Sunday, September 9, 2018

नवजात बछडे की देखभाल

 

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बछड़े की देखभाल शुरुआती दौर में अच्छी तरह से होना काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज की बछड़ी कल की होने वाली गाय या भैंस है। जन्म से ही उसकी सही देखभाल रखने से भविष्य में वह अच्छी गाय या भैंस बन सकती है।

बछड़े की देखभाल शुरुआती दौर में -

1.    जन्म के ठीक बाद बछड़े के नाक और मुंह से कफ अथवा श्लेष्मा इत्यादि को साफ करें।
2.    आमतौर पर गाय बछड़े को जन्म देते ही उसे जीभ से चाटने लगती है। इससे बछड़े के शरीर को सूखने में आसानी होती है और श्वसन तथा रक्त संचार सुचारू होता है। यदि गाय बछड़े को न चाटे तो ठंडी जलवायु की स्थिति में बछड़े के शरीर को सूखे कपड़े या टाट से पोंछकर सुखाएं। हाथ से छाती को दबाकर और छोड़कर कृत्रिम श्वसन प्रदान करें ।
3.    नाभ नाल में शरीर से 2-5 सेमी की दूरी पर गांठ बांध देनी चाहिए और बांधे हुए स्थान से 1 सेमी नीचे से काटकर टिंक्चर आयोडीन या बोरिक एसिड अथवा कोई भी अन्य एंटिबायोटिक लगाना चाहिए।
4.    बाड़े के गीले बिछौने को हटाकर स्थान को बिलकुल साफ और सूखा रखना चाहिए।
5.    बछड़े के वजन का ब्योरा रखना चाहिए।
6.    गाय के थन और स्तनाग्र को क्लोरीन के घोल द्वारा अच्छी तरह साफकर सुखाएं।
7.    बछड़े को मां का पहला दूध अर्थात् खीस का पान करने दें।
8.    बछड़ा एक घंटे में खड़े होकर दूध पीने की कोशिश करने लगता है। यदि ऐसा न हो तो कमजोर बछड़े की मदद करें ।

बछड़े का भोजन:-

1.    नवजात बछड़े को दिया जाने वाला सबसे पहला और सबसे जरूरी आहार है मां का पहला दूध अर्थात् खीस। खीस का निर्माण मां के द्वारा बछड़े के जन्म से 3 से 7 दिन बाद तक किया जाता है और यह बछड़े के लिए पोषण और तरल पदार्थ का प्राथमिक स्रोत होता है। यह बछड़े को आवश्यक प्रतिरोधक क्षमता भी उपलब्ध कराता है जो उसे संक्रामक रोगों और पोषण संबंधी कमियों का सामना करने की क्षमता देता है। यदि खीस उपलब्ध हो तो जन्म के बाद पहले तीन दिनों तक नवजात को खीस पिलाते रहना चाहिए।  
2.    जन्म के बाद खीस के अतिरिक्त बछड़े को 3 से 4 सप्ताह तक मां के दूध की आवश्यकता होती है। उसके बाद बछड़ा वनस्पति से प्राप्त मांड और शर्करा को पचाने में सक्षम होता है। आगे भी बछड़े को दूध पिलाना पोषण की दृष्टि से अच्छा है लेकिन यह अनाज खिलाने की तुलना में महंगा होता है। बछड़े को दिए जाने वाले किसी भी द्रव आहार का तापमान लगभग कमरे के तापमान अथवा शरीर के तापमान के बराबर होना चाहिए।  
3.    बछड़े को खिलाने के लिए इस्तेमाल होने वाले बर्तनों को अच्छी तरह साफ रखें। इन्हें और खिलाने में इस्तेमाल होने वाली अन्य वस्तुओं को साफ और सूखे स्थान पर रखें।  
 
पानी का महत्व:-
ध्यान रखें हर वक्त साफ और ताजा पानी उपलब्ध रहे। बछड़े को जरूरत से ज्यादा पानी एक ही बार में पीने से रोकने के लिए पानी को अलग-अलग बर्तनों में और अलग-अलग स्थानों में रखें। 
 
खिलाने की व्यवस्थाः-
बछड़े को खिलाने की व्यवस्था इस बात पर निर्भर करती है कि उसे किस प्रकार का भोज्य पदार्थ दिया जा रहा है। इसके लिए आमतौर पर निम्नलिखित व्यवस्था अपनाई जाती है -  
बछड़े को पूरी तरह दूध पर पालना।
1.    मक्खन निकाला हुआ दूध देना।  
2.    दूध की बजाए अन्य द्रव पदार्थ जैसे ताजा छाछ, दही का मीठा पानी, दलिया इत्यादि देना।
3.    दूध के विकल्प देना।  
4.    काफ स्टार्टर देना।
5.    पोषक गाय का दूध पिलाना।
6.    पूरी तरह दूध पर पालना।
 
50 किलो औसत शारीरिक वजन के साथ तीन महीने की उम्र तक के नवजात बछड़े की पोषण आवश्यकता इस प्रकार है-

1.सूखा पदार्थ (डीएम) 1.43 किलो
2.पचने योग्य कुल पोषक पदार्थ (टीडीएन) 1.60 किलो
3.कच्चे प्रोटीन 3.15 किलो

यह ध्यान देने योग्य है कि टीडीएन की आवश्यकता डीएम से अधिक होती है क्योंकि भोजन में वसा का उच्च अनुपात होना चाहिए। 15 दिनों बाद बछड़ा घास टूंगना शुरू कर देता है जिसकी मात्रा लगभग आधा किलो प्रतिदिन होती है, जो 3 महीने बाद बढ़कर 5 किलो हो जाती है।
इस दौरान हरे चारे के स्थान पर 1-2 किलो अच्छे प्रकार का सूखा चारा (पुआल) बछड़े का आहार हो सकता है जो 15 दिन की उम्र में आधा किलो से लेकर 3 महीने की उम्र में डेढ़ किलो तक दिया जा सकता है।  
3 सप्ताह के बाद यदि संपूर्ण दूध की उपलब्धता कम हो तो बछड़े को मक्खन निकाला हुआ दूध, छाछ अथवा अन्य दुग्धीय तरल पदार्थ दिया जा सकता है।
 
बछड़े को दिया जाने वाला मिश्रित आहार-
बछड़े का मिश्रित आहार एक सांद्र पूरक आहार है जो ऐसे बछड़े को दिया जाता है जिसे दूध अथवा अन्य तरल पदार्थों पर पाला जा रहा हो। बछड़े का मिश्रित आहार मुख्य रूप से मक्के और जई जैसे अनाजों से बना होता है।
जौ, गेहूं और ज्वार जैसे अनाजों का इस्तेमाल भी इस मिश्रण में किया जा सकता है। बछड़े के मिश्रित आहार में 10 प्रतिशत तक गुड़ का इस्तेमाल किया जा सकता है। एक आदर्श मिश्रित आहार में 80 प्रतिशत टीडीएन और 22 प्रतिशत सीपी होता है।
अतः इन सभी बातों का ध्यान रखकर एवं वैज्ञानिक विधि अपनाकर पशुपालक अपने पशुओं को स्वस्थ एवं डेयरी व्यवसाय को फायदेमंद बना सकते हैं।

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