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Friday, April 17, 2020

सरसी (पूर्णिया): सफलता की कहानी।


सरसी गांव एक छोटे से किसान 72 वर्षीय सदानंद सिंह ने मक्के की खेती में नई तकनीक का प्रयोग कर देश भर के
किसानों के लिए इंटर क्रॉपिंग की दिशा में नई दिशा दिखाई है. किसान सदानंद सिंह ने मक्का की खेती के बीच बंधगोभी की
उम्दा पैदावार कर कृषि विशेषज्ञों एवं क्षेत्र के सैकड़ों किसानों को अचंभित कर दिया है. यह जानकारी फैलते ही विभिन्न जिलों से बड़े- बड़े किसान एवं कृषि विश्वविद्यालय के छात्र एवं विशेषज्ञ सदानंद सिंह के प्रयोग एवं कृषि पद्धति को देखने पहुंच रहे हैं. और तकनीक की जानकारी जुटाने में लगे हुए हैं. सदानंद सिंह की खेत को देखने कृषि
कॉलेज के छात्र-छात्राएं एवं किसानों का सिलसिला जारी है. कैसे की गयी है खेती
किसान सदानंद सिंह ने बताया कि पहली बार पांच कट्ठा खेत में प्रायोगिक तौर पर मक्के के साथ बंध गोभी की खेती की. उन्होंने बताया कि मक्का बोआई से पूर्व खेत में फर्टिलाइजर आदि डाल कर मक्का का बीज बोया गया. पौधा निकलने के तुरंत बाद बंधगोभी भी बोया. उन्होंने बताया कि बंध गोभी की खेती के लिए अलग से पटवन एवं फर्टिलाइजर की आवश्यकता नहीं है. बंध गोभी के पत्ते की प्राकृतिक बनावट के कारण कभी अलग से पटवन की आवश्यकता नहीं है. स्वत: ओस या कुहासे से पत्ताें जमा पानी बंध गोभी की जड़ों में चला जाता है. जिससे पर्याप्त पानी पौधे को
मिल जाता है. उन्होंने बताया कि बंध गोभी के साथ मक्का की खेती में न तो मक्का को कोई नुकसान है और न ही बंध गोभी को.
उन्होंने बताया कि प्रति एकड़ के हिसाब से 16 हजार पौधा बंध गोभी का आता है जिसमें अनुमानित खर्च 10722 रुपये आता है. मक्के के फसल के बीच बंध गोभी की खेती कर किसान प्रति एकड़ लगभग 80000 (अस्सी हजार) तक अतिरिक्त मुनाफा कमा सकते हैं. इससे मक्का की खेती में लगाया गया लागत फसल करने से पूर्व ऊपर हो सकता है. छोड़ दी थी पोस्टमास्टर की नौकरी : 72 वर्षीय किसान सदानंद सिंह ने बताया कि 75 के दशक में वे पोस्टमास्टर की नौकरी छोड़ कृषि के क्षेत्र में अपना कैरियर बनाने में जुट गये. उन्होंने बताया कि वे लगातार मक्का, गेहूं, धान, पटसन एवं गन्ना की खेती करते आ रहे हैं. वर्ष 2011 में मक्का की खेती को देखने अमेरिका से कृषि वैज्ञानिक पहुंचे थे. इससे पूर्व बनमनखी चीनी मील की तरफ से गन्ना की बेहतर पैदावार के लिए भी पुरस्कृत किये जा चुके हैं. उन्होंने बताया कि कृषि के ही
बदौलत अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिला पाया उनका एक पुत्र सेंट्रल स्कूल में शिक्षक तथा दूसरे पुत्र पशु चिकित्सक है तथा सबसे छोटा पुत्र फौज में कार्यरत है. इसके बावजूद किसान सदानंद सिंह का हौसला खेती के प्रति कम नहीं हुआ है. वे आज भी बेहतर से बेहतर कृषि करने की दिशा में पूरी गंभीरता से प्रयास कर रहे हैं. कृषि की तकनीक समझने आये किसानों ने की तारीफ
मक्का के साथ बंध गोभी की खेती की तकनीक जानने बनमनखी से पहुंचे किसान अजय सिंह, कटिहार से पहुंचे राजू चौधरी, मधेपुरा से पहुंचे डब्लू यादव, बिहारीगंज से पहुंचे जवाहर मंडल, भागलपुर से पहुंचे किसान डा हलधर, विकास मंडल, भूपेंद्र मंडल, रामदेव यादव आदि समेत विभिन्न
जिला से पहुंचे किसानों ने उनके द्वारा अपनाये गये तकनीक की जम कर तारीफ की. किसानों ने बताया कि वे इस प्रकार की तकनीक का प्रयोग अपने-अपने खेतों में भी करेंगे. सफल होने पर बड़े पैमाने पर वे इस
तरह की खेती करेंगे. बाहर से पहुंचे तमाम किसान उनकी खेती देख अचंभित थे.
सरकारी स्तर से नहीं मिल रहा लाभ : किसान सदानंद सिंह का कहना है कि कृषि के लिए उन्हें सरकारी स्तर से कोई लाभ नहीं
मिलता है. यहां तक की समय-समय पर उन्हें खाद एवं बीजों के लिए यत्र- तत्र भटकना पड़ता है. उनका कहना है कि वे बार-बार फसलों को बेच कर ही अगली खेती करते हैं. उनका कहना है कि कृषि संबंधी योजनाएं तथा उनका लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पा रहा है जिसके कारण
क्षेत्र के किसान धन के अभाव में कृषि से अभिमुख हो रहे हैं.

Sunday, September 9, 2018

जयपुर शिवानी माहेश्वरी



कोई कार्य क्षेत्र ऐसा नहीं जहाँ सफलता की गुंजाईश ना हो बस आवश्यकता होती है तो लगन मेहनत और ख़ुद पर विश्वास की। हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है लेकिन बदलते आधुनिक परिवेश ने खेती और किसान दोनों की परिभाषा बदल दी है। हमारी आज की कहानी भी आधुनिक भारत की ऐसी दो बेटियों की है जो धरती पुत्री अर्थात किसान बनकर खेती को एक व्यवसाय के रूप में विकसित कर रही हैं।

जयपुर की शिवानी माहेश्वरी और दिल्ली की वामिका बेहती ने अच्छी ख़ासी नौकरी छोड़ कर हरियाणा में फूलों की खेती का व्यवसाय करने की तरफ रुख़ किया। और आज एक सफल किसान के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं।
आपको बता दें कि भारत की फ्लोरिकल्चर इंडस्ट्री की सालाना कुल ग्रोथ 30 फीसदी की रफ्तार से भी तेज हो रही है।वहीं इंडस्ट्री बॉडी एसोचैम की मानें तो आने वाले 2015 तक इस इंडस्ट्री का मार्केट कैप 10,000 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगी। ऐसे स्थिति में इस क्षेत्र में कारोबार की बड़ी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में हरियाणा में वामिका और शिवानी की पहल ने किसानों की मदद की है साथ ही उन्हें उन्नत खेती की तकनीकों और व्यावसायिक खेती से अवगत कराया है ।
जयपुर की रहने वाली 23 साल की शिवानी एमबीए ग्रैजुएट हैं तो दिल्ली की 25 साल की वामिका चार्ट्रड अकाउंटेंट हैं।
साल 2015 में शिवानी को फूलों का व्यवसाय करने का ख्याल उस समय आया जब उन्हें रोहतक-दिल्ली जानेे के दौरान एक बार पॉलीहाउस फार्मिंग नेट देखने का अवसर प्राप्त हुआ। शिवानी वहाँ की कुछ तस्वीरें कैमरे में क़ैद कर लाई और फूलों के व्यवसाय के बारे में इंटरनेट पर रिसर्च करना शुरू किया। उसी समय उनकी मुलाकात वामिका से हुई और फिर दोनों ने मिलकर इस पर काम शुरू किया।
हरियाणा खास तौर पर अपने क्षेत्र के किसानों और उनकी खेती के लिये मशहूर है इसलिए दोनों के लिये व्यवसाय से जुड़ी सारी चीजें खुद-ब-खुद बेहतर होने लगी। वामिका की बहादुरगढ़ में एक फैक्ट्री और झझर जिले के तंडाहेरी गांव में खाली जमीन भी थी जिस पर दोनों ने मिलकर यूनिस्टार एग्रो नाम की एक फार्म शुरू कर दी जहाँ लिलियम, गेरबेरा, गुलाब, रजनीगंधा और ग्लेडियोलस की खेती की जाने लगी।
दोनों ने मिलकर अपने फूलों के व्यवसाय में अपनी पढ़ाई का भी पूरा प्रयोग करना शुरू किया जिसका फायदा इन्हें अपने व्यवसाय में मिल रहा है। साथ में ही वामिका को उनके बिजनेसमैन पति की उपयोगी सलाह भी मिलती है।
इन दोनों के उद्यम यूनिस्टार एग्रो को अब हरियाणा सरकार भी सहायता प्रदान कर रही है क्योंकि वामिका और शिवानी की पढ़ाई और तकनीकी जानकारी की वजह से ऑर्गेनिक खेती करने के लिये कई किसानों को सहायता मिल रही हैं।
आज उनका फूलों का व्यवसाय खूब फल-फूल रहा है। उनकी मेहनत और किसानों के फायदों को देखते हुए सरकार ने उन्हें पुरस्कार सब्सिडी और इनसेनटिव भी देना शुरू कर दिया। वामिका और शिवानी अब अपने व्यवसाय को और आगे बढ़ाना चाहती हैं और देश में ही नहीं बल्कि मौका मिला तो विदेशों तक अपने कारोबार को फैलाना चाहती हैं। साथ ही किसानों का आर्थिक स्तर भी सुधारना उनका लक्ष्य हैं।
वाक़ई यदि देश की युवा पीढ़ी इस तरह अपने ज्ञान का उपयोग करेगी तो वो दिन दूर नहीं जब भारत फिर से सोने की चिड़िया कहलाने लगेगा।