Saturday, February 15, 2020

हाईब्रिड बैंगन की खेती



बैंगन एक पौष्टिक सब्जी है। इसमें विटामिन ए एवं बी के अलावा कैल्शियम, फ़ॉस्फ़रस तथा लोहे जैसे खनीज भी होते है। यदि इसकी उपयुक्त उत्तम क़िस्में तथा संकर किंस्में बोई जाए और उन्नत वैज्ञानिक सस्य क्रियाएं अपनाई जाएं तो इसकी फ़सल से काफ़ी अधिक उपज मिल सकती है।

बैंगन की क़िस्में
 
पूसा हाईब्रिड -5
पौधे की अच्छी बढ़वार तथा शाखाएँ ऊपर को उठी हुई होती है, फल मध्यम लम्बाई के, चमकदार तथा गहरे बैंगनी रंग के होते है। बुआई से पहली तुड़ाई में 85- 90 दिन लगते है। उत्तरी
तथा मध्य भारत के मैदानी क्षेत्रों तथा समुद्र तट को छोड़ कर कर्नाटक, केरल, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु क्षेत्र के लिये उपयुक्त है। उपज 450 से 650 क्विंटल प्रति हेक्टेअर होती है।

पूसा हाईब्रिड-6
पौधे मध्यम सीधे खडे रहने वाले होते हैं। फल गोल, चमकदार, आकर्षक बैंगनी रंग के होते है, प्रत्येक फल का वजन लगभग 200 ग्राम होता है। बुआई से पहली गुड़ाई में 85-90 दिन लगते है। उपज 400-600 क्विंटल प्रति हेक्टेअर होती है।

पूसा हाईब्रिड 9
पौधे सीधे खडे रहने वाले होते हैं। फल अण्डाकार गोल, चमकदार बैंगनी रंग के होते हैं। प्रत्येक फल का वजन लगभग 300 ग्राम होता है । बुआई के पहली तुडाई में 85-90 दिन लगते है । गुजरात तथा महाराष्ट्र क्षेत्र के लिए उपयुक्त है । इसकी औसत उपज 500 क्विंटल प्रति हेक्टेअर है।

पूसा क्रान्ति
इस क़िस्म के फल गहरे बैंगनी रंग के मध्यम लम्बाई के होते है यह क़िस्म बसन्त तथा सर्दी दोनों मौसमों के लिये उपयुक्त पाई गई है । इसकी औसत उपज 300 किंवटल प्रति हेक्टेअर है।
पूसा भैरव इसके फल गहरे बैंगनी रंग के थोड़े मोटे व कुछ लम्बे होते है । यह क़िस्म फल-गलन रोग प्रतिरोधी है।

पूसा पर्पल कलस्टर
पौधें सीधे खडे रहने वाले होते है। पत्तियाँ रगंदार होती है। फल 9 से 12 सें०मी० लम्बे तथा गुच्छे में लगते है। यह क़िस्म पहाडी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। यह क़िस्म फल तथा तना छेदक,जीवाणु तथा उकटा रोग के लिए कुछ रोधक है।
पूसा अनुपम पौधे मध्यम तथा सीधे होते हैं। फल पतले, बैगनी रंग के होते हैं। फल गुच्छे में लगते है। यह क़िस्म उकठा रोग प्रतिरोधी है।
 
पूसा बिन्दु
इस क़िस्म के बैंगन छोटे,गोल और चमकदार होते हैं । जिनका रंग गहरा बैंगनी डंठल चित्तीदार होता है । यह क़िस्म 90 दिन में तैयार हो जाती है । औसत उपज 300 क्विंटल प्रति हेक्टेअर है । यह क़िस्म उत्तरी मैदानी क्षेत्रों के लिये उपयुक्त है।

पूसा उत्तम 31
इसके फल अण्डाकार गोल चमकदार, गहरे बैंगनी रंग और मझौले आकार के होते हैं । बुआई से पहली तुड़ाई में 85-90 दिन लगते हैं। औसत उपज 425 क्विंटल प्रति हेक्टेअर है । यह क़िस्म उत्तरी मैदानी तथा पश्चिमी क्षेत्रों के लिये उपयुक्त है ।

पूसा उपकार
इसके फल गोल चमकदार, गहरे बैंगनी रंग और मझौले आकार के होते हैं। फल का औसत वजन 200 ग्राम होता है । पहली तुडाई फसल बोने के 85 दिन बाद की जा सकती है । यह क़िस्म उत्तरी मैदानी क्षेत्र के लिए उपयुक्त है । इसकी औसत उपज 400 क्विंटल प्रति हेक्टेअर है ।

पूसा अंकुर
यह एक अगेती क़िस्म है जो बुआई की तारीख से 75 दिनों में फल तोडने के लायक हो जाते हैं। फल छोटे, गहरे बैंगनी , अण्डाकार गोल चमकीले होते हैं । इसकी औसत उपज 350 क्विंटल प्रति हेक्टेअर है ।

नर्सरी
इसके बीज उठी हुई क्यारियों में लगभग 1 सें०मी० की गहराई पर 5 से 7 सें०मी० के फासलों पर बनी कतारों में बोने चाहिएँ। एक हेक्टेअर क्षेत्र में रोपाई के लिये लगभग 400 ग्राम बीज
पर्याप्त है। संकर क़िस्मों के बीज की मात्रा 250 ग्राम पर्याप्त रहती है। भारी आकार वाली क़िस्मों के लिये पंक्ति से पंक्ति की दूरी 70 सें०मी० तथा पौधों से पौधों की दूरी 60 सें०मी० रखी जाती है। छोटे आकार वाली क़िस्मों के लिये पंक्ति से पंक्ति तथा पौधे से पौधे की दूरी का फासला 60 x 60 या 60x 45 सें०मी० रखा जा सकता है।
 
बुआई
 
शरद फसल
इस फसल के बीज मई-जून में बोए जाते हैं और पौध रोपाई जून के अन्त से जुलाई के मध्य तक की जा सकती है।

बसंत-ग्रीष्म
इस फसल के बीज नवम्बर के मध्य में बोये जाते हैं और पौध जनवरी के अन्त में तब रोपी जाती है, जब पाले का भय समाप्त हो जाता है।

वषा ऋतु
इस फसल के बीज फरवरी- मार्च के महीनों में बोए जाते हैं और पौध की रोपाई मार्च-अप्रैल के महीनों में की जाती है।

खाद और उर्वरक
खाद व उर्वरक की मात्रा मिट्टी की जांच के आधार पर की गई सिफारिश के अनुसार रखनी चाहिए। जहां मिट्टी की जांच न की हो खेत तैयार करते समय 25-30 टन गोबर की सड़ी खाद मिट्टी में अच्छी तरह मिला देनी चाहिए। इसके साथ-साथ 200 किलो ग्राम यूरिया, 370 किलो ग्राम सुपर फ़ॉस्फ़ेट और 100 किलो ग्राम पोटेशियम सल्फ़ेट का इस्तेमाल करना चाहिए। यूरिया की एक तिहाई मात्रा और सुपरफ़ॉस्फ़ेट तथा पौटेशियम
सल्फ़ेट की पूरी मात्रा खेत में आखिरी बार तैयारी करते समय इस्तेमाल की जानी चाहिए। बची यूरिया की मात्रा को दो बराबर
खुराकों में देना चाहिए। पहली खुराक पौधे की रोपाई के 3 सप्ताह बाद दी जाती है जबकि दूसरी मात्रा पहली मात्रा देने के चार सप्ताह बाद दी जानी चाहिए।

पौध संरक्षण
रोपाई के 2 सप्ताह बाद मोनोक्रोटोफास 0.04 % घोल, 15 मि०ली० प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें। प्ररोह बेधक से प्रभावित फलों और प्ररोहों को जहां से तना मुरझाया हो उसके आधे इंच नीचे से काट दें और उन्हें ज़मीन में गाढ दें। खेतों को बेधकों से मुक्त रखने के लिए यह काम प्रति दिन करते रहे। मोनोक्रोटोफोस के छिड़काव के 3 सप्ताह बाद डेसिस 0.005 प्रतिशत घोल या 1 मि०ली० प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें। डेसिस के छिड़काव के 3 सप्ताह बाद ब्लिटाकस प्रति कैप्टान-2 ग्राम प्रति लीटर पानी और मिथाइल पेराथियोन -2 मि०ली० प्रति लीटर पानी का छिड़काव करे। अगर जैसिड की समस्या हो तो मिथाइल पेराथियोन का छिड़काव फिर से करें लेकिन मिथाइल पेराथियोन छिड़कने से पहले फलों को तोड़ लें। प्ररोह बेधक से प्रभावित फलों और प्ररोहों को जहां से तना मुरझाया हो उसके आधे इंच नीचे से काट दें और उन्हें जमीन में गाड़ दें। खेतों को बेधकों से मुक्त रखने के लिए यह काम प्रतिदिन करते रहें।मोनोक्रोटोफोस के छिडकाव के 3 सप्ताह बाद डेसिस 0.005 प्रतिशत घोल या 1 मि. ली. प्रति लीटर पानी का छिडकाव करें। डेसिस के छिडकाव के 3 सप्ताह बाद ब्लिटाकस प्रति कैप्टान - 2 ग्राम प्रति लीटर पानी और मिथाइल परथिओन-2 मि. ली. प्रति लीटर पानी का छिड़काव करे। यदि जैसिड की समस्या हो तो मिथाइल पेराथियोन का छिडकाव फिर से करें लेकिन मिथाइल पेराथियोन छिडकने से पहले फलों को तोड लें।

कटाई
बैंगन के फल जब मुलायम हों और उनमें ज्यादा बीज न बनें हों तभी उन्हें तोड़ लेने चाहिए। ज्यादा बड़े होने पर इनमें बीज पड़ जाते हैं और तब ये उतने स्वादिष्ट नहीं रह जाते।

Friday, February 14, 2020

परवल (सब्जी) की उन्नत फसल



परवल सब्जी की फसलो में आता है, इसकी खेती बहुवर्षीय की जाती हैI इसे ज्यादातर पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल में उगाया जाता हैI लेकिन असम, ओडिसा, मध्य प्रदेश , महाराष्ट्रा एवं गुजरात के कुछ भागो में इसकी खेती की जाती हैI इसके साथ ही बिहार की दियार भूमि तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के रैनफेड क्षेत्र में अत्याधिक खेती की जाती हैI इसमे विटामिन ए एवं सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता हैI

जलवायु
परवल को गर्म और आर्द्र जल वायु कि आवश्यकता होती है औसत वार्षिक वर्षा 100-150 से.मी,तक होती है ।

भूमि का चुनाव
परवल की खेती गर्म एवं तर जलवायु वाले क्षेत्रो में अच्छी तरह से की जाती हैI इसको ठन्डे क्षेत्रो में न के बराबर उगाया जाता है किन्तु उचित जल निकास वाली जीवांशयुक्त रेतीली या दोमट भूमि इसके लिए सर्वोत्तम मानी गई है चूँकि इसकी लताएँ पानी के रुकाव को सहन नही कर पाती है अत: उचे स्थानों पर जहाँ जल निकास कि उचित व्यवस्था हो वहीँ पर इसकी खेती करनी चाहिए ।

भूमि की तैयारी
यदि इसे उची जमीन में लगाना है तो 3 जुताइयाँ देशी हल से करके उसके बाद पाटा लगा देना चाहिए 1.5 मी.पौधे से पौधे की दुरी रखकर 30*30*30 से.मी.गहरा गड्डा खोद लेना चाहिए अत: मिटटी में 5 किलो ग्राम गोबर कि खाद मिलाकर भर देना चाहिए ।

प्रजातियां
परवल में दो प्रकार की प्रजातियां पाई जाती है, प्रथम क्षेत्रीय प्रजातियां जैसे की बिहार शरीफ, डंडाली, गुल्ली, कल्यानी, निरिया, संतोखिया एवं सोपारी सफेदा आदि है द्धितीय उन्नतशील प्रजातियां जैसे की एफ. पी.1, एफ. पी.3, एफ. पी.4, एच. पी.1, एच. पी.3, एच. पी.4 एवं एच. पी.5 है इसके साथ ही छोटा हिली, फैजाबाद परवल 1 , 3 , 4 तथा चेस्क सिलेक्शन 1 एवं 2 इसके साथ ही चेस्क हाइब्रिड 1 एवं 2 तथा स्वर्ण अलौकिक , स्वर्ण रेखा तथा संकोलिया आदि है.
 
नवीनतम किस्में
नरेंद्र परवल 260
नरेंद्र परवल 307
नरेंद्र परवल601
नरेंद्र परवल 604

बुवाई /पौध रोपण
परवल का उत्पादन जड़ो जिसे की सकर कहते है या कटिंग के द्वारा रोपाई की जाती हैI कटिंग द्वारा प्रोपोगेसन या रोपाई आसानी से जल्दी की जा सकती है इसके द्वारा फसल जल्दी तैयार हो जाती हैIपरवल में कटिंग या जड़ो की संख्या रोपाई के अनुसार रोपाई की दूरी पर जैसे एक मीटर गुणे डेढ़ मीटर दूरी पर 4500 से 5000 तथा एक मीटर गुणे दो मीटर की दूरी पर 3500 से 4000 कटिंग या टुकड़े प्रति हेक्टेयर लगते हैI कटिंग या टुकड़ो की लम्बाई एक मीटर से डेढ़ मीटर तथा 8 से 10 गांठो वाले टुकड़े रखते है तथा गड्ढो या नालियो की मेड़ों पर 8 से 10 सेंटीमीटर तथा समतल भूमि पर 3 से 5 सेंटीमीटर गहराई पर गाड़ते हैI मादा अवं नर का अनुपात 10:1 का कटिंग में रखते हैI परवल की बुवाई साल में दो बार कि जाती है तथा जून के दुसरे पखवाड़े में और अगस्त के दुसरे पखवाड़े में । नदियों के किनारे परवल की रोपाई अक्टूबर से नवम्बर माह में की जाती है ।

आर्गनिक खाद
परवल की अच्छी पैदावार लेने के लिए भूमि में बुवाई या रोपाई से पहले गोबर की सड़ी हुई खाद २० से 30 टन 50 किलो और 50किलो अरंडी कि खली इन सब खादों को अच्छी तरह मिलाकर मिश्रण तैयार कर एक हेक्टेयर भूमि में समान मात्रा में बिखेर कर जुताई कर बुवाई करें ।
जब फसल 25 से 30 दिन की हो जाए तब 15 ली. गौमूत्र में 5 किलो नीम, 500 ग्राम तम्बाकू की पत्ती सड़ा कर २०० लीटर पानी में अच्छी तरह मिलाकर तर-बतर कर छिडकाव करें दूसरा -तीसरा छिडकाव हर 15 से 20 दिन के अंतर से करना चाहिए ।

सिंचाई
कटिंग या जड़ो की रोपाई के बाद नमी के अनुसार सिंचाई करनी चाहिए यदि आवश्यकता पड़े तो 8 से 10 दिन के अंदर पहली सिंचाई करनी चाहिएI लेकिन जाड़ो के दिनों में 15 से 20 दिन बाद तथा गर्मियों में 10 से 12 दिन बाद सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है इसके साथ ही वर्षा ऋतू में आवश्यकतानुसार सिंचाई करनी चाहिएI

खरपतवार नियंत्रण
ठण्ड समाप्त होने के समय पौधों कि जड़ों के समीप की भूमि में निराई-गुड़ाई करके मिटटी पोली कर देनी चाहिए चूँकि लताएँ ऊपर की ओर फैलती जाती है इसलिए खरपतवार अधिक प्रभावशाली नहीं होते है ।

कीट नियंत्रण
परवल कि फसल को बहुत से कीड़े मकोड़े सताते है किन्तु फल की मक्खी और और फली भ्रंग विशेष रूप से हानी पहुंचाते है ।
 
फल की मक्खी
मक्खी फलों में छिद्र करती है और उनमे अंडे देती है जिसके कारण फल सड़ जाते है कभी-कभी यह मक्खी फूलों को भी हानी पहुंचाती है ।

रोकथाम
२० लीटर गौमूत्र में 5 किलो नीम की पत्ती , 3 किलो धतुरा की पत्ती और 500 ग्राम तम्बाकू की पत्ती, 1 किलो गुड 25 ग्राम हींग डाल कर तीन दिनों के लिए छाया में रख दें तर-बतर कर खेत में छिडकाव करें
फली भ्रंग यह धूसर रंग का गुबरैला होता है जो पत्तियों में छेद करके उन्हें हानी पहुंचता है ।

रोकथाम
२० लीटर गौमूत्र में 5 किलो नीम की पत्ती , 3 किलो धतुरा की पत्ती और 500 ग्राम तम्बाकू की पत्ती, 1 किलो गुड 25 ग्राम हींग डाल कर तीन दिनों के लिए छाया में रख दें तर-बतर कर खेत में छिडकाव करें.

चूर्णी फफूंदी
यह रोग एक प्रकार कि फफूंदी के कारण लगता है जिसके कारण पत्तियों और तनों पर आते के समान फफूंद जम जाती है और पत्तियां पिली व मुरझाकर मर जाती है ।

रोकथाम
२० लीटर गौमूत्र में 5 किलो नीम की पत्ती , 3 किलो धतुरा की पत्ती और 500 ग्राम तम्बाकू की पत्ती, 1 किलो गुड 25 ग्राम हींग डाल कर तीन दिनों के लिए छाया में रख दें तर-बतर कर खेत में छिडकाव करें.

कटाई /तुड़ाई
परवल की अधिक पैदावार के लिए इसकी बेलों की छटाई करनी पड़ती है अब हमारे सामने यह प्रश्न खड़ा है बेलों कि छटाई कब की जाए ? इसकी छटाई करने का उपयुक्त समय पहले साल की फसल लेकर नवम्बर -दिसंबर में २०-३० से.मी.कि बेल छोड़कर सारी बेल काट देनी चाहिए क्योंकि इस समय पौधा सुषुप्त अवस्था में रहता है तने के पास ३० से.मी.स्थान छोड़कर फावड़े से पुरे खेत की गुड़ाई कर लेनी चाहिए इस बेलोंका फुटाव कम हो जाता है जिनसे लताएं निकलती है और उनमे मार्च में फल लगने शुरू हो जाते है ।

उपज
परवल कि उपज इसकी प्रजातियों के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है लेकिन इसकी औसत उपज 240 क्विंटल /हे.है ।