 से 100 ग्राम तक बढ़ा कर देनी चाहिए.
अगर पशुपालक दूध का कारोबार कर रहे हों, तो 3 महीने के बाद भरपेट चारादाना देते रहें और अमीनो पॉवर – Amino Power नियमित रूप से दें अमीनो पॉवर -Amino Power ४६ तत्वों का सबसे शक्तिशाली और ४६ प्रोटीन्स ,विकमिन्स और मिनरल्स से भरपूर एक अनोखा टॉनिक है ,जोकी पशुओं के लिए रामबाण का काम करती है
पशुओं के बच्चे को डायरिया होने पर पशु डाक्टर को दिखाएं, वरना बच्चों की इस से बहुत जल्दी मौत हो जाती है. डायरिया की स्थिति में जब तक डॉक्टर को नहीं दिखा सकें तब तक बछड़े को निओक्सीविटा फोर्ट – Neoxyvita Forte और एलेक्ट्रल एनर्जी – Electral Energy नियमित रूप से दें ,यह काफी प्रभावकारी होगा.  डाक्टर की सलाह से कृमिनाशक दवा बच्चे को पिलानी चाहिए.

मटर की वैज्ञानिक खेती














 
मटर का प्रयोग हरी अवस्था में फलियों के रूप में सब्जी के लिए तथा सूखे दानों का प्रयोग दाल के लिए किया जाता हैं। मटर एक बहुत ही पोषक तत्वों वाली सब्जी हैं जिसमें पाचंशील प्रोटीन, कार्बोहाइडेट्स तथा विटामिन पर्याप्त मात्रा में पाया जाता हैं। इसके
अलावा इसमें खनिज पदार्थ भी पर्याप्त मात्रा में पाया जाता हैं। पतली छिलके वाली मटर की समूची फलियों और छिली हुई मटर के दानों को सुखाकर या डिब्बा बंद करके संरक्षित किया जाता हैं। जिसका प्रयोग बाद में सब्जी के रूप में किया जाता हैं। इनके अतिरिक्त मटर के हरे पौधों का प्रयोग जानवरों के हरे चारे व हरी खाद के लिए किया जाता हैं। मटर का पोषक मान निम्न तालिका 1 में प्रदर्षित हैं।
 
तालिका 1 : मटर का पोषकमान (प्रति 100 ग्राम खाद्य पदार्थ)

जल72.0 ग्रामविटामिन ‘ए‘139 आई. यू.
वसा0.1 ग्रामराइबोफलेविन0.01 मि.ग्रा.
ऊर्जा93 किलोकैलोरीथियामिन0.25 मि.ग्रा.
कार्बोहाइड्रेट15.8 ग्रामनिकोटिनिक अम्ल0.8 मि.ग्रा.
प्रोटीन7.2 ग्रामविटामिन ‘सी‘9 मि.ग्रा.
खनिज पदार्थ0.8 ग्राम




मटर की खेती हेतु आवश्यक जलवायु(Climate for Pea farming)
 
मटर की फसल के लिए नम और ठण्डी जलवायु की आवश्यकता होती हैं अतः हमारे देष में अधिकांश स्थानों पर मटर की फसल रबी की ऋतु में उगाई जाती हैं। उन सभी स्थानों पर जहाँ वार्षिक वर्षा 60 से 80 सेमी. तक होती है मटर की फसल सफलतापूर्वक उगाई  जाती है। मटर की वृद्धि काल में कम तापक्रम की आवश्यकता होती है परन्तु फसल पर पाले का अत्यंत हानिकारक प्रभाव पड़ता हैं। फलियां बनने की प्रारम्भिक अवस्था में उच्च तापक्रम एवं शुष्क जलवायु का भी हानिकारक प्रभाव पड़ता है। बीज के अंकुरण के लिए न्यनतम तापक्रम 5 डिग्री सेलसियस तथा उपयुक्त तापक्रम 22 डिग्री सेलसियस होता हैं।

भूमि

फलीदार फसल होने के कारण उन सभी कृषि योग्य भूमियों में जिसमें उपयुक्त मात्रा में नमी उपलब्ध हो सके मटर की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती हैं। मटियार दोमट तथा दोमट भूमि मटर की खेती के लिए अधिक उत्तम होती हैं। मटर के लिए ऐसी भूमि जिसका पी.एच.मान 6.0 और 7.5 के मध्य हो उपयुक्त होती हैं। अम्लीय तथा क्षारीय मृदा में फसल की अच्छी वृद्धि नही होती हैं। अच्छी फसल के लिए भूमि में जलनिकास का उत्तम प्रबंध होना अत्यंत आवश्यक होता है ताकि मृदा में वायु का आवागमन भली प्रकार सम्पन्न हो सकें।

मटर की उन्नत प्रजातियाँ (Pea varieties)

मध्यप्रदेश में उगायी जाने वाली प्रजातियाँ जैसे अर्किल, आजाद मटर- 3, पंत सब्जी मटर-3, पंत सब्जी, मटर-4, अरका अजीत इत्यादि विस्तृत रूप से ली जाती हैं।

मटर उत्पादन के लिए भूमि की तैयारी( Land preparation for Peas)

खरीफ की फसल से खेत खाली होते ही एक जुताई, गहरी की जाती है। इसके बाद 3-4 बार हैरों या देशी हल से खेत की जुताई की जाती हैं। बुवाई के समय भूमि में पर्याप्त नमी का होना आवश्यक है। नमी की कमी होने पर अन्तिम जुताई से पहले पलेवा कर देना चाहिए।

बीज दर एवं अंतरण( Seed rate )

बीज सदैव प्रमाणित एवं उपचारित बोना चाहिए। बीज को 0.25 प्रतिशत की दर से कैप्टान या थायराम से उपचारित किया जा सकता है। बीज दर बोने के समय व प्रयोग की जाने वाली जाति के अनुसार 80-120 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तथा मध्यम और पछेती फसल के लिऐ 80-100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बीज की बुबाई करते है। उचित समय पर बोई गई फसल के लिए पंक्ति की दूरी 30 से.मी. एवं पौधे से पौधे की दूरी 5 से.मी. रखते हैं।

बोने का समय एवं विधि( Sowing time and method for Peas)

मटर की बुवाई का उत्तम समय अक्टुबर की शुरुआत से नवम्बर के मध्य तक करना लाभदायक रहता है। अधिकतर बुबाई हल के द्वारा कूंडों में की जाती हैं। बुबाई के लिए सीड़ड्रिल मशीन का उपयोग किया जाता हैं। पौधों के बीच का अंतर 6-7 से.मी. रखते हैं। बीज को 4-5 से.मी. गहराई पर बोते हैं।

बीज उपचार(Seed treatment)

बुवाई से पहले बीज का उपचार फफूंद नाशक दवाओं, कैप्टान या थीराम के मिश्रण से करना चाहिए। प्रति कि.ग्रा. बीज में 3 ग्राम फफूंद नाशक का मिश्रण काफी हैं।

बीज निवेशन

खेत में बोने से पहले बीज का उपचार राइजोबियाम बैक्टीरिया से होना आवश्यक हैं क्योंकि अधिकांश क्षेत्रों में राइजोबियम बैक्टीरिया की मृदाओं में कमीं हैं। इस बैक्टीरिया के प्रयोग से नत्रजन की मात्रा लगभग 100 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर तक कम कर सकते हैं। मृदा में बैक्टीरिया के पहुँचाने की दो विधियाँ है:-
  1. अगर बैक्टीरिया कल्चर समय पर उपलब्ध न हो तो पुराने खेत में जिसमें 2-3 साल से लगातार मटर की खेती की जा रही हैं। और मृदा में बैक्टीरिया काफी है, से 1 टन मिट्टी लेकर एक हैक्टेयर खेत में छिड़क देनी चाहिए।
  2. बीज के साथ कल्चर को मिलाने के लिये 10 प्रतिशत का गुड़ का घोल (100 ग्राम 1 ली. पानी) 15 मिनट तक उबाल कर कमरे के तापक्रम पर ठण्डा कर लिया जाता हैं। इस घोल को बीज के उपर छिड़क कर बीज के साथ मिलाकर कल्चर इसमे मिला दिया जाता है। और बीज को छाया में सुखाते हैं। इस प्रकार इस बैक्टीरिया की एक पतली सतह प्रत्येक बीज पर जम जाती हैं। कल्चर मिलाया हुआ बीज कभी भी धूप में नही सुखाना चाहिए अन्यथा बैक्टीरिया नष्ट हो सकते है। बीज को अधिक समय तक भी कल्चर मिलाने के बाद नही रखना चाहिए। शीघ्र ही इस बीज की बुआई कर देनी चाहिए।

मटर के लिए खाद एवं उवर्रक(Fertilizers for Peas)

मटर की फसल दलहनी वर्ग  में आती है। अतः इसे नत्रजन की विशेष आवश्यकता नही होती हैं। प्रारम्भ में राइजोबियम बैक्टीरिया के क्रियाशील होने तक 20-30 कि. ग्रा. नत्रजन प्रति हैक्टेयर की आवश्यकता होती हैं। इसके अतिरिक्त 50-60 कि.ग्रा. फास्फोरस व 40-50 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर देना आवश्यक हैं। उर्वरक सदैव बीज की कतारों से 5 से.मी. की दूरी पर बीज सतह से 3-4 से.मी. की गहराई पर डालना चाहिए। फास्फेट उर्वरक उपज में वृद्धि के साथ गुणवत्ता में भी वृद्धि करता हैं। पोटाषिक उर्वरक भी उपज में वृद्धि तथा नत्रजन स्थिरीकरण में सहायता करते हैं। गोबर की खाद 20 टन प्रति हैक्टेयर की दर से भूमि की तैयारी के समय ही देना लाभदायक रहता हैं।

सिंचाई(Irrigation of Peas)

मटर की उन्नतशील जातियों में दो सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। शीतकालीन वर्षा हो जाने पर दूसरी सिंचाई की आवश्यकता नही पड़ती । पहली सिंचाई फूल निकलते समय बोने के 45 दिन बाद व दूसरी सिंचाई आवश्यकता पड़ने पर फल बनते समय, बोने के 60 दिन बाद करें। सिंचाई सदैव हल्की करनी चाहिए। स्प्रिंकलर सिस्टम का प्रयोग सिंचाई के लिए उपयुक्त होता हैं।

निराई-गुड़ाई(Weeding)

फसल बोने के 35-40 दिन तक फसल को खरपतवारों से बचाना आवश्यक हैं आवश्यकतानुसार एक या दो निराई बोने के 30-35 दिन बाद करनी चाहिए। रासायनिक विधि से खरपतवार नियन्त्रण करने के लिए 1 कि. ग्रा. फलुक्लोरेलिन (बेसालिन) का 800-1000 ली. पानी में घोल बनाकर, फसल बोने से पहले, एक हैक्टेयर में छिड़काव कर नम मिट्टी में 4-5 सेमी. गहरे तक हैरो या कल्टीवेटर की सहायता से मिला देना चाहिए।

फलियों की तुड़ाई

सब्जी के लिए नवम्बर माह में बोई गई फसल जनवरी के मध्य से फरवरी के अंत तक फलियाँ देती हैं। फलियों को 10-12 दिन के अंतर पर 3-4 बार में तोड़ते हैं। अगेती प्रजातियाँ जैसे अर्किल दिसम्बर के अंत तक फलियाँ देने लगती हैं। फलियों से सब्जियों के लिए तोड़ते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि फलियों में दाने पूर्णतया भर गए हों और फलियों के छिलके का रंग हरा हो। छिलके का रंग पीला पड़ने पर बाजार में फलियों की कीमत कम मिलती हैं।

उपज(Yield per acre)

हरी फलियों की पैदावार 40-50 कु./हे. तक अगेती से प्राप्त किया जा सकता हैं। मध्यम तथा पछेती फसल से 60-70 कु./हे. उपज प्राप्त हो जाती हैं। तथा फलियाँ तोड़ने के पश्चात् 150 कु./हे. तक हरा चारा प्राप्त होता हैं।

मटर के रोग व उनकी रोकथाम(Pea diseases and their management)

1. चूर्णी फफूंदी रोग (पाउडरी मिल्डयू) 
यह रोग एरीसाइफी पालीगोनी नामक फफूंदी से लगती हैं। यह रोग अधिकतर नम मौसम में लगता है। पत्तियों पर सफेद चूर्ण जैसी रचना दिखाई देती हैं। पछेती किस्मों में इसक आक्रमण गेभीर रूप् से होता हैं। इस बीमारी की रोकथाम के लिए 3 किग्रा. घुलनशील गंधक या सल्फेक्स को 1000 ली. पानी में घोलकर एक हैक्टेयर में छिड़कें। यदि आवश्यकता हो तो 15 दिन बाद दूसरा छिड़काव करें। रोग रोधी किस्में जैसे- अर्का अजीत, पंत सब्जी मटर-4 आदि किस्मों को उगायें।
2. गेरूई रोग (रस्ट) 
यह रोग यूरोमाइसीज फेबी नामक फफूंदी से लगता हैं। यह रोग कभी-कभी फसल को अधिक क्षति पहुंचाता हैं। इसे रोकने के लिए रोग रोधी किस्मों को ही खेत में उगाना चाहिए। इसकी रोकथाम के लिए डाइथेन एम-45 या डाइथेन जेड-78 के 2.25 कि.ग्रा. को 1000 ली. पानी में घोलकर, प्रति हैक्टेयर छिड़काव करें।

मटर में हानिकारक कीट एवं उनकी रोकथाम (Pests of Pea and their management)
1. एफिड़ 
ये जनवरी में अन्तिम सप्ताह में दिखाई देने लगते हैं और वयस्क दानों व पत्तियों के रस को चूसते हैं। इसकी रोकथाम के लिए इमीडाक्लोप्रिड 0.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी की दर से छिड़कना चाहिए। इसके अलावा रोटेनोन या रोटैनोन – निकोटिन का छिड़काव किया जा सकता हैं।
2. तना छेदक 
यह कीट अगेती फसल के लिए बहुत हानिकारक हैं। यह कीड़ा मुलायम हरे तने तथा पीटिओल में छेद करके अंदर सुंरग बनाता हैं। जिससे पौधे सूखकर मर जाते हैं। वयस्क कीट पत्तियों को नुकसान पहुंचाता हैं। पत्तियाँ पीली तथा सूख जाती हैं। इसकी रोकथाम के लिए मटर को नवम्बर में बोना चाहिए तथा ट्राइजोफास 0.75-1.00 मि.ली./ली. पानी से सप्ताहिक अंतराल से दो बार छिड़काव करना चाहिए अथवा बीज का उपचार क्लोरपाईरीफास (5 मिली./कि.बीज) से करके बुबाई करनी चाहिए।
3. फली छेदक
इन कीटों की इल्लियां फली में छेद करके उसमें हरे दानों को खा जाती हैं। इसके लिए ट्राइजोफास 1.00 मि.ली./ली. या प्रोफेनोफास 0.75-1.00 मिली./ली. पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए।

नवजात बछडे की देखभाल

 

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बछड़े की देखभाल शुरुआती दौर में अच्छी तरह से होना काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज की बछड़ी कल की होने वाली गाय या भैंस है। जन्म से ही उसकी सही देखभाल रखने से भविष्य में वह अच्छी गाय या भैंस बन सकती है।

बछड़े की देखभाल शुरुआती दौर में -

1.    जन्म के ठीक बाद बछड़े के नाक और मुंह से कफ अथवा श्लेष्मा इत्यादि को साफ करें।
2.    आमतौर पर गाय बछड़े को जन्म देते ही उसे जीभ से चाटने लगती है। इससे बछड़े के शरीर को सूखने में आसानी होती है और श्वसन तथा रक्त संचार सुचारू होता है। यदि गाय बछड़े को न चाटे तो ठंडी जलवायु की स्थिति में बछड़े के शरीर को सूखे कपड़े या टाट से पोंछकर सुखाएं। हाथ से छाती को दबाकर और छोड़कर कृत्रिम श्वसन प्रदान करें ।
3.    नाभ नाल में शरीर से 2-5 सेमी की दूरी पर गांठ बांध देनी चाहिए और बांधे हुए स्थान से 1 सेमी नीचे से काटकर टिंक्चर आयोडीन या बोरिक एसिड अथवा कोई भी अन्य एंटिबायोटिक लगाना चाहिए।
4.    बाड़े के गीले बिछौने को हटाकर स्थान को बिलकुल साफ और सूखा रखना चाहिए।
5.    बछड़े के वजन का ब्योरा रखना चाहिए।
6.    गाय के थन और स्तनाग्र को क्लोरीन के घोल द्वारा अच्छी तरह साफकर सुखाएं।
7.    बछड़े को मां का पहला दूध अर्थात् खीस का पान करने दें।
8.    बछड़ा एक घंटे में खड़े होकर दूध पीने की कोशिश करने लगता है। यदि ऐसा न हो तो कमजोर बछड़े की मदद करें ।

बछड़े का भोजन:-

1.    नवजात बछड़े को दिया जाने वाला सबसे पहला और सबसे जरूरी आहार है मां का पहला दूध अर्थात् खीस। खीस का निर्माण मां के द्वारा बछड़े के जन्म से 3 से 7 दिन बाद तक किया जाता है और यह बछड़े के लिए पोषण और तरल पदार्थ का प्राथमिक स्रोत होता है। यह बछड़े को आवश्यक प्रतिरोधक क्षमता भी उपलब्ध कराता है जो उसे संक्रामक रोगों और पोषण संबंधी कमियों का सामना करने की क्षमता देता है। यदि खीस उपलब्ध हो तो जन्म के बाद पहले तीन दिनों तक नवजात को खीस पिलाते रहना चाहिए।  
2.    जन्म के बाद खीस के अतिरिक्त बछड़े को 3 से 4 सप्ताह तक मां के दूध की आवश्यकता होती है। उसके बाद बछड़ा वनस्पति से प्राप्त मांड और शर्करा को पचाने में सक्षम होता है। आगे भी बछड़े को दूध पिलाना पोषण की दृष्टि से अच्छा है लेकिन यह अनाज खिलाने की तुलना में महंगा होता है। बछड़े को दिए जाने वाले किसी भी द्रव आहार का तापमान लगभग कमरे के तापमान अथवा शरीर के तापमान के बराबर होना चाहिए।  
3.    बछड़े को खिलाने के लिए इस्तेमाल होने वाले बर्तनों को अच्छी तरह साफ रखें। इन्हें और खिलाने में इस्तेमाल होने वाली अन्य वस्तुओं को साफ और सूखे स्थान पर रखें।  
 
पानी का महत्व:-
ध्यान रखें हर वक्त साफ और ताजा पानी उपलब्ध रहे। बछड़े को जरूरत से ज्यादा पानी एक ही बार में पीने से रोकने के लिए पानी को अलग-अलग बर्तनों में और अलग-अलग स्थानों में रखें। 
 
खिलाने की व्यवस्थाः-
बछड़े को खिलाने की व्यवस्था इस बात पर निर्भर करती है कि उसे किस प्रकार का भोज्य पदार्थ दिया जा रहा है। इसके लिए आमतौर पर निम्नलिखित व्यवस्था अपनाई जाती है -  
बछड़े को पूरी तरह दूध पर पालना।
1.    मक्खन निकाला हुआ दूध देना।  
2.    दूध की बजाए अन्य द्रव पदार्थ जैसे ताजा छाछ, दही का मीठा पानी, दलिया इत्यादि देना।
3.    दूध के विकल्प देना।  
4.    काफ स्टार्टर देना।
5.    पोषक गाय का दूध पिलाना।
6.    पूरी तरह दूध पर पालना।
 
50 किलो औसत शारीरिक वजन के साथ तीन महीने की उम्र तक के नवजात बछड़े की पोषण आवश्यकता इस प्रकार है-

1.सूखा पदार्थ (डीएम) 1.43 किलो
2.पचने योग्य कुल पोषक पदार्थ (टीडीएन) 1.60 किलो
3.कच्चे प्रोटीन 3.15 किलो

यह ध्यान देने योग्य है कि टीडीएन की आवश्यकता डीएम से अधिक होती है क्योंकि भोजन में वसा का उच्च अनुपात होना चाहिए। 15 दिनों बाद बछड़ा घास टूंगना शुरू कर देता है जिसकी मात्रा लगभग आधा किलो प्रतिदिन होती है, जो 3 महीने बाद बढ़कर 5 किलो हो जाती है।
इस दौरान हरे चारे के स्थान पर 1-2 किलो अच्छे प्रकार का सूखा चारा (पुआल) बछड़े का आहार हो सकता है जो 15 दिन की उम्र में आधा किलो से लेकर 3 महीने की उम्र में डेढ़ किलो तक दिया जा सकता है।  
3 सप्ताह के बाद यदि संपूर्ण दूध की उपलब्धता कम हो तो बछड़े को मक्खन निकाला हुआ दूध, छाछ अथवा अन्य दुग्धीय तरल पदार्थ दिया जा सकता है।
 
बछड़े को दिया जाने वाला मिश्रित आहार-
बछड़े का मिश्रित आहार एक सांद्र पूरक आहार है जो ऐसे बछड़े को दिया जाता है जिसे दूध अथवा अन्य तरल पदार्थों पर पाला जा रहा हो। बछड़े का मिश्रित आहार मुख्य रूप से मक्के और जई जैसे अनाजों से बना होता है।
जौ, गेहूं और ज्वार जैसे अनाजों का इस्तेमाल भी इस मिश्रण में किया जा सकता है। बछड़े के मिश्रित आहार में 10 प्रतिशत तक गुड़ का इस्तेमाल किया जा सकता है। एक आदर्श मिश्रित आहार में 80 प्रतिशत टीडीएन और 22 प्रतिशत सीपी होता है।
अतः इन सभी बातों का ध्यान रखकर एवं वैज्ञानिक विधि अपनाकर पशुपालक अपने पशुओं को स्वस्थ एवं डेयरी व्यवसाय को फायदेमंद बना सकते हैं।

कृषि एवं पशु पालन से जुड़ी विभिन्न योजनाएं




01) वानिकी विकास कार्यक्रमों के लिए वित्तपोषण योजना
02) एग्री क्लिनिक्स एवं एग्री बिजनैस केन्द्र (एसीएबीसी) की स्थापना के लिए कृषि स्नातकों को वित्तपोषण योजना
03) बंजर भूमि विकास योजना हेतु वित्तपोषण योजना (ट्री पट्टा योजना सहित)
04) निवेश प्रमोशन योजना के अंतर्गत गैर-वानिकी बंजर भूम.
05)  कृषि उद्देश्य के लिए भूमि की खरीद हेतु किसानों को वित्तपोषण हेतु योजना
06) भूमि खरीदने तथा अन्य कृषि कार्य-कलापों के लिए कृषि स्नातकों को वित्तीय सहायता प्रदान करने की योजना
07) मशरुम की खेती हेतु वित्तपोषण योजना
08) मशरुम स्पान उत्पादन हेतु वित्तपोषण योजना
09) बायोगैस यूनिटों की स्थापना के लिए वित्तपोषण योजना
10) डीलरों को कृषि निविष्टियों के लिए पशु चारा, मुर्गीदाना, डेयरी फीड इत्यादि
11) मुर्गीपालन के लिए वित्तपोषण योजना
12) डेयरी विकास कार्यक्रमों के लिए वित्तपोषण योजना
13) दूध उत्पादन कार्यकलापों के लिए वित्तपोषण अर्थात दूध उत्पादन के लिए दुधारू पशुओं (गाय/भैंसों) की खरीद व रखरखाव
14) अच्छी नस्ल के दुधारू पशुओं हेतु वित्तपोषण योजना
15) पशुपालन से सम्बध्द अन्य नवीन कार्यकलापों के लिए वित्तपोषण
16) डेयरी विकास कार्ड योजना (चुने हुए राज्यों में लागू)
17) नई भैंस खरीदना / मौजूदा भैंस को बदलना
18) मत्स्य विकास वित्तपोषण हेतु योजना
19) मेरीन मछली पालन वित्तपोषण योजना
20)  भेड़-बकरी पालन हेतु वित्तपोषण योजना
21) सूअर विकास हेतु वित्तपोषण योजना
22) गाड़ी एवं भार ढोने वाले पशुओं की खरीद हेतु वित्तपोषण योजना
23) मधुमक्खी पालन वित्तपोषण योजना
24) रेशम उत्पादन के वित्तपोषण के लिए योजना
25) किचन गार्डनिंग वित्तपोषण योजना
26) पीएनबी कृषि कार्ड योजना
27) पादप गृहों के वित्त पोषण के लिए योजना
28) पीएनबी कल्याणी कार्ड योजना
29) पीएनबी जनरल क्रेडिट कार्ड (जीसीसी)
30) पीएनबी कृषक साथी योजना (केएसएस)
31) सौर उर्जा प्रकाश प्रणाली के वित्तपोषण के लिए योजना (एसईएलसी)
32) कृषि अग्रिमों के लिए मार्जिन संबंधी मानदण्ड