Monday, November 11, 2019

कृषि एवं पशु पालन से जुड़ी विभिन्न योजनाएं



कृषि एवं पशु पालन से जुड़ी विभिन्न योजनाएं


01) वानिकी विकास कार्यक्रमों के लिए वित्तपोषण योजना
02) एग्री क्लिनिक्स एवं एग्री बिजनैस केन्द्र (एसीएबीसी) की स्थापना के लिए कृषि स्नातकों को वित्तपोषण योजना
03) बंजर भूमि विकास योजना हेतु वित्तपोषण योजना (ट्री पट्टा योजना सहित)
04) निवेश प्रमोशन योजना के अंतर्गत गैर-वानिकी बंजर भूम.
05) कृषि उद्देश्य के लिए भूमि की खरीद हेतु किसानों को वित्तपोषण हेतु योजना
06) भूमि खरीदने तथा अन्य कृषि कार्य-कलापों के लिए कृषि स्नातकों को वित्तीय सहायता प्रदान करने की योजना
07) मशरुम की खेती हेतु वित्तपोषण योजना
08) मशरुम स्पान उत्पादन हेतु वित्तपोषण योजना
09) बायोगैस यूनिटों की स्थापना के लिए वित्तपोषण योजना
10). डीलरों को कृषि निविष्टियों के लिए पशु चारा, मुर्गीदाना, डेयरी फीड इत्यादि
11)  मुर्गीपालन के लिए वित्तपोषण योजना
12)  डेयरी विकास कार्यक्रमों के लिए वित्तपोषण योजना
13) दूध उत्पादन कार्यकलापों के लिए वित्तपोषण अर्थात दूध उत्पादन के लिए दुधारू पशुओं (गाय/भैंसों) की खरीद व रखरखाव
14) अच्छी नस्ल के दुधारू पशुओं हेतु वित्तपोषण योजना
15) पशुपालन से सम्बध्द अन्य नवीन कार्यकलापों के लिए वित्तपोषण
16) डेयरी विकास कार्ड योजना (चुने हुए राज्यों में लागू)
17) नई भैंस खरीदना / मौजूदा भैंस को बदलना
18) मत्स्य विकास वित्तपोषण हेतु योजना
19) मेरीन मछली पालन वित्तपोषण योजना
20) भेड़-बकरी पालन हेतु वित्तपोषण योजना
21) सूअर विकास हेतु वित्तपोषण योजना
22) गाड़ी एवं भार ढोने वाले पशुओं की खरीद हेतु वित्तपोषण योजना
23) मधुमक्खी पालन वित्तपोषण योजना
24) रेशम उत्पादन के वित्तपोषण के लिए योजना
25) किचन गार्डनिंग वित्तपोषण योजना
26) पीएनबी कृषि कार्ड योजना
27) पादप गृहों के वित्त पोषण के लिए योजना
28) पीएनबी कल्याणी कार्ड योजना
29) पीएनबी जनरल क्रेडिट कार्ड (जीसीसी)
30) पीएनबी कृषक साथी योजना (केएसएस)
31) सौर उर्जा प्रकाश प्रणाली के वित्तपोषण के लिए योजना (एसईएलसी)
32) कृषि अग्रिमों के लिए मार्जिन संबंधी मानदण्ड

गेहू बुवाई की जानकारी


 
खेत की तैयारी

गेहूं की बुवाई अधिकतर धान के बाद की जाती है। अतः गेहूं की बुवाई में बहुधा देर हो जाती है। हमे पहले से यह निश्चित कर लेना होगा कि खरीफ में धान की कौन सी प्रजाति का चयन करें और रबी में उसके बाद गेहूं की कौन सी प्रजाति बोये। गेहूं की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए धान की समय से रोपाई आवश्यक है जिससे गेहूं के लिए अक्टूबर माह में खाली हो जायें। दूसरी बात ध्यान देने योग्य यह है कि धान में पडलिंग लेवा के कारण भूमि कठोर हो जाती है। भारी भूमि से पहले मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई के बाद डिस्क हैरो से दो बार जुताई करके मिट्टी को भुरभुरी बनाकर ही गेहूं की बुवाई करना उचित होगा। डिस्क हैरो के प्रयोग से धान के ठूंठ छोटे छोटे टुकड़ों मे कट जाते है। इन्हे शीध्र सड़ाने हेतु 15-20 किग्रा० नत्रजन (यूरिया के रूप में) प्रति हेक्टर खेत को तैयार करते समय पहली जुताई पर अवश्य दे देना चाहियें। ट्रैक्टर चालित रोटावेटर द्वारा एक ही जुताई में खेत पूर्ण रूप से तैयार हो जाता है।

बुवाई का समय

उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्रों में सिंचित दशा में गेहूं बोने का उपयुक्त समय नवम्बर का प्रथम पखवाड़ा है| लेकिन उत्तरी-पूर्वी भागों में मध्य नवम्बर तक गेहूं बोया जा सकता है| देर से बोने के लिए उत्तर-पश्चिमी मैदानों में 25 दिसम्बर के बाद तथा उत्तर-पूर्वी मैदानों में 15 दिसम्बर के बाद गेहूं की बुवाई करने से उपज में भारी हानि होती है| इसी प्रकार बारानी क्षेत्रों में अक्टूबर के अन्तिम सप्ताह से नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक बुवाई करना उत्तम रहता है| यदि भूमि की ऊपरी सतह में संरक्षित नमी प्रचुर मात्रा में हो तो गेहूं की बुवाई 15 नवम्बर तक कर सकते हैं|
 
बीज दर एवं बीज शोधन

लाइन में बुआई करने पर सामान्य दशा में 100 किग्रा० तथा मोटा दाना 125 किग्रा० प्रति है, तथा छिटकवॉ बुआई की दशा में सामान्य दाना 125 किग्रा० मोटा-दाना 150 किग्रा० प्रति हे0 की दर से प्रयोग करना चाहिए। बुआई से पहले जमाव प्रतिशत अवश्य देख ले। राजकीय अनुसंधान केन्द्रों पर यह सुविधा निःशुल्क उपलबध है। यदि बीज अंकुरण क्षमता कम हो तो उसी के अनुसार बीज दर बढ़ा ले तथा यदि बीज प्रमाणित न हो तो उसका शोधन अवश्य करें। बीजों का कार्बाक्सिन, एजेटौवैक्टर व पी.एस.वी. से उपचारित कर बोआई करें। सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों में रेज्ड वेड विधि से बुआई करने पर सामान्य दशा में 75 किग्रा० तथा मोटा दाना 100 किग्रा० प्रति हे0 की दर से प्रयोग करे।

पंक्तियों की दूरी

सामान्य दशा में 18 सेमी० से 20 सेमी० एवं गहराई 5 सेमी० ।

विलम्ब से बुआई की दशा में

15 सेमी० से 18 सेमी० तथा गहराई 4 सेमी० ।

विधि

बुआई हल के पीछे कूंड़ों में या फर्टीसीडड्रिल द्वारा भूमि की उचित नमी पर करें। पलेवा करके ही बोना श्रेयकर होता है। यह ध्यान रहे कि कल्ले निकलने के बाद प्रति वर्गमीटर 400 से 500 बालीयुक्त पौधे अवश्य हों अन्यथा इसका उपज पर कुप्रभाव पड़ेगा। विलम्ब से बचने के लिए पन्तनगर जीरोट्रिल बीज व खाद ड्रिल से बुआई करें। ट्रैक्टर चालित रोटो टिल ड्रिल द्वारा बुआई अधिक लाभदायक है। बुन्देलखण्ड (मार व कावर मृदा) में बिना जुताई के बुआई कर दिया जाय ताकि जमाव सही हो।
 
बोआई की विधियाँ : 
आमतौर  पर गेहूँ की बोआई चार बिधियो  से (छिटककर, कूड़ में चोगे या सीड ड्रिल से तथा डिबलिंगसे की जाती है  । गेहूं बोआई हेतु स्थान विशेष की परिस्थिति अनुसार विधियाँ प्रयोग में लाई जा सकती हैः

छिटकवाँ विधि :
इस विधि में बीज को हाथ से समान रूप से खेत में छिटक दिया जाता है और पाटा अथवा देशी हल चलाकर बीज को मिट्टी से ढक दिया जाता है। इस विधि से गेहूँ उन स्थानो पर बोया जाता है, जहाँ अधिक वर्षा होने या मिट्टी भारी दोमट होने से नमी अपेक्षाकृत अधिक समय तक बनी रहती है । इस विधि से बोये गये गेहूँ का अंकुरण ठीक से नही हो पाता, पौध  अव्यवस्थित ढंग से उगते है,  बीज अधिक मात्रा में लगता है और पौध  यत्र्-तत्र् उगने के कारण निराई-गुड़ाई  में असुविधा होती है परन्तु अति सरल विधि होने के कारण कृषक इसे अधिक अपनाते है ।

हल के पीछे कूड़ में बोआई:
गेहूँ बोने की यह सबसे अधिक प्रचलित विधि है । हल के पीछे कूँड़ में बीज गिराकर दो विधियों से बुआई की जाती है -

(हल के पीछे हाथ से बोआई (केरा विधि):
इसका प्रयोग उन स्थानों पर किया जाता है जहाँ बुआई अधिक रकबे में की जाती  है तथा खेत में पर्याप्त नमी  रहती हो  । इस विधि मे देशी हल के पीछे बनी कूड़ो  में जब एक व्यक्ति खाद और  बीज मिलाकर हाथ से बोता चलता है तो  इस विधि को  केरा विधि कहते है । हल के घूमकर दूसरी बार आने पर पहले  बने कूँड़ कुछ स्वंय ही ढंक जाते है । सम्पूर्ण खेत बो  जाने के बाद पाटा चलाते है, जिससे बीज भी ढंक जाता है और  खेत भी चोरस हो  जाता है ।

() देशी हल के पीछे नाई बाँधकर बोआई (पोरा विधि):
इस विधि का प्रयोग असिंचित क्षेत्रों या नमी की कमी वाले क्षेत्रों में किया जाता है। इसमें नाई, बास या चैंगा हल के पीछे बंधा रहता है। एक ही आदमी हल चलाता है तथा दूसरा बीज डालने का कार्य करता है। इसमें उचित दूरी पर देशी हल द्वारा 5 - 8 सेमी. गहरे कूड़ में बीज पड़ता है । इस विधि मे बीज समान गहराई पर पड़ते है जिससे उनका समुचित अंकुरण होता है। कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए देशी हल के स्थान पर कल्टीवेटर का प्रयोग कर सकते हैं क्योंकि कल्टीवेटर से एक बार में तीन कूड़ बनते है।
सीड ड्रिल द्वारा बोआई:
यह पोरा विधि का एक सुधरा रूप है। विस्तृत क्षेत्र में बोआई करने के लिये यह आसान तथा सस्ता ढंग है । इसमे बोआई बैल चलित या ट्रेक्टर चलित बीज वपित्र द्वारा की जाती है। इस मशीन में पौध अन्तरण   व बीज दर का समायोजन  इच्छानुसार किया जा सकता है। इस विधि से बीज भी कम लगता है और बोआई निश्चित दूरी तथा गहराई पर सम रूप से हो पाती है जिससे अंकुरण अच्छा होता है । इस विधि से  बोने में समय कम लगता है ।

डिबलर द्वारा बोआई:
इस विधि में प्रत्येक बीज क¨ मिट्टी में छेदकर निर्दिष्ट स्थान पर मनचाही गहराई पर बोते है । इसमें एक लकड़ी का फ्रेम को खेत में रखकर दबाया जाता है तो खूटियो से भूमि मे छेद हो जाते हैं जिनमें 1-2 बीज प्रति छेद की दर से डालते हैं। इस विधि से बीज की मात्रा काफी कम (25-30 किग्रा. प्रति हेक्टर) लगती है परन्तु समय व श्रम अधिक लगने के कारण उत्पादन लागत बढ़ जाती है।

फर्ब विधि:
इस विधि में सिंचाई जल बचाने के उद्देश्य से ऊँची उठी हुई क्यारियाँ तथा नालियाँ बनाई जाती है । क्यारियो की चोड़ाई इतनी रखी जाती है कि उस पर 2-3 कूड़े आसानी से बुआई की जा सके तथा नालियाँ सिंचाई के लिए प्रयोग में ली जाती है । इस प्रकार लगभग आधे सिंचाई जल की बचत हो जाती है । इस विधि में सामान्य प्रचलित विधि की तुलना में उपज अधिक प्राप्त होती है । इसमें ट्रैक्टर चालित यंत्र् से बुवाई की जाती है । यह यंत्र क्यारियाँ बनाने, नाली बनाने तथा क्यारी पर कूंड़ो  में एक साथ बुवाई करने का कार्य करता है ।

शून्य कर्षण सीड ड्रिल विधि:
धान की कटाई के उपरांत किसानों को रबी की फसल गेहूं आदि के लिए खेत तैयार करने पड़ते हैं। गेहूं के लिए किसानों को अमूमन 5-7 जुताइयां करनी पड़ती हैं। ज्यादा जुताइयों की वजह से किसान समय पर गेहूं की ब¨आई नहीं कर पाते, जिसका सीधा असर गेहूं के उत्पादन पर पड़ता है। इसके अलावा इसमें लागत भी अधिक आती है। ऐसे में किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। शून्य कर्षण से किसानों का समय तो बचता ही है, साथ ही लागत भी कम आती है, जिससे किसानों का  लाभ काफी बढ़ जाता है। इस विधि के माध्यम से खेत की जुताई और बिजाई दोनों ही काम एक साथ हो जाते हैं। इससे बीज भी कम लगता है और पैदावार करीब 15 प्रतिशत बढ़ जाती है। खेत की तैयारी में लगने वाले श्रम व सिंचाई के रूप में भी करीब 15 प्रतिशत बचत होती है। इसके अलावा खरपतवार प्रक¨प भी कम होता है, जिससे खरपतवारनाशकों का खर्च भी कम हो जाता है। समय से बुआई होने से पैदावार भी अच्छी होती है।

उन्नत किस्में
गेहूं उत्पादक किसान बन्धुओं को अपने क्षेत्र की प्रचलित और अधिकतम उपज देने वाली के साथ-साथ विकार रोधी किस्म का चयन करना चाहिए| ताकि इस फसल से अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सके कुछ प्रचलित और उन्नत किस्में इस प्रकार है, जैसे-

सिंचित अवस्था में समय से बुवाई- एच डी- 2967, एच डी- 4713, एच डी- 2851, एच डी- 2894, एच डी- 2687, डी बी डब्ल्यू- 17, पी बी डब्ल्यू- 550, पी बी डब्ल्यू- 502, डब्ल्यू एच- 542, डब्ल्यू- एच- 896 और यू पी- 2338 आदि प्रमुख है, इनका बुवाई का उपयुक्त समय 10 नवम्बर से 25 नवम्बर माना जाता है|

सिंचित अवस्था में देरी से बुवाई- एच डी- 2985, डब्ल्यू आर- 544, राज- 3765, पी बी डब्ल्यू- 373, डी बी डब्ल्यू- 16, डब्ल्यू एच- 1021, पी बी डब्ल्यू- 590 और यू पी- 2425 आदि प्रमुख है, इनका बुवाई का उपयुक्त समय 25 नवम्बर से 25 दिसम्बर माना जाता है|

असिंचित अवस्था में समय से बुवाई- एच डी- 2888, पी बी डब्ल्यू- 396, पी बी डब्ल्यू- 299, डब्ल्यू एच- 533, पी बी डब्ल्यू- 175 और कुन्दन आदि प्रमुख है|

लवणीय मृदाओं के लिए- के आर एल- 1, 4 व 19 प्रमुख है|

पोषक तत्व प्रबंधन

गेहूं उगाने वाले ज्यादातर क्षेत्रों में नाइट्रोजन की कमी पाई जाती है तथा फास्फोरस और पोटाश की कमी भी क्षेत्र विशेष में पाई जाती है| पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में गंधक की कमी भी पाई गई है| इसी प्रकार सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे जस्ता, मैंगनीज तथा बोरॉन की कमी गेहूं उगाये जाने वाले क्षेत्रों में देखी गई है| इन सभी तत्वों की भूमि में मृदा परीक्षण को आधार मानकर आवश्यकतानुसार प्रयोग करना चाहिए| लेकिन ज्यादातर किसान विभिन्न कारणों से मृदा परीक्षण नहीं करवा पाते हैं| ऐसी स्थिति में गेहूं के लिए संस्तुत दर इस प्रकार है, जैसे-

समय से सिंचित दशा-
में लगभग 125 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस तथा 40 से 60 किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है|

विलम्ब से बुवाई-
की अवस्था में तथा कम पानी की उपलब्धता वाले क्षेत्रों में समय से बुवाई की अवस्था में लगभग 20 से 40 किलोग्राम पोटाश की अधिक आवश्यकता होती है|

बारानी क्षेत्रों-
में समय से बुवाई करने पर 40 से 50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 20 से 30 किलोग्राम फास्फोरस तथा 25 किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है|असिंचित दशा में उर्वरकों को कूड़ों में बीजों से 2 से 3 सेंटीमीटर गहरा डालना चाहिए तथा बालियां आने से पहले यदि पानी बरस जाए तो 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन का छिड़काव करना चाहिए|

सिंचाई प्रबंधन

बुवाई के पश्चात फसल की क्रान्तिको अवस्थाओं पर सिंचाई करने से 6 सिंचाई पर्याप्त होती है| प्रथम सिंचाई शीर्ष जड़ जमते समय जब फसल 20 से 25 दिन की हो जाये तब करनी चाहिये| दूसरी सिंचाई जब कल्ले बनने लगे तथा फसल 45 से 50 दिन की हो जाये, तीसरी सिंचाई गाँठ बनते समय बुवाई के 65 से 70 दिन बाद, चौथी सिंचाई बालियाँ निकलते समय बुवाई के 85 से 90 दिन बाद, पाँचवी सिंचाई 100 से 110 दिन बाद जब फसल दूधिया अवस्था में हो तथा अंतिम सिंचाई दाना पकते समय करनी चाहिये, जब फसल 115 से 120 दिन की हो जाये|
यदि सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता कम हो तथा चार सिंचाई ही दे सकते हो तो शीर्ष जड़ बनते समय, गाँठ बनते समय, बालियां निकलते समय और दाना पकते समय करनी चाहिये| सिंचाई फुव्वारा विधि से करनी चाहिये| इसमें क्यारी सिंचाई की अपेक्षा कम पानी की आवश्यकता होती है| गेहूं की खेती में सिंचाई व्यवस्था की पूरी जानकारी यहाँ पढ़ें.

खरपतवार नियंत्रण

गेंहू की फसल के साथ अनेको खरपतवार जिनमें गोयला, चील, प्याजी, मोरवा, गुल्ली डन्डा व जंगली जई इत्यादि उगते है और पोषक तत्व, नमी व स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा कर फसल उत्पादन को काफी कम कर देते है| अधिक पैदावार प्राप्त करने के लिए उचित खरपतवार नियंत्रण उचित समय पर करना बहुत ही आवश्यक है| फसल के बुवाई के एक या दो दिन पश्चात तक पेन्डीमैथालीन खरपतवारनाशी की 2.50 लीटर मात्रा 500 पानी में घोल बनाकर समान रूप से छिड़काव कर देना चाहिये|
यदि खेत में गुल्ली डंडा व जंगली जई का प्रकोप अधिक हो तो आइसोप्रोटूरोन या मैटाक्सिंरान खरपतवारनाशी की 1 किलोग्राम मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव कर देना चाहिये| इसके उपरान्त फसल जब 30 से 35 दिन की हो जाये तो 2, 4-डी की 750 ग्राम मात्रा को 600 से 700 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव कर देना चाहिये|

कटाई एवं मॅडाई

जब पौधे पीले पड़ जाये तथा बालियां सूख जाये तो फसल की कटाई कर लेनी चाहिये| जब दानों में 15 से 20 प्रतिशत नमी हो तो कटाई का उचित समय होता है| कटाई के पश्चात् फसल को 3 से 4 दिन सूखाना चाहिये तथा मंडाई करके अनाज में जब 8 से 10 प्रतिशत नमी रह जाये तो भंडारण कर देना चाहिये|

पैदावार

गेहूं की फसल से उपज किस्म के चयन, खाद और उर्वरक के उचित प्रयोग और फसल की देखभाल पर निर्भर करती है| लेकिन सामान्यतः उपरोक्त वैज्ञानिक विधि से खेती करने पर 40 से 70 कुन्तल प्रति हैक्टर तक अनाज की उपज प्राप्त की जा सकती है|

गेहूं की खेती से अधिक पैदावार के लिए आवश्यक बिंदु
1. गेहूं की खेती के लिए शुद्ध एवं प्रमाणित बीज की बुआई बीज शोधन के बाद की जाए|
2. प्रजाति का चयन क्षेत्रीय अनुकूलता एवं समय विशेष के अनुसार किया जाए|
3. गेहूं की खेती हेतु दो वर्ष के बाद बीज अवश्य बदल दीजिए|
4. संतुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर सही समय पर उचित विधि से किया जाए|
5. क्रान्तिक अवस्थाओं (ताजमूल अवस्था एवं पुष्पावस्था) पर सिंचाई समय से उचित विधि एवं मात्रा में की जानी चाहिए|
6. गेहूं की खेती में कीड़े एवं बीमारीयों से बचाव हेतु विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए|
7. गेहूं की खेती में कीट और रोगों का प्रकोप होने पर उसका नियंत्रण समय से किया जाना चाहिए|
8. गेहूं की खेती के जीरोटिलेज एवं रेज्ड वेड विधि का प्रयोग किया जाए|
9. गेहूं की खेती हेतु खेत की तैयारी के लिए रोटवेटर हैरो का प्रयोग किया जाना चाहिए|
10. गेहूं की खेती में अधिक से अधिक जीवांश खादों का प्रयोग किया जाना चाहिए|
11. गेहूं की खेती के लिए यथा सम्भव आधी खादों की मात्रा जीवांश खादों से पूरी की जानी चाहिए|
12. किसी भी प्रकार की खाद का अंधाधुंध प्रयोग न करें उनकी संतुलित मात्रा फसल के लिए अच्छी रहती है|
13. गेहूं की खेती हेतु जिंक और गंधक की कमी वाले खेतों में बुवाई से पहले इनकी संतुलित मात्रा अवश्य डालें|

इस तकनीक से सड़ रहे प्याज को मिलेगा सही दाम



इस तकनीक से सड़ रहे प्याज को मिलेगा सही दाम 

लखनऊ। अगर आपकी रसोई और घर में प्याज सड़ रहा है तो आप पंजाब के एक किसान के इजाद किए तरीके को अपना सकते हैं। जब प्याज सस्ता हो और आपके घर में सड़ने लगा हो, उस समय किसानों के सड़ रहे प्याज का सही भाव मिल सकें, राजविंदर सिंह राना ने एक ऐसी ही तकनीक की खोज की है।

राजविंदर पाल सिंह राना पंजाब के लुधियाना जिले से उत्तर दिशा में मदियानी गाँव के रहने वाले हैं। ये गाँव कनेक्शन संवाददाता को फोन पर बताते हैं, “जब बाजार में प्याज का भाव बहुत कम हो और प्याज सड़ रहा हो, उस समय किसान प्याज को सीधे न बेचकर उसको एग ट्रे में उगाकर प्याज बेच सकते हैं। हरे प्याज का भाव 40-60 रुपए प्रति किलो तक मिल जाता है। इससे किसानों को अच्छा फायदा होगा।” राजविंदर एग ट्रे में प्याज उगाना नासा की तकनीक मानते हैं।

 हर कोई अपनी किचन से में हरा प्याज उगा सकता है।
शोध कार्यों में दिलचस्पी रखने वाल राजविंदर ने घर में लगातार सड़ रहे प्याज पर शोध करना शुरू किया। ये बताते हैं, “हमने अपनी किचन में 10 खाली एग ट्रे में सात आठ किलो सड़ रहे प्याज को भरकर रख दिया। सप्ताह में दो बार इसमें पानी का छिड़काव किया, जिससे इसमें हरी पत्ती वाला प्याज निकलना शुरू हो गया। एक किलो प्याज में जितनें गुण पाए जाते हैं उतने ही गुण एक हरे पत्ती वाले प्याज में होते हैं।”

हर कोई एग ट्रे तकनीक का प्रयोग अपने किचन में सड़ रहे प्याज के लिए उपयोग कर सकता है। किसानों का सड़ रहे प्याज को कोई नहीं खरीदेगा लेकिन अगर वो किसान एग ट्रे में हरे प्याज को तैयार करके बेचते हैं तो उन्हें प्याज का भाव अच्छा मिल जाएगा।
एग ट्रे में हरा प्याज उगाना कोई एक दिन का काम नहीं बल्कि ये सालों साल चलने वाली प्रक्रिया है। इस तकनीक का उपयोग रसोई से लेकर बाजार तक किया जा सकता है। खासकर इस तकनीक का फायदा उन लोगों के लिए ज्यादा है जिनके पास मिट्टी का कोई साधन नहीं है।

मशरूम उत्पादन...गांव में खेती, शहर में कमाई


मशरूम उत्पादन...गांव में खेती, शहर में कमाई

लोगों के खाने की थाली में मशरूम ने एक खास जगह बना ली है। छोटे से गांव की रसोई से लेकर फाइव स्टार होटल के मेन्यू तक में मशरूम की पहुंच बन गई है। लेकिन जिस अनुपात में मशरूम की मांग है, उस अनुपात में देश में इसका उत्पादन नहीं हो पा रहा है। ऐसे में मशरूम उत्पादन कर आप अपने स्वरोजगार को बढ़ाने के साथ-साथ बेहतर कमाई भी कर सकते हैं।

🌱क्या है मशरूम
मशरूम में फॉलिक एसिड और खनिज लवण पाए जाते हैं, जो मानव शरीर के ब्लड में अतिआवश्यक रेड सेल्स बनाने का काम करते हैं। आमतौर पर खाने में सब्जी के रूप में इसका इस्तेमाल किया जाता है। पहले सिर्फ चुनिंदा देशों में ही इसका सेवन किया जाता था, लेकिन अब इसकी पहुंच विश्व के अधिकांश भागों के साथ-साथ भारत के ग्रामीण इलाकों तक हो गई है।

जगह और मौसम का खास महत्व
सामान्य तौर पर मशरूम उत्पादन के लिए 20 से 40 डिग्री तापमान होना आवश्यक है। इसके अलावा वातावरण में नमी का होना भी जरूरी है। नमी के बगैर मशरूम का ठीक तरह से विकास नहीं हो पाता।

🌱कैसे करें उत्पादन
आप अपनी सुविधानुसार मशरूम उत्पादन के लिए जगह का चुनाव कर सकते हैं। मशरूम उत्पादन के लिए बेहतर तरीका है कि किसी नमी वाले भाग में इसका उत्पादन किया जाए या फिर अपने जमीन के कुछ भाग पर मशरूम उत्पादन के अनुकूल मशरूम घर तैयार कर वहां पर खेती करें। मशरूम उत्पादन के लिए घर में गेहूं की भूसी या धान की पुआल का ढेर लगा कर उसमें पानी डाल नमी पैदा कर, उसमें कम्पोस्ट और मशरूम का बीज डाल कर आप मशरूम का उत्पादन कर सकते हैं। ऑयस्टर मशरूम के उत्पादन के लिए 80 फीसदी नमी और तापमान 20 से 30 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए। इसके उत्पादन के लिए सितम्बर-अक्तूबर का महीना बेहतर माना जाता है। टेम्परेंट मशरूम के लिए 70 से 90 फीसदी नमी और 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान का होना जरूरी है। इसके उत्पादन के लिए अक्तूबर से फरवरी का समय अनुकूल होता है। वॉल वैरियल्ला मशरूम का उत्पादन अप्रैल से अक्तूबर माह में किया जा सकता है। वॉल वैरियल्ला के उत्पादन के लिए तापमान 30 से 40 डिग्री सेल्सियस व नमी 80 से ज्यादा होनी चाहिए।

🌱जरूरी सामान
मशरूम उत्पादन के लिए मशरूम घर, पॉलीथिन के थैले, कम्पोस्ट बनाने के लिए जरूरी सामग्री, मशरूम स्पान तथा केसिंग मिट्टी प्रमुख हैं। दो-तीन महीने में फसल तैयार मशरूम का सफल उत्पादन दो से तीन महीने में आसानी से हो जाता है। मशरूम की बुआई से लेकर कटाई तक में लगभग दो-तीन महीने का समय लग जाता है।

🌱कैसे करें व्यापार
मशरूम उत्पादन करने के बाद उसे सही मार्केट तक पहुंचाने पर ही आपको सही मायनों में मुनाफा मिल सकता है। वैसे तो मशरूम की काफी मांग है, लेकिन इसके लिए मंडी में आपको एक बार पहचान तो बनानी ही पड़ेगी, ताकि भविष्य में आपका मशरूम आसानी से बाजार तक पहुंच जाए।

🌱संभावना
देश में आम लोगों तक पहुंच बढ़ाने से मशरूम की डिमांड काफी बढ़ गई है। इसे देखते हुए मशरूम के
काफी अधिक उत्पादन की जरूरत है। हालांकि मशरूम का उत्पादन काफी तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन अभी भी जरूरत के मुकाबले इसका उत्पादन काफी कम हो रहा है। ऐसे में अगर इसका उत्पादन शुरू करते हैं तो यह निश्चित रूप से फायदे का सौदा साबित होगा।

🌱प्रशिक्षण
कृषि विश्वविद्यालय और राज्य सरकार के बागवानी विभाग समय-समय पर कुछ सप्ताह का प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाते रहते हैं, जिसमें शामिल होकर आप आसानी से मशरूम उत्पादन की बारीकियों को सीख सकते हैं। यह प्रशिक्षण सरकारी संस्थानों में मुफ्त दिया जाता है। प्रशिक्षण के लिए आप नजदीकी कृषि महाविद्यालय में पता कर सकते हैं।

🌱पूंजी
मशरूम की खेती को छोटी जगह और कम लागत में आसानी से शुरू किया जा सकता है और कम लागत में ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है। तीन-चार कमरों के मशरूम घर में मशरूम की खेती करने के लिए मशरूम बीज, कम्पोस्ट व अन्य जरूरी सामान के लिए कम से कम 15 से 20 हजार रुपए की जरूरत होगी।

🌱प्रशिक्षण देने वाले संस्थान
पादप रोग संभाग, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, पूसा (समस्तीपुर), बिहार इलाहाबाद एग्रीकल्चर इंस्टीटय़ूट, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय खुम्ब अनुसंधान केन्द्र, सोलन, हिमाचल प्रदेश जीबी पंत यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी, पंत नगर, उत्तराखंड
आणंद एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, आणंद, गुजरात
सबौर कृषि विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार

गेहूँ की नवीन उन्नत किस्म और उसकी विशेषताएं


 

1. जे.डब्लू.-1106: यह मध्यम अवधि (115 दिन) वाली किस्म है जिसके पौधे सीधे मध्यम ऊँचाई के होते है। बीज का आकार सिंचित अवस्था में बड़ा व आकर्षक होता है। सरबती तथा अधिक प्रोटीन युक्त किस्म है जिसकी आसत उपज 40 - 50 क्विंटल  प्रति हेक्टेयर है।

2. अमृता (एच.आई. 1500): यह सरबती श्रेणी की नवीनतम सूखा निरोधक किस्म है। इसका पौधा अर्द्ध सीधा तथा ऊँचाई 120 -135 से. मी. होती है। दाने मध्यम गोल, सुनहरा (अम्बर) रंग एवं चमकदार होते है। इसके 1000 दानों का वजन 45 - 48 ग्राम और बाल आने का समय 85 दिन है। फसल पकने की अवधि 125 - 130 दिन तथा आदर्श परिस्थितियों में 30 - 35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है।

3. स्वर्णा (एच.आई.-1479): समय से बोने हेतु मध्य प्रदेश की उर्वरा भूमियो के लिए शीघ्र पकने वाली गेरूआ निरोधक किस्म है। गेहू का दाना लम्बा, बोल्ड, आकर्षक, सरबती जैसा चमकदार व स्वादिष्ट होता है। इसके 1000 दानो का वजन 45 - 48 ग्राम होता है। फसल अवधि 110 दिन हे। इस किस्म से 2 - 3 सिंचाइयों से अच्छी उपज ली जा सकती है। गेहूँ की लोक-1 किस्म के विकल्प के रूप में इसकी खेती की जा सकती है।

4. हर्षित (एचआई-1531): यह सूखा पाला अवरोधी मध्यम बोनी (75 - 90 से. मी. ऊँचाई) सरबती किस्म है। इसके दाने सुडौल, चमकदार, सरबती एवं रोटी के लिए उत्तम है जिसे सुजाता किस्म के विकल्प के रूप में उगाया जा सकता है। फसल अवधि 115 दिन है तथा 1 - 2 सिंचाई में 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर से अधिक उपज देती है।

5. मालव शक्ति (एचआई - 8498): यह कम ऊँचाई वाली (85 से.मी) बोनी कठिया (ड्यूरम) किस्म है। यह नम्बर - दिसम्बर तक बोने हेतु उपयुक्त किस्म है। इसका दाना अत्यन्त आकर्षक, बड़ा, चमकदार, प्रोटीन व विटामिन ए की मात्रा अधिक, अत्यन्त स्वादिष्ट होता है। बेकरी पदार्थ, नूडल्स, सिवैया, रवा आदि बनाने के लिए उपयुक्त है। बाजार भाव अधिक मिलता है तथा गेहूँ निर्यात के लिए उत्तम किस्म है। इसकी बोनी नवम्बर से लेकर दिसम्बर के द्वितीय सप्ताह तक की जा सकती है। इसकी फसल लोक-1 से पहले तैयार हो जाती है। इससे अच्छी उपज लेने के लिए 4 - 5 पानी आवश्यक है।

6. मालवश्री (एचआई - 8381): यह कठिया गेहूँ की श्रेणी में श्रेष्ठ किस्म है। इसके पौधे बौने (85 - 90 से.मी. ऊँचाई), बालियों के बालों का रंग काला होता है। यह किस्म 4 - 5 सिंचाई मे बेहतर उत्पादन देती है। इसके 1000 दानों का वजन 50 - 55 ग्राम एवं उपज क्षमता 50 - 60 क्विंटल प्रति हेक्टर है। राज-3077 गेहूँ की ऐसी नयी किस्म है, जिसमें अन्य प्रजातियों क अपेक्षा 12 प्रतिशत अधिक प्रोटीन पाया जाता है। इसे अम्लीय एवं क्षारीय दोनों प्रकार की मिट्टियों में बोया जा सकता है।