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Monday, April 20, 2020

करेला की खेती


परिचय
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सब्जी फसलों में बेल वाली सब्जियों का सबसे बड़ा परिवार है। बेल वाली सब्जियों में करेले का महत्वपूर्ण स्थान है। करेला केवल सब्जी मात्र के लिए नहीं बल्कि आजकल इसका औषधियों में भी काफी प्रयोग है। इसलिए इसका संकर बीज उत्पादन करना और भी लाभदायक हो गया है मध्यम एवं बड़े वर्ग के किसान खासकर युवा एवं महिला किसान सब्जियों का बीज उत्पादन/संकर बीज उत्पादन एक व्यवसाय के रूप में अपनाकर उद्यमी बन सकते हैं और कृषि आय में वृद्वि कर सकते है जिससे संकर बीजों की स्थानीय उपल्बधित्ता में सुधार, कम मूल्य पर किसानों को संकर बीजों की उपलब्धि है सकती है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने सब्जियों की अनेक उन्नत एवं संकर प्रजातियां का विमोचन एवं उनके बीज उत्पादन प्रौद्योगिकी का विकास किया है।

संकर किस्मः-
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भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा करेले की दो संकर प्रजातियां
विकसित हुई हैं, पूसा संकर-1 तथा पूसा संकर-2

संकर किस्म पूसा संकर -
इसके पौधे लम्बे, गांठों के बीच की औसत दूरी 10.5 सेमी. पत्तियां मध्यम अण्डाकार, गहरे कटावयुक्त मुलायम हरे रंग की होती है। फूल एकलिंगी पत्तियों के कक्ष में अकेले-अकेले होते हैं। नर फूल के डंठल लम्बे-पतले तथा मादा फूल की डंठल छोटे व मोटे होते हैं। इस किस्म के फले गहरे हरे रंग व आकर्षक तथा धारियां लगातार होती है। फलों की लम्बाई मध्यम तथा फलों का औसत भार 115 ग्राम होता है।

नर जनक :- बेल छोटी, झाडीदार, गांठों के बीच की दूरी औसतन 9.5 सेमी. पत्तियां मध्यम अंडाकार गहरे कटावयुक्त मुलायम गहरे हरे रंग की होती है। फूल एकलिंगी पत्तियों के कक्ष में अकेले-अकेले होते हैं। नर फूल के डंठल लम्बे-पतले जबकि मादा फूल की डंठल मोटे व छोटे होते हैं। इस किस्म के फल अच्छे हरे व आकर्षक तथा धारियां मुलायम बीच-बीच में कटी होती है। फल की सतह उभरी होती है। फल मध्यम लम्बाई वाले तथा फलों का औसत भार 115 ग्राम
है।

संकर बीज उत्पादन
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जलवायुः - करेला में बीज उत्पादन गर्मी एवं वर्षा दोनों मौसम में किया जा सकता है।
फसल में जमाव के लिए 22-25 डिग्री सेल्सियस और अच्छी पैदावार, पुष्पन एवं फल के लिए 25-30 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त है। संकर बीज उत्पादन हेतु गर्मी का मौसम अधिक उपयुक्त है।

खेत का चुनावः -
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संकर बीज उत्पादन करने के लिए खेत उपजाऊ तथा मिट्टी बलुई दोमट या
दोमट होनी चाहिए। खेत सममतल तथा जल निकास की व्यवस्था के साथ-साथ सिंचाई जल की समुचित व्यवस्था होना आवश्यक है।

खेत की तैयारीः -
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खेत की जुताई कर के उसे सममतल कर लेना चाहिए। बीज की बुवाई के लिए आवश्यकतानुसार दूरी पर नालियां बना लें खेत में जल निकास का अच्छा प्रबंध होना अति आवश्यक है।

खाद एवं उर्वरकः -
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25 से 30 टन सड़ी हुई गोबर की या कम्पोस्ट खाद खेत में बुवाई से 25-30 दिन पहले तथा बुवाई से पूर्व नालियों में 50 किग्रा. डी.ए.पी., 50 किग्रा. म्यूरेट आॅफ
पोटाश प्रति हैक्टेयर के हिसाब से जमीन में मिलाए। बाकी नत्रजन 30 किग्रा. यूरिया
बुवाई के 20-25 दिन बाद व इतनी ही मात्रा 50-55 दिन बाद पुष्पन व फलन की अवस्था में डाले।

बीज स्रेातः -
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संकर बीज उत्पादन के लिए पैतृक जनकों का बीज संबंधित कृषि अनुसंधान संस्थान या कृषि विश्वविद्यालय से प्राप्त कर सकते हैं।

पृथक्करण दूरीः -
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संकर बीज फसल का खेत अन्य करेले की किस्मों के खेत या जंगली करेले के खेत या पौधों से न्यूनतम 1000 मीटर दूरी पर होनी चाहिए। अगर नर व मादा जनकों की बुवाई अलग-अलग खण्डों में की हैं तो नर व मादा खण्डों के बीच की न्यूनतम दूरी 5 मीटर
आवश्यक है। खेत में 1/5 भाग में नर पैतृक तथा 4/5 भाग में मादा पैतृक की बुवाई अलग-अलग खण्डों में करना उचित माना गया है।

बीज दर एवं उपचारः-
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बीज की मात्रा पैतृक जनकों की बुवाई के अनुपात पर निर्भर करती है। मादा पैतृक की 1.75 किग्रा. तथा नर पैतृक की 0.5 किग्रा. मात्रा प्रति एकड़ पर्याप्त रहती है। बुवाई से पूर्व बीजों (नर व मादा) को बाविस्टीन (2 ग्राम प्रति किग्रा.) के घोल में 18 से 24 घंटे के लिए भिगोए ।

बुवाई का समयः -
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15 फरवरी से 30 फरवरी (ग्रीष्म ऋतु) तथा 15 जुलाई से 30 जुलाई (वर्षा ऋतु)

बुवाई की विधि एवं दिशाः -
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बुवाई 2 प्रकार से की जाती है।
(1) सीधे बीज द्वारा
(2) पौध रोपण द्वारा

करेला बीज उत्पदन के क्षेत्रों में बुवाई सीधे बीजों द्वारा की जाती है। परन्तु उत्तर भारत
में सीधी बुवाई मार्च के पहले पखवाड़े में ही संभव है। लेकिन तब बुवाई करने से संकर बीज की मात्रा कम प्राप्त होती है। अतः ग्रीष्म ऋतु में पौधों को पाॅलीथीन या पौध ट्रे में संरक्षित आकृतियों में उगाकर फरवरी के प्रथम सप्ताह में रोपाई करे। संकर बीज उत्पादन के लिए बुवाई/रोपाई क्यारियों की नालियों में करनी चाहिए। पौधे से पौधे की दूरी 100 मी. और क्यारियों की चैड़ाई 1 मीटर होनी चाहिए। बेलों को सहारा देने के लिए जंग अवरोधी तार या रस्सियों का उपयोग करना चाहिए। बुवाई के एक महीने बाद बेलों को तारों या रस्सियों से बांस पर बांधकर सहारा देकर चढ़ाना चाहिए। इससे पौधों की कीट तथा बीमारियों से बचाव होता है और संकर फल भी अच्छे से विकसित हो पाते हैं।

सिंचाई तथा कृषक क्रियाएंः
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सिंचाई खुले खेत में आवष्यकतानुसार दी जा सकती है यद्यपि ड्रिप सिंचाई का प्रयोग अधिक प्रभावी है, तथा यह अनावष्यक पानी का संरक्षण करता है। सिंचाई 15-20 दिन के अंतराल में दे अन्यथा फल एवं बीज की उपज पर प्रतिकूल असर पड़ता है। खरपतवारों की रोकथाम के लिए 3-4 बार निराई पर्याप्त रहती है। पुष्पण आरम्भ होने पर खेत में नत्रजन उर्वरक मिलाकर पौधों पर मिट्टी चढ़ानी चाहिए।

फसल सुरक्षाः -
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चूर्णित आसिता (पाउडरी मिल्ड्यू) तथा मृदुल आसिता (डाउनी मिल्ड्यू) के लिए क्रमशः बेविस्टीन 2.0 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर तथा डायथेन एम-45 या रीडोमिल (2.0 ग्राम प्रति लीटर) पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। वायरस की बीमारियों के लिए कोन्फीडोर (2.5-3.8 मिली./लीटर) पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

संकर बीज उत्पादन विधिः -
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करेला उभयलिंगी पौधा होने के कारण इसमें संकर बीज उत्पादन हाथ द्वारा परागण करना प्रचलित है। इस विधि में मादा पैतृक पौधों में से नर फूलों को प्रतिदिन खिलने से पहले तोड़ दिया जाता है तथा मादा फूलों को खिलने से एक दिन पूर्व सायं के समय बटर पेपर बैग (7.5 से 12 सेमी.) में बंद कर देते हैं। हवा के आदान प्रदान हेतु लिफाफे में 5-6 छिद्र अवश्य करने चाहिए। नर पैतृक पौधों में नर फूलों को भी नर्मी ना सोखने वाली रूई से अच्छी प्रकार ढ़क देते हैं । अगले दिन नर खण्डों से नर फूलों को तोड़कर इकट्ठा कर लें तथा मादा पैतृक में मादा फूलों का लिफाफा हटाकर हाथ द्वारा परागकोष को रगड़कर या परागकणों को एकत्र करके ब्रश द्वारा परागण करें । परागण के तुरन्त बाद बटर पेपर बैग से मादा फूल को दोबारा ढक दें । मादा फूलों से बटर पेपर बैग 8-10 दिन बाद हटाये तथा एक पौधे पर इस प्रकार 10-12 फल तैयार करें अधिक संख्या में फल बनने से फल पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते।

अवांछनीय पौधों का निकालना तथा निरीक्षण अवस्थाः -
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संकर बीज उत्पादन के खेत का चार अवस्था में निरीक्षण करना चाहिए। पुष्पन से पूर्व जिसमें मादा उवं नर पैतृकों की बढ़वार, पत्ते की आकृति, रंग एवं शीर्ष भागों पर रोये के आधार पर पौधों को निकालना चाहिए।
पुष्पीय लक्षणों एवं फलों के आधार पर अवांछनीय पौधों की पहचान कर निकालना
चाहिए। फलों की तुड़ाई एवं पकने पर फल के विकास, रंग, आकार एवं पौधों में रोग आदि की स्थिती को ध्यान में रखते हुए अवांछनीय पौधों एवं फलों को हटा देना चाहिए।

फलों का पकना, तुड़ाई एवं बीज निकालनाः
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परागण के 28-30 दिन बाद फल पकने लगते हैं । पकने पर फल चमकीले नारंगी रंग के हो जाते हैं। फलों की तुड़ाई तभी करें जब पूरा फल नारंगी रंग को हो जाये। कम पके फल में बीज अल्प विकसित रहते हैं। अधिक पकने पर फल फट जाते हैं तथा बीज का नुकसान होता है। पके फलो को दो भागों में फाडकर हाथ द्वारा बीजों को निकालकर रेते या साफ मिट्टी से मसलकर बीजों की चिपचिपी झिल्ली को हटा देना चाहिए। बीजों को साफ बहते हुए पानी से धुलाई करके तेज धूप में सुखाना चाहिए।

बीज उपज एवं 1000 बीजों का भारः -
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प्रति पौध 12-14 फल मिलते है जिनमें से 15-25 बीज प्रति फल मिल जाते है। दिल्ली परिस्थितियों में 150-200 किग्रा. बीज प्रति एकड़ उपज होती है।

Friday, April 17, 2020

सूरजमुखी की वैज्ञानिक खेती




परिचय
सूरजमुखी एक तिलहनी फसल है , इसकी खेती भारत में प्रमुखता से की जाती है | इसकी खेती वर्ष में तीन बार की जा सकती है परन्तु उत्तर भारत में इसकी खेती सर्दी के मौसम में की जाता है | खरीफ मौसम की सूरजमुखी में कीट का प्रकोप ज्यादा होता है तथा फूल भी छोटा लगता है | जायद फसल के रूप में इसकी खेती सबसे उपयुक्त है तथा उत्पादन भी ज्यादा होता है | किसान समाधान इसकी जानकारी किसानों को  विस्तार से लेकर आया है |

भूमि की तैयारी
फसल किसी भी प्रकार की भूमि में खेती की जा सकती है | इसकी खेती उस भूमि में भी किया जा सकता है जिस भूमि में धान की खेती नहीं किया जा सकता है | उतार – चढ़ाव वाली, कम जल धारण क्षमता वाली उथल  वाली आदि कमजोर किस्म में  फसलें अधिकतर उगाई जा रही है | हल्की भूमि में जिसमें पानी का निकास अच्छा हो इनकी खेती के लिए उपयुक्त होती है |बहुत अच्छी जल निकासी होने पर लघु धन्य फसलें प्राय: सभी प्रकार की भूमि में उगाई जा सकती है | भूमि की तैयारी के लिए गर्मी की जुताई करें एवं वर्षा होने पर पुनः खेत की जुताई करें या बखर चलायें जिसमें मिट्टी अच्छी तरह से भुरभुरी हो जायें |

उन्नत किस्में 

मार्डन :- इस प्रजाति की उत्पादन क्षमता 6 से 8 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है | इसकी उपज समय अवधि 80 से 90 दिन है | इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 90 से 100 सेमी. तक होती है | इस प्रजाति की खेती बहुफसलीय क्षेत्र के लिए उपयुक्त है| इस प्रजाति में तेल की मात्र 38 से 40 प्रतिशत होती है |

#बी.एस.एच. – 1 :- इस प्रजाति की उत्पादन 10 से 15 किवंटल प्रति हैक्टेयर है तथा इसकी उत्पादन समय 90 से 95 दिन है | इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 100 से 150 सेमी. तक होती है | इस प्रजाति में तेल की मात्र 41 प्रतिशत होती है |

#एम.एस.एच. :- इस प्रजाति की उत्पादन 15 से 18 किवंटल प्रति हैक्टेयर  है  तथा इसकी उत्पादन समय 90 से 95 दिन है | इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 170 से 200  सेमी. तक होती है | इस प्रजाति में तेल की मात्र 42 से 44 प्रतिशत होती है |

#सूर्या :– इस प्रजाति की उत्पादन 8 से 10 किवंटल प्रति हैक्टेयर है तथा इसकी उत्पादन समय 90 से 100 दिन है | इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 130 से 135 सेमी. तक होती है | इसप्रजाति की की खेती पिछेती बुवाई के लिए उपयुक्त है |  इस प्रजाति में तेल की मात्र38 से 40  प्रतिशत होती है |

#ई.सी. 68415 :- इस प्रजाति की उत्पादन 8 से 10 किवंटल प्रति हैक्टेयर है तथा इसकी उत्पादन समय 110 से 115 दिन है | इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 180 से 200  सेमी. तक होती है | इसप्रजाति की की खेती पिछेती बुवाई के लिए उपयुक्त है |  इस प्रजाति में तेल की मात्र38 से 40  प्रतिशत होती है |

#बीज की बुवाई कब और कैसे करें ?

सिंचित क्षत्रों में खरीफ फसल की कटाई के बाद अक्तूबर से मध्य नवम्बर के बीच करना चाहिए | अक्टूबर माह में की गई बुवाई से अंकुरण अच्छा रहता है | इसके अलावा असिंचित क्षेत्रों में (वर्षा निर्भरता खेती) में सूरजमुखी की बोनी वर्ष समाप्त होते ही सितम्बर माह के मध्य सप्ताह से आखरी सप्ताह तक कर देना चाहिए | ग्रीष्म फसल की बोनी का समय जनवरी माह के तीसरे सप्ताह से फरवरी माह के अन्त तक उपयुक्त होता है | इसी समय के बीच में बोनी करना चाहिए | बुवाई के समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए की वर्ष प्रारम्भ होने से पहले कटाई होकर गहाई किया जा सके |

#बीज की मात्रा

उन्नत किस्मों के बीज की मात्रा – 10 किलोग्राम / हेक्टयर संकर किस्मों के बीज की मात्रा – 6 से 7 किलोग्राम / हैक्टेयर होना चाहिए |

#बुवाई कैसे करें

पिछेती खरीफ एवं जायद की फसल के लिए कतार से कतार की देरी 45 सेमी एवं रबी फसल के लिए 60 सेमी होनी चाहिए | पौधे से पौधे की दुरी 25 से 30 सेमी रखना चाहिए |

#बीजोपचार :-

लाभ :- बीजों की अंकुरण क्षमता बढ़ जाती है एवं फंफूंदनाशक बीमारियों से सुरक्षा होती है |

#फंफूंदनाशक दवा का नाम एवं मात्रा :-

बीज जनित रोगों की रोकथाम के लिए 2 ग्राम थायरम एवं 1 ग्राम कार्बनडाजिम 50 के मिश्रण को प्रति किलो ग्राम बीज की दर से अथवा 3 ग्राम थायरम / किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए | डाउन मिल्ड्यू बीमारी के नियंत्रण के लिए रेडोमिल 6 ग्राम / किलोग्राम बीज की दर से बीज उपचारित करें |

दवा उपयोग करने का तरीका :- बीजों को पहले चिपचिपे पदार्थ से भिगोकर दावा मिला दें फिर छाया में सखाएं और 2 घंटे बाद बोनी करें |

#पोषक तत्व प्रबंधन 

#जैव उर्वरक का उपयोग :-
जैव उर्वरक के उपयोग से लाभ –  पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराने का कार्य करते हैं | जैव उर्वरकों के नाम एवं अनुशंसित मात्रा – एजोटोबेक्टर जैव उर्वरक का एक पैकेट एक हैक्टेयर बीज के उपचार हेतु प्रयोग करें | पी.एस.बी. जैव उर्वरक के 15 पैकेट को 50 किलोग्राम गोबर या क्म्पोष्ट खाद में मिलाकर दें |

#जैव उर्वरकों के उपयोग की विधि :-
जैव उर्वरकों के नाम एवं अनुशंसित मात्रा के अनुसार आखिरी बखरनी के समय प्रति हैक्टेयर खेत में डालें | इस समय खेत में नमी होना चाहिए |

#पोषक तत्व प्रबंधन :-

क्म्पोष्ट की मात्रा एवं उपयोग :- सूर्यमुखी के अच्छे उत्पादन के लिए क्म्पोष्ट खाद 5 से 10 टन / हैक्टेयर की दर से बोनी के पूर्व खेत में डालें |

मिट्टी परीक्षण के लाभ :-

पोषक तत्वों का पूर्वानुमान कर संतुलित खाद डी जा सकती है | संतुलित उर्वरकों की मात्रा देने का समय एवं तारीख – बोनी के समय 30 – 40 किलोग्राम नत्रजन, 60 किलोग्राम स्फुर एवं 30 किलोग्राम पोटाश की मात्रा प्रति हैक्टेयर खेत में डालें | खड़ी फसलों में नत्रजन की 20 – 30 किलोग्राम / हैक्टेयर मात्रा बोनी के लगभग एक माह बाद प्रथम सिंचाई के बाद पौधे के कतारों के बाजू में दें |

#खरपतवार नियंत्रण 

#रासायनिक तरीके से निंदाई करें :-
खरपतवार की निदाई दो तरह से कर सकते हैं पहला यह होगा की खरपतवार को फसल बुवाई से पहले ही नष्ट कर दें | यह ज्यादा अच्छा रहता है दूसरा यह है की बुवाई के बाद पौधा बड़ा हो जाता है तो खरपतवार की निदाई करना जरिरी रहता है \

#बुवाई से पूर्व खरपतवार का निदाई :-
एलाक्लोर दावा की 1.5 किलोग्राम हैक्टेयर की दर से बुवाई के बाद पर अंकुरण से पूर्व प्रयोग कर खरपतवार को नष्ट कर सकते हैं | एलाक्लोर दावा की 1.5 किलोग्राम मात्रा को 700 से 800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें |

खड़ी फसल में :-

कड़ी फसल में खरपतवार की निदाई के लिए मुख्यत: दो दावा का उपयोग कर सकते हैं | इसके लिए क्यूजैलोफाप की 50 ग्राम को 750 से 800 लीटर प्रति हैक्टेयर की दर से उस समय उपयोग करें जब खरपतवार 2 से 3 पत्ती का हो जाए | तथा एमेजामेथाबेन्ज की 75 से 100 ग्राम मात्रा को 750 से 800 ली पानी में घोल बनाकर स्प्रे करें | इसका प्रयोग 4 से 8 पत्ती का होजाने पर इस दावा का स्प्रे करें |

#रोग और उनका उपचार 

फसल में कई तरह का रोग लगता है | कुछ रोग जलवायु परिवर्तन से होता है तो कुछ रोग फसल के अनुसार होता है | इन सभी को नियंत्रित करना जरुरी रहता है | जिससे उत्पादन पर किसी भी तरह का प्रभाव नहीं पड सके | इसलिए सभी रोगों की सारी जानकारी लेकर आया है |

#काले धब्बे का रोग
(अल्टनेकरया ब्लाईट) :-
यह रोग 15 से 20 प्रतिशत तक खरीफ के मौसम में हानि पहुँचा सकती है | इसकी पहचान यह है की आरम्भ में पौधों के निचले पत्तों पर हल्के काले गोल अंडाकार धब्बे बनते हैं जिनका आकार 0.2 से 5 मि.मी. तक होता है | बाद में ए धब्बे बढ़ जाते तथा पत्ते झुलस कर गीर जाते हैं | एसे पौधे कमजोर पद जाते हैं तथा फूल का आकार भी छोटा हो जाता है |

रोकथाम :- इस रोग की रोकथाम के लिए एम – 45 दावा का प्रयोग करें | 1250 से 1500 ग्राम मात्रा को प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें | इसका प्रयोग 10 दिन के अंतराल पर 2 से 3 छिड़काव बीमारी शुरू में ही करें |

#फूल गलन (हेत राट) :-
यह रोग इस फसल की प्रमुख बीमारी है | इसकी पहचान यह है की आरम्भ में फूल के पिछले भाग पर डंडी के पास हल्के भूरे रंग का धब्बा बनता है | यह धब्बा आकार में बढ़ जाता है तथा फूल को गला देता है | कभी – कभी फूल की डंडी भी गल जाती है तथा फूल टूट कर लटक जाता है | इस रोग के कारण फूलों में दाने नहीं बनते |

रोकथाम :- इस रोग की रोकथाम के लिए एम – 45 या कापर आक्सिक्लोराइड दावा का प्रयोग करें | 1250 से 1500 ग्राम दावा को प्रति हैक्टेयर की दर से फूल आने पर 15 – 15 दिन के नत्रल पर 2 छिड़काव करें |

#जड़ तथा तना गलन :-
यह बीमारी फसल में किसी भी अवस्था पर आ सकती है, परन्तु फूलों में दाने बनते समय अधिक आती है | रोग ग्रस्त पौधों की जड़ें गली तथा नर्म हो जाती है तथा तना 4 इंच से 6 इंच तक कला पद जाता है | एसे पौधे कभी – कभी जमीन के पास से टूट कर गीर जाते हैं रोग द्र्स्ट पौधे सुख जाते हैं |

रोगथाम :- इस रोग की रोथं के लिए थाइरम या केप्टान (फंफूंदनाशक) दावा का प्रयोग करें | इस दवा का 3 ग्राम/किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें | इस दावा का प्रयोग बीज बीजोपचार करें व इस रोग से बचाव के लिए भूमि में समुचित मात्रा में नमी रखें |

#झुलसा रोग :-
यह रोग लगभग सभी फसलों में होता है इस रोग से पौधे झुलस जाते हैं |

रोकथाम :- इस रोग का रोकथाम के लिए मैटालेक्सिन दवा का प्रयोग करें | इस दावा का 4 ग्राम / किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें | इस रोग की रोकथाम के लिए बीजोपचार करे व अचछे जल निकास की व्यवस्था करें | फसल चक्र अपनाएं एवं रोग ग्रस्त पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर दें |

#कीट एवं उनका नियंत्रण 

फसल को रोग के अलावा कीट से भी काफी नुकसान होता है | इसकी रोक थाम बहुत जरुरी है | इस फसल में कई तरह के कीट का प्रकोप होता है | कुछ कीट पत्ती में लगती है तो कुछ कीट तने में लगती है | इसलिए सभी कीटों की जानकारी होना जरुरी है |

#कटुआ सुंडी :-
इस रोग का लक्षण यह है कि अंकुरण के पश्चात् व बाद तक भी पौधों को जमीन की स्थ के पास से काट कर नष्ट कर देती है |

रोकथाम :- इस रोग की रोकथाम के लिए मिथाइल पैराथियान दावा का प्रयोग करें | इस दावा का 2 प्रतिशत चूर्ण 25 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से भुरकाव करें |

#पत्ते कुतरने वाली लट :-
यह कीट दो तिन प्रकार की पत्ते कुतरने वाली लटों (तम्बाकू कतर पिलर, बिहार हेयर कतर पिलर, ग्रीन कतर पिलर) का प्रयोग देखा गया है |

रोकथाम :- इस कीट की रोकथाम के लिए डायमिथोएट 30 ई.सी. का प्रयोग करें | इस दवा की 875 मिली. का प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें |

#तना फली छेदक :-
इस कीट की सुंडिया कोमल पत्तों को काटकर व फूलों में छेड़ करके खा जाती है |

रोकथाम :- इस कीट की रोकथाम के लिए मोनोक्रोतोफास 36 डब्लू.एस.सी. का प्रयोग करें | इस दवा को एक लीटर को प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें |

#कटाई गहाई एवं आय व्यय 

कटाई :- 
फसल में पौध पककर पीले रंग में बदलने लगते है तब कटाई करना चाहिए |
सूरजमुखी की फ्लेटें एक साथ नहीं पकती है अत: यह सावधानी रखना चाहिए की परिपक्क फ्लेटें ही कटी जाए |
फ्लेटों को खेत में सुखाने के लिए 5 से 6 दिन के लिए छोड़ देना चाहिए | जिससे फ्लेटों की अतरिक्त नमी सुख जाए |
यह क्रिया गहाई में सहायक है |

#गहाई :-

गहाई साफ जमीन पर की जाती है |
सूखे फूलों को लाठी से पीटकर या दो फूलों को आपस में रगड कर गहाई की जा सकती है | यदि फसल ज्यादा हो तो थ्रेसर की सहयता ली जा सकती है | बीजों को सुपे से फटककर साफकर धूप में सुखा लें |

#उपज
इस फसल की उपज इसकी प्रजातियों पर भी निर्भर करता है | देरी से पकने वाली 8 से 10 किवंटल/हैक्टेयर एवं मध्यम 15 से 20 किवंटल / हैक्टेयर उत्पादन है |

मुंग की खेती की संपूर्ण जानकार



मूंग दलहन फसलों में काफी अहम मानी जाती है. इसकी दाल को छिल्के के साथ और बिना छिलके के खाया जाता है. मूंग की दाल के अंदर 25 प्रतिशत प्रोटीन और 60 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है. इस कारण ये मनुष्य के लिए बहुत उपयुक्त होती है. मूंग की दाल का रंग हरा होता है. इसकी फलियों को कच्चे रूप में भी खाया जाता है. लेकिन पकने के बाद इसे कई तरह से खाने में इस्तेमाल करते हैं.
वर्तमान में इसकी सबसे ज्यादा पैदावार राजस्थान में की जा रही है. क्योंकि राजस्थान की जलवायु इसकी खेती के लिए उपयुक्त होती है. राजस्थान के अलावा इसे हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात में भी बड़े पैमाने पर उगाया जाता है.
मूंग दलहन फसलों में काफी अहम मानी जाती है. इसकी दाल को छिल्के के साथ और बिना छिलके के खाया जाता है. मूंग की दाल के अंदर 25 प्रतिशत प्रोटीन और 60 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है. इस कारण ये मनुष्य के लिए बहुत उपयुक्त होती है. मूंग की दाल का रंग हरा होता है. इसकी फलियों को कच्चे रूप में भी खाया जाता है. लेकिन पकने के बाद इसे कई तरह से खाने में इस्तेमाल करते हैं.
मुंग की खेती ज्यादातर खरीफ के मौसम में की जाती है. जिसके लिए बलुई मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है. इसके पौधों को सामान्य बारिश की जरूरत होती है. लेकिन फलियों के पकने के दौरान होने वाली बारिश इसकी पैदावार को अधिक नुक्सान पहुँचाती है. फलियों के पकने के दौरान बारिश के होने पर फली फट जाती हैं. मूंग की खेती के लिए जमीन का पी.एच. मान सामान्य होना चाहिए.


#उपयुक्त मिट्टी
मूंग की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है. बलुई दोमट मिट्टी के अलावा इसे और भी कई तरह की मिट्टी में उचित देखरेख कर आसानी से उगाया जा सकता है. इसके लिए मिट्टी में पानी का भराव नहीं होना चाहिए. क्योंकि मिट्टी में पानी का भराव होने पर पौधा जल्द खराब हो जाता है. इसकी खेती के लिए मिट्टी का पी.एच. मान 6 से 7.5 तक होना चाहिए
#जलवायु और तापमान
मूंग की खेती के लिए किसी ख़ास जलवायु की जरूरत नही होती. भारत वर्ष में इसे खरीफ और रबी दोनों मौसम में उगाया जाता है. उत्तर भारत में इसकी खेती खरीफ और जायद के मौसम में की जाती है तो दक्षिण भारत में इसकी खेती रबी के मौसम में की जाती है. इसके पौधे को अधिक बारिश की जरूरत भी नही होती.
इसकी खेती के लिए सामान्य तापमान की जरूरत होती है. सामान्य तापमान पर इसके पौधे अच्छी पैदावार देते हैं. इसके पौधे 40 डिग्री तापमान को भी सहन कर लेते हैं. लेकिन पौधों पर फूल और फल बनने के दौरान अधिक तापमान उपयुक्त नही होता. क्योंकि अधिक तापमान होने पर इसके फूल ख़राब होने की संभावना बढ़ जाती है.




#उन्नत किस्में
मूंग की वर्तमान में कई तरह की उन्नत किस्में मौजूद हैं. जिन्हें उनकी पैदावार के हिसाब से तैयार किया गया है.

#आर. एम. जी. – 62
मूंग की इस किस्म को सिंचित और असिंचित दोनों जगहों पर लगाया जा सकता है. इस किस्म के पौधों पर कोण और फली छेदक रोग का प्रकोप देखने को नही मिलता. इस किस्म के पौधों की प्रति हेक्टेयर पैदावार 8 से 10 क्विंटल तक पाई जाती है. इसकी फलियों को पकने के लिए 60 से 70 दिन का वक्त लगता है. इसकी सभी फलियां एक साथ पकती है.

#आर. एम. जी. – 344
मूंग की इस किस्म को खरीफ और जायद दोनों मौसम में उगाया जा सकता है. इसके पौधे 65 से 70 दिन में कटाई के लिए पककर तैयार हो जाते हैं. इस किस्म की प्रति हेक्टेयर पैदावार 9 क्विंटल के आसपास पाई जाती है. इस किस्म को ज्यादातर सिंचित जगहों पर लगाया जाता है।

#आर. एम. एल. – 668
इस किस्म की प्रति हेक्टेयर पैदावार 8 से 9 क्विंटल तक पाई जाती है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के बाद लगभग 65 से 70 दिन में कटाई के लिए पककर तैयार हो जाते हैं. जिन पर बैक्टीरियल बलाईट का प्रभाव देखने को नही मिलता. इस किस्म की पैदावार खरीफ और जायद दोनों मौसम में की जा सकती हैं.

#गंगा 8
इस किस्म की बुवाई उचित टाइम और उसमें देरी हो जाने पर की जाती है. इसकी फलियों को पकने के लिए 70 से 75 दिन का वक्त लगता है. इस किस्म की प्रति हेक्टेयर पैदावार 10 क्विंटल के आसपास देखने को मिलती है. इस किस्म के पौधों पर बैक्टीरियल बलाईट और पत्ती धब्बा रोग देखने को नही मिलता.

#जी. एम. – 4
इस किस्म के पौधे 65 दिन में कटाई के लिए पककर तैयार हो जाते हैं. इस किस्म की प्रति हेक्टेयर पैदावार 12 क्विंटल के आसपास पाई जाती है. इस किस्म की फलियां एक साथ पकती है. इनके बीजों का रंग हरा और आकार में बड़ा होता है.

#के. – 851
इस किस्म को सिंचित और असिंचित दोनों जगहों के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के बीज आकार में बड़े और चमकीले दिखाई देते हैं. इस किस्म के पौधे 70 से 80 दिनों बाद कटाई के लिए पककर तैयार हो जाते हैं. इस किस्म की प्रति हेक्टेयर पैदावार 10 क्विंटल के आसपास पाई जाती है.

#पूसा विशाल
इस किस्म को उत्तर भारत के राज्यों में गर्मियों के मौसम में उगाया जाता है. इस किस्म के पौधों पर पीली चित्ती का रोग नही पाया जाता है. इस किस्म के बीज गहरे हरे और चमकदार होते हैं. इसकी फलियों को पकने के लिए 60 से 70 दिन का वक्त लगता है. इसकी प्रति हेक्टेयर पैदावार लगभग 12 क्विंटल के आसपास पाई जाती है.

#टाइप – 44
मूंग की इस किस्म के पौधे बौने आकार के होते हैं. इसकी प्रति हेक्टेयर पैदावार 8 से 10 क्विंटल के आसपास पाई जाती है. इस किस्म के बीजों का आकर भी सामान्य और रंग गहरा हरा, चमकीला होता है. जो कटाई के लिए पककर तैयार होने में 60 से 70 दिन का वक्त लेते हैं. मूंग की इस किस्म को किसी भी मौसम में उगाया जा सकता है.

#पूसा बैशाखी
पूसा बैसाखी को टाइप – 44 के संकरण से तैयार किया गया है. इस किस्म की पत्तियां हरी जबकि तने पर कुछ गुलाबी रंग के धब्बे दिखाई देते हैं. इस किस्म के बीज सामान्य आकार के हरे चमकीले होते हैं. इस किस्म की सभी फलियां एक साथ पकती हैं. मूंग की इस किस्म को खासकर गर्मियों के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे 60 से 70 दिनों में पककर तैयार हो जाते हैं. जिनकी प्रति हेक्टेयर पैदावार 12 क्विंटल से ज्यादा पाई जाती हैं.
इनके अलावा और भी कई किस्में हैं जिन्हें लोग अलग अलग समय पर अधिक पैदावार देने के लिए उगाते हैं.



#खेत की जुताई
मूंग की खेती के लिए मिट्टी का भुरभुरा होना जरूरी होता है. इसके लिए खेत की पहली जुताई पलाऊ लगाकर करनी चाहिए. पलाऊ लगाने के बाद खेत में गोबर की खाद डालकर उसकी फिर से दो से तीन तिरछी जुताई कर खाद को मिट्टी में मिला दें. और खेत में पानी चलाकर उसका पलेव कर दें. खेत में पानी चलाने से खेत में खरपतवार निकल आती हैं. जब खेत में खरपतवार निकल आयें तब खेत में रोटावेटर चलाकर उसे समतल बना लें. रोटावेटर चलाने से खेत की मिट्टी भुरभुरी हो जाती है. भुरभुरी मिट्टी में बीजों का अंकुरण अच्छे से होता है.

#बीज बुवाई का वक्त और तरीका
बीज को खेत में उगाने से पहले उसे उपचरित कर खेत में लगाए. इसके लिए बीज को थायरम और कार्बेन्डाजिम से उपचारित कर खेत में उगाना चाहिए. या फिर प्रमाणित बीज को ही किसान भाइयों को खेतों में उगाना चाहिए. मूंग के बीजों की बुवाई अलग अलग मौसम के अनुसार की जाती है.
खरीफ के मौसम में उगाई जाने वाली किस्मों को जून से लेकर जुलाई महीने के पहले सप्ताह तक उगा देना चाहिए. जबकि जायद के मौसम में उगाई जाने वाली फसलों को मार्च से लेकर अप्रैल महीने के दूसरे सप्ताह तक उगा सकते है. मूंग की खेती में एक हेक्टेयर के लिए 10 से 12 किलो बीज काफी होता है.
मूंग के बीजों की बुवाई सहायक फसलों के रूप में भी की जाती है. सहायक फसलों के रूप में इसे परिस्थिति के अनुसार उगाया जाता है. लेकिन साधारण रूप से इसकी खेती करने के लिए इसकी उचित तरीके से बुवाई की जाती है. इसकी बुवाई मशीनों की सहायता से की जाती है. इसकी बुवाई करते वक्त दो पंक्तियों के बीच लगभग एक से सवा फिट की दूरी होनी चाहिए.  पंक्ति में प्रत्येक पौधे को 10 से 15 सेंटीमीटर की दूरी पर तीन से चार सेंटीमीटर की गहराई में उगाना चाहिए.

#उर्वरक की मात्रा
मूंग के पौधों को ज्यादा उर्वरक की जरूरत नही होती. मुंग का पौध खुद जमीन में नाइट्रोजन की पूर्ति करता है. मूंग के पौधों की जड़ों में गाठें पाई जाती है. जो जमीन में नाइट्रोजन छोड़कर जमीन की उर्वरक क्षमता को बढ़ाती हैं. लेकिन शुरुआत में इसके पौधों को उर्वरक की जरूरत होती है.

#मूंग की रोपाई से पहले खेत की जांच करवाकर उसमें आवश्यक तत्वों के आधार पर उर्वरक की उचित मात्र दें. क्योंकि अलग तरह की मिट्टी में इसके पौधे को उर्वरक की अलग अलग मात्रा की जरूरत होती है. जैसे बलुई दोमट मिट्टी में जिंक की कमी होने पर इसे जिंक सल्फेट देना चाहिए. और काली मिट्टी में सल्फर की कमी होने पर आखिरी जुताई के वक्त सल्फर का छिडकाव करना चाहिए.
मूंग की खेती के लिए शुरुआत में खेत की जुताई के वक्त 10 से 15 गाडी प्रति एकड़ के हिसाब से गोबर की पुरानी खाद खेत में डाल दें. इसके अलावा पलेव करने के बाद आखिरी जुताई के वक्त एन.पी.के. की 50 किलो मात्रा को प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में छिड़क दें. एन.पी.के. की जगह डी.ए.पी. का भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

#पौधों की सिंचाई
मूंग की पहली सिंचाई उसकी बुवाई के लगभग 20 से 25 दिन बाद कर देनी चाहिए. इसके बाद दूसरी सिंचाई 10 दिन बाद कर दे. मूंग के पौधे को चार से पांच सिंचाई की जरूरत होती है. इसकी बाकी की सिंचाई आवश्यकता के अनुसार उचित वक्त पर देनी चाहिए. इससे पौधा अच्छे से विकास करता है और पैदावार भी अधिक होती है. पौधे में फली बनने के वक्त खेत में नमी की उचित मात्रा बनाए रखने पर पैदावार अधिक मिलती है. क्योंकि नमी की वजह से फलियों में दानों का आकार और संख्या दोनों में वृद्धि होती है.
जायद के समय में उगाई जाने वाली किस्मों को सिंचाई की ज्यादा जरूरत नही होती. क्योंकि बारिश के मौसम में उगाई जाने के कारण इन्हें पानी की काफी कम आवश्यकता होती है. जायद के मौसम वाली किस्मों को शुरूआती सिंचाई की ही जरूरत होती है.

#खरपतवार नियंत्रण
मूंग के पौधों में खरपतवार नियंत्रण करने से पौधे तेज़ी से विकास करते हैं. जिससे पैदावार भी ज्यादा प्राप्त होती है. मूंग की खेती में खरपतवार नियंत्रण रासायनिक और प्राकृतिक दोनों तरीके से किया जाता है. प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण नीलाई गुड़ाई के माध्यम से किया जाता  है. मूंग के पौधों की पहली गुड़ाई पहली सिंचाई के दो से तीन बाद कर देनी चाहिए. और दूसरी गुड़ाई पहली गुड़ाई के लगभग 20 दिन बाद कर देनी चाहिए.
रासायनिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए खेत की आखिरी जुताई से पहले पेन्डीमेथलीन की 3.30 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में मिलाकर खेत में छिडकाव करना चाहिए.


#पौधों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम
मूंग के पौधे को कई तरह रोग लगते हैं. जिनसे पौधों की सुरक्षा करना जरूरी होता है. इसके लिए पौधों की देखभाल करते रहना चाहिए.

#दीमक
दलहनी फसलों में दीमक का रोग अक्सर दिखाई देता हैं. मूंग के पौधों पर दीमक का रोग किसी भी अवस्था में लग सकता है. लेकिन ये रोग पौधे की शुरुआती अवस्था में अधिक देखने को मिलता है. पौधे के अंकुरण के साथ ही दीमक पौधे को नष्ट कर देती है. इस रोग की रोकथाम के लिए क्यूनालफास की उचित मात्रा को आखिरी जुताई के वक्त खेत में छिडक दें. इसके अलावा क्लोरोपाइरीफॉस की उचित मात्रा से बीज को खेत में लगाने से पहले उपचारित कर लेना चाहिए.

#कातरा
कातरा का रोग मूंग की खेती में अक्सर देखने को मिलता है. इसका कीड़ा कई रंगों में पाया जाता है. जिसके पूरे शरीर पर रुयें (बाल ) दिखाई देते हैं. कातरे का कीड़ा पौधे के नर्म भागों को खाकर पौधे को नुक्सान पहुँचाता है. इस तरह के कीट दिखाई देने पर पौधे पर सर्फ का घोल बनाकर उसका छिडकाव कर दें. इसके अलावा क्यूनालफास का छिडकाव पौधों पर कर दें.

#फली छेदक
मूंग के पौधों पर ये रोग फली बनने के दौरान अधिक देखने को मिलता है. इस रोग का किट फली के अंदर जाकर फसल को नुक्सान पहुँचाता है. इसके कीट का रंग हरा और पीला होता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर मोनोक्रोटोफास या मैलाथियान का छिडकाव उचित मात्रा में करना चाहिए. अगर फिर भी पौधे पर इसका प्रभाव दिखाई दे तो लगभग 15 दिन बाद फिर से एक और छिडकाव कर दें.

#चित्ती जीवाणु रोग
चित्ती जीवाणु रोग पौधे पर मध्य अवस्था में ज्यादा देखने को मिलता है. इस रोग की वजह से पौधे की वृद्धि रुक जाती है. इस रोग के लगने पर पौधे के सभी कोमल भागों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर एग्रीमाइसीन या स्टेप्टोसाईक्लीन की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर करना चाहिए.

#रस चूसक कीड़े
रस चूसक कीड़े पौधे को अधिक नुक्सान पहुँचाते हैं. रस चूसक कीड़े पौधे की पत्तियों का रस चूसकर उन्हें नष्ट कर देते हैं. जिससे पौधा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया नही कर पाता. इस रोग के लगने पर पौधों पर इमिडाक्लोप्रिड का छिडकाव 15 दिन के अंतराल में दो बार करना चाहिए.

#झुलसा रोग
झुलसा का रोग लगभग सभी दलहन फसलों में देखने की मिलता है. पौधों पर ये रोग ज्यादातर गर्मियों के मौसम में देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर पौधे की पत्तियां सिकुड़कर पीली पड़ने लगती है. और कुछ दिन बाद पत्तियां पूरी तरह से नष्ट हो जाती हैं. इस रोग के लगने पर पौधे का तना भी धीरे धीरे काला दिखाई देने लगता है. इस रोग की रोकथाम के लिए बीज को मैनकोजेब से उपचारित कर लगाना चाहिए. इसके अलावा पौधों पर मैनकोजेब का ही छिडकाव करना चाहिए.


#पती धब्बा
पौधों पर पत्ती धब्बा रोग के लगने पर पत्तियों पर छोटे गोल बेंगनी लाल रंग के धब्बे दिखाई देते हैं. जो धीरे धीरे बड़े होकर एक बड़ा धब्बा बना लेते हैं. जो बीच से सुखा हुआ नजर आता है. इस रोग की वजह से धीरे धीरे पूरा पौधा सुखने लगता है. इस रोग के लगने पर पौधों पर कार्बेन्डाजिम की उचित मात्रा को पानी में मिलकर उसका छिडकाव पौधों पर करना चाहिए. इसके अलावा बीजों की रोपाई के वक्त उन्हें कैप्टान से उपचारित कर उगाना चाहिए.

#किंकल विषाणु रोग
पौधे पर ये रोग उसकी मध्य अवस्था में ज्यादा देखने को मिलता है. इस रोग का सबसे ज्यादा असर पैदावार पर देखने को मिलता है. इस रोग की वजह से पौधे की पत्तियों का आकार विकृत हो जाता है. और पौधे पर काफी कम मात्रा में फलियों का निर्माण होता है. इस रोग के लगने पर पौधों पर डाइमिथोएट 30 ई.सी. का छिडकाव करना चाहिए. इसके अलावा अधिक प्रभाव दिखाई दे तो 15 दिन के अंतराल में मिथाइल डिमेटान 25 ई.सी. का दो बार छिडकाव करें.

#पौधे की कटाई और गहाई
मूंग की फसल लगभग 60 से 70 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाती है. इसकी फली पकने के बाद काली दिखाई देने लगती है. इस दौरान पौधों की कटाई कर लेनी चाहिए. क्योंकि अगर फली काली दिखाई देने के बाद इसे कुछ दिन नही काटते हैं तो इसकी फलियाँ पौधे पर ही फटने लगती हैं.
इसके पौधों को काटने के बाद उन्हें एक जगह एकत्रित कर उन्हें सूखा लेना चाहिए. जब फलियां अच्छी तरह से सुख जाएँ तब उन्हें मशीन की सहायता से निकलवा लेना चाहिए. इस दौरान मशीन को धरे चलाना चाहिए. क्योंकि ज्यादा तेज़ गति होने पर बीज कटने लगते हैं.

#पैदावार और लाभ
मूंग की फसल दो से तीन महीने की होती है. कम समय की फसल होने के कारण किसान भाई अपने खेतों से एक साल में तीन पैदावार ले सकता है. मूंग की प्रति हेक्टेयर पैदावार 8 से 10 क्विंटल तक पाई जाती है. जिसका बाज़ार में थोक भाव 4 हज़ार से 6 हज़ार तक पाया जाता है. इस हिसाब से किसान भाई एक बार में एक हेक्टेयर से 40 हज़ार के आसपास कमाई कर लेता है.

किसानों के लिये वरदान अरहर की धारवाहड़ विधि।



किसानों के लिये वरदान अरहर की धारवाहड़ विधि।

अरहर की धारवाहड़ विधि {रोपाई विधि} उत्पादन की दृष्टि से एक लाभकारी विधि हैं। इस तकनीक से खेती करने से उत्पादन लगभग 15-16 क्विंटल प्रति एकड़ तक ले   सकते हैं। इस विधि में कृषक भाई अरहर के बीज को 10 मई से 10 जून तक पोलीथीन की थैलियों में उपचारित कर बीज की बुवाई कर दें। पौधा तैयार करने वाली थैलियों में भुरभुरी जीवांश युक्त मिट्टी और वर्मी कम्पोस्ट, गोबर खाद एवं 2 किग्रा ट्रॉइकोडरमा, 1 किग्रा पी.एस.बी. कल्चर व 1 किग्रा राईजोबियम कल्चर मिलाकर थैलियों में भरकर छायादार स्थान में रखकर उनमें स्वस्थ्य उन्नत किस्म के 2-2 बीज की बुवाई कर दे।

बीज दर : -
एक एकड़ के लिए 1 किग्रा बीज पर्याप्त होता है। 

बीज उपचार : -
2 ग्राम रिडोमिल गोल्ड एवं 2 ग्राम क्लोरोपायरीपास से 1 किग्रा बीज को उपचारित करें ।

#किस्म : - अपने क्षेत्र अनुसार किस्मों का चुनाव करें या रिचा 2000 लगाये ।

रिचा 2000 अरहर की विशेषताएँ:-
प्रति पौधे गुच्छों में 700 - 800 फलियां एवं फलियां की लम्बाई 11 से. मी. ।
फली में दाने की संख्या 5 - 6 रंग लाल ।

बोने का समय : - 
1. धारवाहड़ विधी : - 10 मई से 10 जून 
2. वर्षा ऋतु : -15 जून - 15 जूलाई

सहफसली खेती : -
अरहर + मूंगअरहर ,उर्द 
अरहर + मक्का 

सिचांई : -
फब्बारा या हजारा से दिन में दो बार सिंचाई करें।

पौधों से पौधों की दुरी : -
3×3 फिट या 4×4 फिट ।

#लाईन से लाईन की दुरी : -
4 × 4 या 5 × 5 या 6 × 6 फिट ।

रोपाई : -
जब रोपणी 25-30 दिन की हो जाये तब तैयार खेत में रोपाई कर दी जाये।

खाद : -
अरहर का पौधा लगाने के पूर्व एक एकड़ में 2 टन वर्मी कम्पोस्ट या 4 टन गोबर खाद मिला दे ।

उर्वरक  : -

मिश्रण : - 1
Urea - 20 kg
S.S.P. - 150 kg
M.O.P. - 15 kg
Zink - 05 kg

मिश्रण : - 2
D.A.P. - 50 kg
Urea - 00 kg
M.O.P. - 15 kg
Zink - 05 kg

मिश्रण : - 3
12:32:16 - 50kg
Zink - 05 kg
प्रति एकड़ की दर से खेत में मिला दें।

नोट : - 
1) तीनों उर्वरक मिश्रण मे से कोई एक मिश्रण का उपयोग करें ।
2) D.A.P. को जिंक के साथ न मिलाये ।

रोपाई : -
पौधा रोपाई का कार्य वर्षा होने के बाद करे और रोपाई के बाद एक-एक मग पानी प्रति पौधा दो दिन तक देना चाहिए। रोपाई के 20 - 25 {1.5-2 फिट} पर पहली खुटाई व 40-45 दिन बाद पौधों की ऊपर से दुसरी खुटाई कर दे। जिससे शाखाओं में वृद्धि हो जाती है। और उत्पादन मे वृद्धि होती है।

Saturday, February 15, 2020

हाईब्रिड बैंगन की खेती



बैंगन एक पौष्टिक सब्जी है। इसमें विटामिन ए एवं बी के अलावा कैल्शियम, फ़ॉस्फ़रस तथा लोहे जैसे खनीज भी होते है। यदि इसकी उपयुक्त उत्तम क़िस्में तथा संकर किंस्में बोई जाए और उन्नत वैज्ञानिक सस्य क्रियाएं अपनाई जाएं तो इसकी फ़सल से काफ़ी अधिक उपज मिल सकती है।

बैंगन की क़िस्में
 
पूसा हाईब्रिड -5
पौधे की अच्छी बढ़वार तथा शाखाएँ ऊपर को उठी हुई होती है, फल मध्यम लम्बाई के, चमकदार तथा गहरे बैंगनी रंग के होते है। बुआई से पहली तुड़ाई में 85- 90 दिन लगते है। उत्तरी
तथा मध्य भारत के मैदानी क्षेत्रों तथा समुद्र तट को छोड़ कर कर्नाटक, केरल, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु क्षेत्र के लिये उपयुक्त है। उपज 450 से 650 क्विंटल प्रति हेक्टेअर होती है।

पूसा हाईब्रिड-6
पौधे मध्यम सीधे खडे रहने वाले होते हैं। फल गोल, चमकदार, आकर्षक बैंगनी रंग के होते है, प्रत्येक फल का वजन लगभग 200 ग्राम होता है। बुआई से पहली गुड़ाई में 85-90 दिन लगते है। उपज 400-600 क्विंटल प्रति हेक्टेअर होती है।

पूसा हाईब्रिड 9
पौधे सीधे खडे रहने वाले होते हैं। फल अण्डाकार गोल, चमकदार बैंगनी रंग के होते हैं। प्रत्येक फल का वजन लगभग 300 ग्राम होता है । बुआई के पहली तुडाई में 85-90 दिन लगते है । गुजरात तथा महाराष्ट्र क्षेत्र के लिए उपयुक्त है । इसकी औसत उपज 500 क्विंटल प्रति हेक्टेअर है।

पूसा क्रान्ति
इस क़िस्म के फल गहरे बैंगनी रंग के मध्यम लम्बाई के होते है यह क़िस्म बसन्त तथा सर्दी दोनों मौसमों के लिये उपयुक्त पाई गई है । इसकी औसत उपज 300 किंवटल प्रति हेक्टेअर है।
पूसा भैरव इसके फल गहरे बैंगनी रंग के थोड़े मोटे व कुछ लम्बे होते है । यह क़िस्म फल-गलन रोग प्रतिरोधी है।

पूसा पर्पल कलस्टर
पौधें सीधे खडे रहने वाले होते है। पत्तियाँ रगंदार होती है। फल 9 से 12 सें०मी० लम्बे तथा गुच्छे में लगते है। यह क़िस्म पहाडी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। यह क़िस्म फल तथा तना छेदक,जीवाणु तथा उकटा रोग के लिए कुछ रोधक है।
पूसा अनुपम पौधे मध्यम तथा सीधे होते हैं। फल पतले, बैगनी रंग के होते हैं। फल गुच्छे में लगते है। यह क़िस्म उकठा रोग प्रतिरोधी है।
 
पूसा बिन्दु
इस क़िस्म के बैंगन छोटे,गोल और चमकदार होते हैं । जिनका रंग गहरा बैंगनी डंठल चित्तीदार होता है । यह क़िस्म 90 दिन में तैयार हो जाती है । औसत उपज 300 क्विंटल प्रति हेक्टेअर है । यह क़िस्म उत्तरी मैदानी क्षेत्रों के लिये उपयुक्त है।

पूसा उत्तम 31
इसके फल अण्डाकार गोल चमकदार, गहरे बैंगनी रंग और मझौले आकार के होते हैं । बुआई से पहली तुड़ाई में 85-90 दिन लगते हैं। औसत उपज 425 क्विंटल प्रति हेक्टेअर है । यह क़िस्म उत्तरी मैदानी तथा पश्चिमी क्षेत्रों के लिये उपयुक्त है ।

पूसा उपकार
इसके फल गोल चमकदार, गहरे बैंगनी रंग और मझौले आकार के होते हैं। फल का औसत वजन 200 ग्राम होता है । पहली तुडाई फसल बोने के 85 दिन बाद की जा सकती है । यह क़िस्म उत्तरी मैदानी क्षेत्र के लिए उपयुक्त है । इसकी औसत उपज 400 क्विंटल प्रति हेक्टेअर है ।

पूसा अंकुर
यह एक अगेती क़िस्म है जो बुआई की तारीख से 75 दिनों में फल तोडने के लायक हो जाते हैं। फल छोटे, गहरे बैंगनी , अण्डाकार गोल चमकीले होते हैं । इसकी औसत उपज 350 क्विंटल प्रति हेक्टेअर है ।

नर्सरी
इसके बीज उठी हुई क्यारियों में लगभग 1 सें०मी० की गहराई पर 5 से 7 सें०मी० के फासलों पर बनी कतारों में बोने चाहिएँ। एक हेक्टेअर क्षेत्र में रोपाई के लिये लगभग 400 ग्राम बीज
पर्याप्त है। संकर क़िस्मों के बीज की मात्रा 250 ग्राम पर्याप्त रहती है। भारी आकार वाली क़िस्मों के लिये पंक्ति से पंक्ति की दूरी 70 सें०मी० तथा पौधों से पौधों की दूरी 60 सें०मी० रखी जाती है। छोटे आकार वाली क़िस्मों के लिये पंक्ति से पंक्ति तथा पौधे से पौधे की दूरी का फासला 60 x 60 या 60x 45 सें०मी० रखा जा सकता है।
 
बुआई
 
शरद फसल
इस फसल के बीज मई-जून में बोए जाते हैं और पौध रोपाई जून के अन्त से जुलाई के मध्य तक की जा सकती है।

बसंत-ग्रीष्म
इस फसल के बीज नवम्बर के मध्य में बोये जाते हैं और पौध जनवरी के अन्त में तब रोपी जाती है, जब पाले का भय समाप्त हो जाता है।

वषा ऋतु
इस फसल के बीज फरवरी- मार्च के महीनों में बोए जाते हैं और पौध की रोपाई मार्च-अप्रैल के महीनों में की जाती है।

खाद और उर्वरक
खाद व उर्वरक की मात्रा मिट्टी की जांच के आधार पर की गई सिफारिश के अनुसार रखनी चाहिए। जहां मिट्टी की जांच न की हो खेत तैयार करते समय 25-30 टन गोबर की सड़ी खाद मिट्टी में अच्छी तरह मिला देनी चाहिए। इसके साथ-साथ 200 किलो ग्राम यूरिया, 370 किलो ग्राम सुपर फ़ॉस्फ़ेट और 100 किलो ग्राम पोटेशियम सल्फ़ेट का इस्तेमाल करना चाहिए। यूरिया की एक तिहाई मात्रा और सुपरफ़ॉस्फ़ेट तथा पौटेशियम
सल्फ़ेट की पूरी मात्रा खेत में आखिरी बार तैयारी करते समय इस्तेमाल की जानी चाहिए। बची यूरिया की मात्रा को दो बराबर
खुराकों में देना चाहिए। पहली खुराक पौधे की रोपाई के 3 सप्ताह बाद दी जाती है जबकि दूसरी मात्रा पहली मात्रा देने के चार सप्ताह बाद दी जानी चाहिए।

पौध संरक्षण
रोपाई के 2 सप्ताह बाद मोनोक्रोटोफास 0.04 % घोल, 15 मि०ली० प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें। प्ररोह बेधक से प्रभावित फलों और प्ररोहों को जहां से तना मुरझाया हो उसके आधे इंच नीचे से काट दें और उन्हें ज़मीन में गाढ दें। खेतों को बेधकों से मुक्त रखने के लिए यह काम प्रति दिन करते रहे। मोनोक्रोटोफोस के छिड़काव के 3 सप्ताह बाद डेसिस 0.005 प्रतिशत घोल या 1 मि०ली० प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें। डेसिस के छिड़काव के 3 सप्ताह बाद ब्लिटाकस प्रति कैप्टान-2 ग्राम प्रति लीटर पानी और मिथाइल पेराथियोन -2 मि०ली० प्रति लीटर पानी का छिड़काव करे। अगर जैसिड की समस्या हो तो मिथाइल पेराथियोन का छिड़काव फिर से करें लेकिन मिथाइल पेराथियोन छिड़कने से पहले फलों को तोड़ लें। प्ररोह बेधक से प्रभावित फलों और प्ररोहों को जहां से तना मुरझाया हो उसके आधे इंच नीचे से काट दें और उन्हें जमीन में गाड़ दें। खेतों को बेधकों से मुक्त रखने के लिए यह काम प्रतिदिन करते रहें।मोनोक्रोटोफोस के छिडकाव के 3 सप्ताह बाद डेसिस 0.005 प्रतिशत घोल या 1 मि. ली. प्रति लीटर पानी का छिडकाव करें। डेसिस के छिडकाव के 3 सप्ताह बाद ब्लिटाकस प्रति कैप्टान - 2 ग्राम प्रति लीटर पानी और मिथाइल परथिओन-2 मि. ली. प्रति लीटर पानी का छिड़काव करे। यदि जैसिड की समस्या हो तो मिथाइल पेराथियोन का छिडकाव फिर से करें लेकिन मिथाइल पेराथियोन छिडकने से पहले फलों को तोड लें।

कटाई
बैंगन के फल जब मुलायम हों और उनमें ज्यादा बीज न बनें हों तभी उन्हें तोड़ लेने चाहिए। ज्यादा बड़े होने पर इनमें बीज पड़ जाते हैं और तब ये उतने स्वादिष्ट नहीं रह जाते।

Friday, February 14, 2020

परवल (सब्जी) की उन्नत फसल



परवल सब्जी की फसलो में आता है, इसकी खेती बहुवर्षीय की जाती हैI इसे ज्यादातर पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल में उगाया जाता हैI लेकिन असम, ओडिसा, मध्य प्रदेश , महाराष्ट्रा एवं गुजरात के कुछ भागो में इसकी खेती की जाती हैI इसके साथ ही बिहार की दियार भूमि तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के रैनफेड क्षेत्र में अत्याधिक खेती की जाती हैI इसमे विटामिन ए एवं सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता हैI

जलवायु
परवल को गर्म और आर्द्र जल वायु कि आवश्यकता होती है औसत वार्षिक वर्षा 100-150 से.मी,तक होती है ।

भूमि का चुनाव
परवल की खेती गर्म एवं तर जलवायु वाले क्षेत्रो में अच्छी तरह से की जाती हैI इसको ठन्डे क्षेत्रो में न के बराबर उगाया जाता है किन्तु उचित जल निकास वाली जीवांशयुक्त रेतीली या दोमट भूमि इसके लिए सर्वोत्तम मानी गई है चूँकि इसकी लताएँ पानी के रुकाव को सहन नही कर पाती है अत: उचे स्थानों पर जहाँ जल निकास कि उचित व्यवस्था हो वहीँ पर इसकी खेती करनी चाहिए ।

भूमि की तैयारी
यदि इसे उची जमीन में लगाना है तो 3 जुताइयाँ देशी हल से करके उसके बाद पाटा लगा देना चाहिए 1.5 मी.पौधे से पौधे की दुरी रखकर 30*30*30 से.मी.गहरा गड्डा खोद लेना चाहिए अत: मिटटी में 5 किलो ग्राम गोबर कि खाद मिलाकर भर देना चाहिए ।

प्रजातियां
परवल में दो प्रकार की प्रजातियां पाई जाती है, प्रथम क्षेत्रीय प्रजातियां जैसे की बिहार शरीफ, डंडाली, गुल्ली, कल्यानी, निरिया, संतोखिया एवं सोपारी सफेदा आदि है द्धितीय उन्नतशील प्रजातियां जैसे की एफ. पी.1, एफ. पी.3, एफ. पी.4, एच. पी.1, एच. पी.3, एच. पी.4 एवं एच. पी.5 है इसके साथ ही छोटा हिली, फैजाबाद परवल 1 , 3 , 4 तथा चेस्क सिलेक्शन 1 एवं 2 इसके साथ ही चेस्क हाइब्रिड 1 एवं 2 तथा स्वर्ण अलौकिक , स्वर्ण रेखा तथा संकोलिया आदि है.
 
नवीनतम किस्में
नरेंद्र परवल 260
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बुवाई /पौध रोपण
परवल का उत्पादन जड़ो जिसे की सकर कहते है या कटिंग के द्वारा रोपाई की जाती हैI कटिंग द्वारा प्रोपोगेसन या रोपाई आसानी से जल्दी की जा सकती है इसके द्वारा फसल जल्दी तैयार हो जाती हैIपरवल में कटिंग या जड़ो की संख्या रोपाई के अनुसार रोपाई की दूरी पर जैसे एक मीटर गुणे डेढ़ मीटर दूरी पर 4500 से 5000 तथा एक मीटर गुणे दो मीटर की दूरी पर 3500 से 4000 कटिंग या टुकड़े प्रति हेक्टेयर लगते हैI कटिंग या टुकड़ो की लम्बाई एक मीटर से डेढ़ मीटर तथा 8 से 10 गांठो वाले टुकड़े रखते है तथा गड्ढो या नालियो की मेड़ों पर 8 से 10 सेंटीमीटर तथा समतल भूमि पर 3 से 5 सेंटीमीटर गहराई पर गाड़ते हैI मादा अवं नर का अनुपात 10:1 का कटिंग में रखते हैI परवल की बुवाई साल में दो बार कि जाती है तथा जून के दुसरे पखवाड़े में और अगस्त के दुसरे पखवाड़े में । नदियों के किनारे परवल की रोपाई अक्टूबर से नवम्बर माह में की जाती है ।

आर्गनिक खाद
परवल की अच्छी पैदावार लेने के लिए भूमि में बुवाई या रोपाई से पहले गोबर की सड़ी हुई खाद २० से 30 टन 50 किलो और 50किलो अरंडी कि खली इन सब खादों को अच्छी तरह मिलाकर मिश्रण तैयार कर एक हेक्टेयर भूमि में समान मात्रा में बिखेर कर जुताई कर बुवाई करें ।
जब फसल 25 से 30 दिन की हो जाए तब 15 ली. गौमूत्र में 5 किलो नीम, 500 ग्राम तम्बाकू की पत्ती सड़ा कर २०० लीटर पानी में अच्छी तरह मिलाकर तर-बतर कर छिडकाव करें दूसरा -तीसरा छिडकाव हर 15 से 20 दिन के अंतर से करना चाहिए ।

सिंचाई
कटिंग या जड़ो की रोपाई के बाद नमी के अनुसार सिंचाई करनी चाहिए यदि आवश्यकता पड़े तो 8 से 10 दिन के अंदर पहली सिंचाई करनी चाहिएI लेकिन जाड़ो के दिनों में 15 से 20 दिन बाद तथा गर्मियों में 10 से 12 दिन बाद सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है इसके साथ ही वर्षा ऋतू में आवश्यकतानुसार सिंचाई करनी चाहिएI

खरपतवार नियंत्रण
ठण्ड समाप्त होने के समय पौधों कि जड़ों के समीप की भूमि में निराई-गुड़ाई करके मिटटी पोली कर देनी चाहिए चूँकि लताएँ ऊपर की ओर फैलती जाती है इसलिए खरपतवार अधिक प्रभावशाली नहीं होते है ।

कीट नियंत्रण
परवल कि फसल को बहुत से कीड़े मकोड़े सताते है किन्तु फल की मक्खी और और फली भ्रंग विशेष रूप से हानी पहुंचाते है ।
 
फल की मक्खी
मक्खी फलों में छिद्र करती है और उनमे अंडे देती है जिसके कारण फल सड़ जाते है कभी-कभी यह मक्खी फूलों को भी हानी पहुंचाती है ।

रोकथाम
२० लीटर गौमूत्र में 5 किलो नीम की पत्ती , 3 किलो धतुरा की पत्ती और 500 ग्राम तम्बाकू की पत्ती, 1 किलो गुड 25 ग्राम हींग डाल कर तीन दिनों के लिए छाया में रख दें तर-बतर कर खेत में छिडकाव करें
फली भ्रंग यह धूसर रंग का गुबरैला होता है जो पत्तियों में छेद करके उन्हें हानी पहुंचता है ।

रोकथाम
२० लीटर गौमूत्र में 5 किलो नीम की पत्ती , 3 किलो धतुरा की पत्ती और 500 ग्राम तम्बाकू की पत्ती, 1 किलो गुड 25 ग्राम हींग डाल कर तीन दिनों के लिए छाया में रख दें तर-बतर कर खेत में छिडकाव करें.

चूर्णी फफूंदी
यह रोग एक प्रकार कि फफूंदी के कारण लगता है जिसके कारण पत्तियों और तनों पर आते के समान फफूंद जम जाती है और पत्तियां पिली व मुरझाकर मर जाती है ।

रोकथाम
२० लीटर गौमूत्र में 5 किलो नीम की पत्ती , 3 किलो धतुरा की पत्ती और 500 ग्राम तम्बाकू की पत्ती, 1 किलो गुड 25 ग्राम हींग डाल कर तीन दिनों के लिए छाया में रख दें तर-बतर कर खेत में छिडकाव करें.

कटाई /तुड़ाई
परवल की अधिक पैदावार के लिए इसकी बेलों की छटाई करनी पड़ती है अब हमारे सामने यह प्रश्न खड़ा है बेलों कि छटाई कब की जाए ? इसकी छटाई करने का उपयुक्त समय पहले साल की फसल लेकर नवम्बर -दिसंबर में २०-३० से.मी.कि बेल छोड़कर सारी बेल काट देनी चाहिए क्योंकि इस समय पौधा सुषुप्त अवस्था में रहता है तने के पास ३० से.मी.स्थान छोड़कर फावड़े से पुरे खेत की गुड़ाई कर लेनी चाहिए इस बेलोंका फुटाव कम हो जाता है जिनसे लताएं निकलती है और उनमे मार्च में फल लगने शुरू हो जाते है ।

उपज
परवल कि उपज इसकी प्रजातियों के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है लेकिन इसकी औसत उपज 240 क्विंटल /हे.है ।

Monday, November 11, 2019

गेहू बुवाई की जानकारी


 
खेत की तैयारी

गेहूं की बुवाई अधिकतर धान के बाद की जाती है। अतः गेहूं की बुवाई में बहुधा देर हो जाती है। हमे पहले से यह निश्चित कर लेना होगा कि खरीफ में धान की कौन सी प्रजाति का चयन करें और रबी में उसके बाद गेहूं की कौन सी प्रजाति बोये। गेहूं की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए धान की समय से रोपाई आवश्यक है जिससे गेहूं के लिए अक्टूबर माह में खाली हो जायें। दूसरी बात ध्यान देने योग्य यह है कि धान में पडलिंग लेवा के कारण भूमि कठोर हो जाती है। भारी भूमि से पहले मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई के बाद डिस्क हैरो से दो बार जुताई करके मिट्टी को भुरभुरी बनाकर ही गेहूं की बुवाई करना उचित होगा। डिस्क हैरो के प्रयोग से धान के ठूंठ छोटे छोटे टुकड़ों मे कट जाते है। इन्हे शीध्र सड़ाने हेतु 15-20 किग्रा० नत्रजन (यूरिया के रूप में) प्रति हेक्टर खेत को तैयार करते समय पहली जुताई पर अवश्य दे देना चाहियें। ट्रैक्टर चालित रोटावेटर द्वारा एक ही जुताई में खेत पूर्ण रूप से तैयार हो जाता है।

बुवाई का समय

उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्रों में सिंचित दशा में गेहूं बोने का उपयुक्त समय नवम्बर का प्रथम पखवाड़ा है| लेकिन उत्तरी-पूर्वी भागों में मध्य नवम्बर तक गेहूं बोया जा सकता है| देर से बोने के लिए उत्तर-पश्चिमी मैदानों में 25 दिसम्बर के बाद तथा उत्तर-पूर्वी मैदानों में 15 दिसम्बर के बाद गेहूं की बुवाई करने से उपज में भारी हानि होती है| इसी प्रकार बारानी क्षेत्रों में अक्टूबर के अन्तिम सप्ताह से नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक बुवाई करना उत्तम रहता है| यदि भूमि की ऊपरी सतह में संरक्षित नमी प्रचुर मात्रा में हो तो गेहूं की बुवाई 15 नवम्बर तक कर सकते हैं|
 
बीज दर एवं बीज शोधन

लाइन में बुआई करने पर सामान्य दशा में 100 किग्रा० तथा मोटा दाना 125 किग्रा० प्रति है, तथा छिटकवॉ बुआई की दशा में सामान्य दाना 125 किग्रा० मोटा-दाना 150 किग्रा० प्रति हे0 की दर से प्रयोग करना चाहिए। बुआई से पहले जमाव प्रतिशत अवश्य देख ले। राजकीय अनुसंधान केन्द्रों पर यह सुविधा निःशुल्क उपलबध है। यदि बीज अंकुरण क्षमता कम हो तो उसी के अनुसार बीज दर बढ़ा ले तथा यदि बीज प्रमाणित न हो तो उसका शोधन अवश्य करें। बीजों का कार्बाक्सिन, एजेटौवैक्टर व पी.एस.वी. से उपचारित कर बोआई करें। सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों में रेज्ड वेड विधि से बुआई करने पर सामान्य दशा में 75 किग्रा० तथा मोटा दाना 100 किग्रा० प्रति हे0 की दर से प्रयोग करे।

पंक्तियों की दूरी

सामान्य दशा में 18 सेमी० से 20 सेमी० एवं गहराई 5 सेमी० ।

विलम्ब से बुआई की दशा में

15 सेमी० से 18 सेमी० तथा गहराई 4 सेमी० ।

विधि

बुआई हल के पीछे कूंड़ों में या फर्टीसीडड्रिल द्वारा भूमि की उचित नमी पर करें। पलेवा करके ही बोना श्रेयकर होता है। यह ध्यान रहे कि कल्ले निकलने के बाद प्रति वर्गमीटर 400 से 500 बालीयुक्त पौधे अवश्य हों अन्यथा इसका उपज पर कुप्रभाव पड़ेगा। विलम्ब से बचने के लिए पन्तनगर जीरोट्रिल बीज व खाद ड्रिल से बुआई करें। ट्रैक्टर चालित रोटो टिल ड्रिल द्वारा बुआई अधिक लाभदायक है। बुन्देलखण्ड (मार व कावर मृदा) में बिना जुताई के बुआई कर दिया जाय ताकि जमाव सही हो।
 
बोआई की विधियाँ : 
आमतौर  पर गेहूँ की बोआई चार बिधियो  से (छिटककर, कूड़ में चोगे या सीड ड्रिल से तथा डिबलिंगसे की जाती है  । गेहूं बोआई हेतु स्थान विशेष की परिस्थिति अनुसार विधियाँ प्रयोग में लाई जा सकती हैः

छिटकवाँ विधि :
इस विधि में बीज को हाथ से समान रूप से खेत में छिटक दिया जाता है और पाटा अथवा देशी हल चलाकर बीज को मिट्टी से ढक दिया जाता है। इस विधि से गेहूँ उन स्थानो पर बोया जाता है, जहाँ अधिक वर्षा होने या मिट्टी भारी दोमट होने से नमी अपेक्षाकृत अधिक समय तक बनी रहती है । इस विधि से बोये गये गेहूँ का अंकुरण ठीक से नही हो पाता, पौध  अव्यवस्थित ढंग से उगते है,  बीज अधिक मात्रा में लगता है और पौध  यत्र्-तत्र् उगने के कारण निराई-गुड़ाई  में असुविधा होती है परन्तु अति सरल विधि होने के कारण कृषक इसे अधिक अपनाते है ।

हल के पीछे कूड़ में बोआई:
गेहूँ बोने की यह सबसे अधिक प्रचलित विधि है । हल के पीछे कूँड़ में बीज गिराकर दो विधियों से बुआई की जाती है -

(हल के पीछे हाथ से बोआई (केरा विधि):
इसका प्रयोग उन स्थानों पर किया जाता है जहाँ बुआई अधिक रकबे में की जाती  है तथा खेत में पर्याप्त नमी  रहती हो  । इस विधि मे देशी हल के पीछे बनी कूड़ो  में जब एक व्यक्ति खाद और  बीज मिलाकर हाथ से बोता चलता है तो  इस विधि को  केरा विधि कहते है । हल के घूमकर दूसरी बार आने पर पहले  बने कूँड़ कुछ स्वंय ही ढंक जाते है । सम्पूर्ण खेत बो  जाने के बाद पाटा चलाते है, जिससे बीज भी ढंक जाता है और  खेत भी चोरस हो  जाता है ।

() देशी हल के पीछे नाई बाँधकर बोआई (पोरा विधि):
इस विधि का प्रयोग असिंचित क्षेत्रों या नमी की कमी वाले क्षेत्रों में किया जाता है। इसमें नाई, बास या चैंगा हल के पीछे बंधा रहता है। एक ही आदमी हल चलाता है तथा दूसरा बीज डालने का कार्य करता है। इसमें उचित दूरी पर देशी हल द्वारा 5 - 8 सेमी. गहरे कूड़ में बीज पड़ता है । इस विधि मे बीज समान गहराई पर पड़ते है जिससे उनका समुचित अंकुरण होता है। कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए देशी हल के स्थान पर कल्टीवेटर का प्रयोग कर सकते हैं क्योंकि कल्टीवेटर से एक बार में तीन कूड़ बनते है।
सीड ड्रिल द्वारा बोआई:
यह पोरा विधि का एक सुधरा रूप है। विस्तृत क्षेत्र में बोआई करने के लिये यह आसान तथा सस्ता ढंग है । इसमे बोआई बैल चलित या ट्रेक्टर चलित बीज वपित्र द्वारा की जाती है। इस मशीन में पौध अन्तरण   व बीज दर का समायोजन  इच्छानुसार किया जा सकता है। इस विधि से बीज भी कम लगता है और बोआई निश्चित दूरी तथा गहराई पर सम रूप से हो पाती है जिससे अंकुरण अच्छा होता है । इस विधि से  बोने में समय कम लगता है ।

डिबलर द्वारा बोआई:
इस विधि में प्रत्येक बीज क¨ मिट्टी में छेदकर निर्दिष्ट स्थान पर मनचाही गहराई पर बोते है । इसमें एक लकड़ी का फ्रेम को खेत में रखकर दबाया जाता है तो खूटियो से भूमि मे छेद हो जाते हैं जिनमें 1-2 बीज प्रति छेद की दर से डालते हैं। इस विधि से बीज की मात्रा काफी कम (25-30 किग्रा. प्रति हेक्टर) लगती है परन्तु समय व श्रम अधिक लगने के कारण उत्पादन लागत बढ़ जाती है।

फर्ब विधि:
इस विधि में सिंचाई जल बचाने के उद्देश्य से ऊँची उठी हुई क्यारियाँ तथा नालियाँ बनाई जाती है । क्यारियो की चोड़ाई इतनी रखी जाती है कि उस पर 2-3 कूड़े आसानी से बुआई की जा सके तथा नालियाँ सिंचाई के लिए प्रयोग में ली जाती है । इस प्रकार लगभग आधे सिंचाई जल की बचत हो जाती है । इस विधि में सामान्य प्रचलित विधि की तुलना में उपज अधिक प्राप्त होती है । इसमें ट्रैक्टर चालित यंत्र् से बुवाई की जाती है । यह यंत्र क्यारियाँ बनाने, नाली बनाने तथा क्यारी पर कूंड़ो  में एक साथ बुवाई करने का कार्य करता है ।

शून्य कर्षण सीड ड्रिल विधि:
धान की कटाई के उपरांत किसानों को रबी की फसल गेहूं आदि के लिए खेत तैयार करने पड़ते हैं। गेहूं के लिए किसानों को अमूमन 5-7 जुताइयां करनी पड़ती हैं। ज्यादा जुताइयों की वजह से किसान समय पर गेहूं की ब¨आई नहीं कर पाते, जिसका सीधा असर गेहूं के उत्पादन पर पड़ता है। इसके अलावा इसमें लागत भी अधिक आती है। ऐसे में किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। शून्य कर्षण से किसानों का समय तो बचता ही है, साथ ही लागत भी कम आती है, जिससे किसानों का  लाभ काफी बढ़ जाता है। इस विधि के माध्यम से खेत की जुताई और बिजाई दोनों ही काम एक साथ हो जाते हैं। इससे बीज भी कम लगता है और पैदावार करीब 15 प्रतिशत बढ़ जाती है। खेत की तैयारी में लगने वाले श्रम व सिंचाई के रूप में भी करीब 15 प्रतिशत बचत होती है। इसके अलावा खरपतवार प्रक¨प भी कम होता है, जिससे खरपतवारनाशकों का खर्च भी कम हो जाता है। समय से बुआई होने से पैदावार भी अच्छी होती है।

उन्नत किस्में
गेहूं उत्पादक किसान बन्धुओं को अपने क्षेत्र की प्रचलित और अधिकतम उपज देने वाली के साथ-साथ विकार रोधी किस्म का चयन करना चाहिए| ताकि इस फसल से अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सके कुछ प्रचलित और उन्नत किस्में इस प्रकार है, जैसे-

सिंचित अवस्था में समय से बुवाई- एच डी- 2967, एच डी- 4713, एच डी- 2851, एच डी- 2894, एच डी- 2687, डी बी डब्ल्यू- 17, पी बी डब्ल्यू- 550, पी बी डब्ल्यू- 502, डब्ल्यू एच- 542, डब्ल्यू- एच- 896 और यू पी- 2338 आदि प्रमुख है, इनका बुवाई का उपयुक्त समय 10 नवम्बर से 25 नवम्बर माना जाता है|

सिंचित अवस्था में देरी से बुवाई- एच डी- 2985, डब्ल्यू आर- 544, राज- 3765, पी बी डब्ल्यू- 373, डी बी डब्ल्यू- 16, डब्ल्यू एच- 1021, पी बी डब्ल्यू- 590 और यू पी- 2425 आदि प्रमुख है, इनका बुवाई का उपयुक्त समय 25 नवम्बर से 25 दिसम्बर माना जाता है|

असिंचित अवस्था में समय से बुवाई- एच डी- 2888, पी बी डब्ल्यू- 396, पी बी डब्ल्यू- 299, डब्ल्यू एच- 533, पी बी डब्ल्यू- 175 और कुन्दन आदि प्रमुख है|

लवणीय मृदाओं के लिए- के आर एल- 1, 4 व 19 प्रमुख है|

पोषक तत्व प्रबंधन

गेहूं उगाने वाले ज्यादातर क्षेत्रों में नाइट्रोजन की कमी पाई जाती है तथा फास्फोरस और पोटाश की कमी भी क्षेत्र विशेष में पाई जाती है| पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में गंधक की कमी भी पाई गई है| इसी प्रकार सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे जस्ता, मैंगनीज तथा बोरॉन की कमी गेहूं उगाये जाने वाले क्षेत्रों में देखी गई है| इन सभी तत्वों की भूमि में मृदा परीक्षण को आधार मानकर आवश्यकतानुसार प्रयोग करना चाहिए| लेकिन ज्यादातर किसान विभिन्न कारणों से मृदा परीक्षण नहीं करवा पाते हैं| ऐसी स्थिति में गेहूं के लिए संस्तुत दर इस प्रकार है, जैसे-

समय से सिंचित दशा-
में लगभग 125 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस तथा 40 से 60 किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है|

विलम्ब से बुवाई-
की अवस्था में तथा कम पानी की उपलब्धता वाले क्षेत्रों में समय से बुवाई की अवस्था में लगभग 20 से 40 किलोग्राम पोटाश की अधिक आवश्यकता होती है|

बारानी क्षेत्रों-
में समय से बुवाई करने पर 40 से 50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 20 से 30 किलोग्राम फास्फोरस तथा 25 किलोग्राम पोटाश की आवश्यकता होती है|असिंचित दशा में उर्वरकों को कूड़ों में बीजों से 2 से 3 सेंटीमीटर गहरा डालना चाहिए तथा बालियां आने से पहले यदि पानी बरस जाए तो 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन का छिड़काव करना चाहिए|

सिंचाई प्रबंधन

बुवाई के पश्चात फसल की क्रान्तिको अवस्थाओं पर सिंचाई करने से 6 सिंचाई पर्याप्त होती है| प्रथम सिंचाई शीर्ष जड़ जमते समय जब फसल 20 से 25 दिन की हो जाये तब करनी चाहिये| दूसरी सिंचाई जब कल्ले बनने लगे तथा फसल 45 से 50 दिन की हो जाये, तीसरी सिंचाई गाँठ बनते समय बुवाई के 65 से 70 दिन बाद, चौथी सिंचाई बालियाँ निकलते समय बुवाई के 85 से 90 दिन बाद, पाँचवी सिंचाई 100 से 110 दिन बाद जब फसल दूधिया अवस्था में हो तथा अंतिम सिंचाई दाना पकते समय करनी चाहिये, जब फसल 115 से 120 दिन की हो जाये|
यदि सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता कम हो तथा चार सिंचाई ही दे सकते हो तो शीर्ष जड़ बनते समय, गाँठ बनते समय, बालियां निकलते समय और दाना पकते समय करनी चाहिये| सिंचाई फुव्वारा विधि से करनी चाहिये| इसमें क्यारी सिंचाई की अपेक्षा कम पानी की आवश्यकता होती है| गेहूं की खेती में सिंचाई व्यवस्था की पूरी जानकारी यहाँ पढ़ें.

खरपतवार नियंत्रण

गेंहू की फसल के साथ अनेको खरपतवार जिनमें गोयला, चील, प्याजी, मोरवा, गुल्ली डन्डा व जंगली जई इत्यादि उगते है और पोषक तत्व, नमी व स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा कर फसल उत्पादन को काफी कम कर देते है| अधिक पैदावार प्राप्त करने के लिए उचित खरपतवार नियंत्रण उचित समय पर करना बहुत ही आवश्यक है| फसल के बुवाई के एक या दो दिन पश्चात तक पेन्डीमैथालीन खरपतवारनाशी की 2.50 लीटर मात्रा 500 पानी में घोल बनाकर समान रूप से छिड़काव कर देना चाहिये|
यदि खेत में गुल्ली डंडा व जंगली जई का प्रकोप अधिक हो तो आइसोप्रोटूरोन या मैटाक्सिंरान खरपतवारनाशी की 1 किलोग्राम मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव कर देना चाहिये| इसके उपरान्त फसल जब 30 से 35 दिन की हो जाये तो 2, 4-डी की 750 ग्राम मात्रा को 600 से 700 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव कर देना चाहिये|

कटाई एवं मॅडाई

जब पौधे पीले पड़ जाये तथा बालियां सूख जाये तो फसल की कटाई कर लेनी चाहिये| जब दानों में 15 से 20 प्रतिशत नमी हो तो कटाई का उचित समय होता है| कटाई के पश्चात् फसल को 3 से 4 दिन सूखाना चाहिये तथा मंडाई करके अनाज में जब 8 से 10 प्रतिशत नमी रह जाये तो भंडारण कर देना चाहिये|

पैदावार

गेहूं की फसल से उपज किस्म के चयन, खाद और उर्वरक के उचित प्रयोग और फसल की देखभाल पर निर्भर करती है| लेकिन सामान्यतः उपरोक्त वैज्ञानिक विधि से खेती करने पर 40 से 70 कुन्तल प्रति हैक्टर तक अनाज की उपज प्राप्त की जा सकती है|

गेहूं की खेती से अधिक पैदावार के लिए आवश्यक बिंदु
1. गेहूं की खेती के लिए शुद्ध एवं प्रमाणित बीज की बुआई बीज शोधन के बाद की जाए|
2. प्रजाति का चयन क्षेत्रीय अनुकूलता एवं समय विशेष के अनुसार किया जाए|
3. गेहूं की खेती हेतु दो वर्ष के बाद बीज अवश्य बदल दीजिए|
4. संतुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर सही समय पर उचित विधि से किया जाए|
5. क्रान्तिक अवस्थाओं (ताजमूल अवस्था एवं पुष्पावस्था) पर सिंचाई समय से उचित विधि एवं मात्रा में की जानी चाहिए|
6. गेहूं की खेती में कीड़े एवं बीमारीयों से बचाव हेतु विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए|
7. गेहूं की खेती में कीट और रोगों का प्रकोप होने पर उसका नियंत्रण समय से किया जाना चाहिए|
8. गेहूं की खेती के जीरोटिलेज एवं रेज्ड वेड विधि का प्रयोग किया जाए|
9. गेहूं की खेती हेतु खेत की तैयारी के लिए रोटवेटर हैरो का प्रयोग किया जाना चाहिए|
10. गेहूं की खेती में अधिक से अधिक जीवांश खादों का प्रयोग किया जाना चाहिए|
11. गेहूं की खेती के लिए यथा सम्भव आधी खादों की मात्रा जीवांश खादों से पूरी की जानी चाहिए|
12. किसी भी प्रकार की खाद का अंधाधुंध प्रयोग न करें उनकी संतुलित मात्रा फसल के लिए अच्छी रहती है|
13. गेहूं की खेती हेतु जिंक और गंधक की कमी वाले खेतों में बुवाई से पहले इनकी संतुलित मात्रा अवश्य डालें|

मशरूम उत्पादन...गांव में खेती, शहर में कमाई


मशरूम उत्पादन...गांव में खेती, शहर में कमाई

लोगों के खाने की थाली में मशरूम ने एक खास जगह बना ली है। छोटे से गांव की रसोई से लेकर फाइव स्टार होटल के मेन्यू तक में मशरूम की पहुंच बन गई है। लेकिन जिस अनुपात में मशरूम की मांग है, उस अनुपात में देश में इसका उत्पादन नहीं हो पा रहा है। ऐसे में मशरूम उत्पादन कर आप अपने स्वरोजगार को बढ़ाने के साथ-साथ बेहतर कमाई भी कर सकते हैं।

🌱क्या है मशरूम
मशरूम में फॉलिक एसिड और खनिज लवण पाए जाते हैं, जो मानव शरीर के ब्लड में अतिआवश्यक रेड सेल्स बनाने का काम करते हैं। आमतौर पर खाने में सब्जी के रूप में इसका इस्तेमाल किया जाता है। पहले सिर्फ चुनिंदा देशों में ही इसका सेवन किया जाता था, लेकिन अब इसकी पहुंच विश्व के अधिकांश भागों के साथ-साथ भारत के ग्रामीण इलाकों तक हो गई है।

जगह और मौसम का खास महत्व
सामान्य तौर पर मशरूम उत्पादन के लिए 20 से 40 डिग्री तापमान होना आवश्यक है। इसके अलावा वातावरण में नमी का होना भी जरूरी है। नमी के बगैर मशरूम का ठीक तरह से विकास नहीं हो पाता।

🌱कैसे करें उत्पादन
आप अपनी सुविधानुसार मशरूम उत्पादन के लिए जगह का चुनाव कर सकते हैं। मशरूम उत्पादन के लिए बेहतर तरीका है कि किसी नमी वाले भाग में इसका उत्पादन किया जाए या फिर अपने जमीन के कुछ भाग पर मशरूम उत्पादन के अनुकूल मशरूम घर तैयार कर वहां पर खेती करें। मशरूम उत्पादन के लिए घर में गेहूं की भूसी या धान की पुआल का ढेर लगा कर उसमें पानी डाल नमी पैदा कर, उसमें कम्पोस्ट और मशरूम का बीज डाल कर आप मशरूम का उत्पादन कर सकते हैं। ऑयस्टर मशरूम के उत्पादन के लिए 80 फीसदी नमी और तापमान 20 से 30 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए। इसके उत्पादन के लिए सितम्बर-अक्तूबर का महीना बेहतर माना जाता है। टेम्परेंट मशरूम के लिए 70 से 90 फीसदी नमी और 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान का होना जरूरी है। इसके उत्पादन के लिए अक्तूबर से फरवरी का समय अनुकूल होता है। वॉल वैरियल्ला मशरूम का उत्पादन अप्रैल से अक्तूबर माह में किया जा सकता है। वॉल वैरियल्ला के उत्पादन के लिए तापमान 30 से 40 डिग्री सेल्सियस व नमी 80 से ज्यादा होनी चाहिए।

🌱जरूरी सामान
मशरूम उत्पादन के लिए मशरूम घर, पॉलीथिन के थैले, कम्पोस्ट बनाने के लिए जरूरी सामग्री, मशरूम स्पान तथा केसिंग मिट्टी प्रमुख हैं। दो-तीन महीने में फसल तैयार मशरूम का सफल उत्पादन दो से तीन महीने में आसानी से हो जाता है। मशरूम की बुआई से लेकर कटाई तक में लगभग दो-तीन महीने का समय लग जाता है।

🌱कैसे करें व्यापार
मशरूम उत्पादन करने के बाद उसे सही मार्केट तक पहुंचाने पर ही आपको सही मायनों में मुनाफा मिल सकता है। वैसे तो मशरूम की काफी मांग है, लेकिन इसके लिए मंडी में आपको एक बार पहचान तो बनानी ही पड़ेगी, ताकि भविष्य में आपका मशरूम आसानी से बाजार तक पहुंच जाए।

🌱संभावना
देश में आम लोगों तक पहुंच बढ़ाने से मशरूम की डिमांड काफी बढ़ गई है। इसे देखते हुए मशरूम के
काफी अधिक उत्पादन की जरूरत है। हालांकि मशरूम का उत्पादन काफी तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन अभी भी जरूरत के मुकाबले इसका उत्पादन काफी कम हो रहा है। ऐसे में अगर इसका उत्पादन शुरू करते हैं तो यह निश्चित रूप से फायदे का सौदा साबित होगा।

🌱प्रशिक्षण
कृषि विश्वविद्यालय और राज्य सरकार के बागवानी विभाग समय-समय पर कुछ सप्ताह का प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाते रहते हैं, जिसमें शामिल होकर आप आसानी से मशरूम उत्पादन की बारीकियों को सीख सकते हैं। यह प्रशिक्षण सरकारी संस्थानों में मुफ्त दिया जाता है। प्रशिक्षण के लिए आप नजदीकी कृषि महाविद्यालय में पता कर सकते हैं।

🌱पूंजी
मशरूम की खेती को छोटी जगह और कम लागत में आसानी से शुरू किया जा सकता है और कम लागत में ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है। तीन-चार कमरों के मशरूम घर में मशरूम की खेती करने के लिए मशरूम बीज, कम्पोस्ट व अन्य जरूरी सामान के लिए कम से कम 15 से 20 हजार रुपए की जरूरत होगी।

🌱प्रशिक्षण देने वाले संस्थान
पादप रोग संभाग, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा, नई दिल्ली राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, पूसा (समस्तीपुर), बिहार इलाहाबाद एग्रीकल्चर इंस्टीटय़ूट, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय खुम्ब अनुसंधान केन्द्र, सोलन, हिमाचल प्रदेश जीबी पंत यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी, पंत नगर, उत्तराखंड
आणंद एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, आणंद, गुजरात
सबौर कृषि विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार