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Monday, April 20, 2020

बटन मशरूम के लिए कम्पोस्ट खाद तैयार करना



साधारण विधि से कम्पोस्ट बनाना।
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साधारण विधि से कम्पोस्ट बनाने में 20 से 25 दिन का समय लगता है 100 सेंमी लम्बी, 50 सेंमी चौडी तथा 15 सेंमी ऊची 15 पेटियों के लिए इस विधि से कम्पेस्ट बनाने के लिए सामग्री:

1. धान या गेहूं का 10-12 सेंमी लम्बाई में कटा हुआ भूसा - 250 किलोग्राम।

2. धान या गेहूं की भूसी - 20-25 किलोग्राम।

3. अमोनियम सल्फेट या कैल्शियम अमोनियम नाईट्रेट - 4 किलोग्राम।

4. यूरिया - 3 किलोग्राम

5. जिप्सम - 20 किलोग्राम

6. मैलाथियॉन - 10 मिलि लिटर

जिस स्थान पर कम्पोस्ट तैयार करनी हो वहां पर गेहूं के भूसे की 8 से 10 इंच मोटी तह
बिछाकर उसे पानी से अच्छी तरह से भिगो दें। पानी में भीगोने के लगभग 16 से 18 घंटे बाद उसमें जिप्सम तथा कीटनाशक को छोडकर बाकी सभी सामग्री अच्छी तरह से मिला दें।

फिर उस सारी सामग्री का एक मीटर चौडा, एक मीटर ऊचा तथा समायोजित लम्बाई का ढेर बना दें। इस ढेर को प्रत्येक 3-4 दिन के अन्तराल पर हवा लगाने के लिए फर्श पर खोलकर बिछा दें तथा आधा घंटे बाद दोबारा उसी आकार का ढेर बना दें।

अगर भूसा सूखा लगे तो उस पर
हल्का पानी छिडककर गीला कर लें। तीसरी पलटाई के दौरान कुल जिप्सम की आधी मात्रा मिला दें। शेष बचे जिप्सम को चौथी पलटाई के दौरान भूसे में मिला दें।

पॉचवी पलटाई के दौरान 10 मिलि लिटर मैलाथियान को 5 लीटर पानी में घोलकर भूसे पर छिडकाव करें तथा अच्छी तरह से मिलाकर फिर से ढेर बना दें। अगले 3 से 4 दिनों में कम्पोस्ट खाद पेटियों में भरने योग्य हो जायेगा।

निर्जीविकरण विधि से कम्पोस्ट बनाने की तकनीक।
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मशरूम का उत्पादन अच्छी कम्पोस्ट खाद पर निर्भर करता है अत: कम्पोस्ट बनाते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए ।

निर्जीविकरण विधि से कम्पोस्ट खाद दो चरणों में लगभग 14-15 दिनों में तैयार होती है

पहला चरण:
इस विधि से कम्पोस्ट बनाने का पहला चरण साधारण विधि के समान ही है परन्तू इसमें
पलटाई हर दूसरे दिन यानि लगभग 48 घंटे के बाद की जाती है तीसरी पलटाई में जिप्सम मिला दिया जाता है । 8 दिन बाद कम्पोस्ट दूसरे चरण के लिए तैयार हो जाती है।

दूसरा चरण:
दूसरे चरण में कम्पोस्ट को सीधे ही या फिर पेटीयों में भरकर भाप द्वारा पहले से 45 डिग्री ताप पर गर्म किये हुए निर्जीविकरण कक्ष में रखते हैं। इसके बाद इस कक्ष की सभी खिडकीयॉं दरवाजें बंद कर दें तथा अगले 2-3 दिनों तक भाप से अन्दर का तापमान 57-58 डिग्री पर बनाएं रखें ।
तीसरे दिन 2 घंटे के लिए इस कक्ष का ताप 60 से 62 डिग्री पर स्थिर करें तत्पश्चात कक्ष में ताजी हवा का प्रवाह बनाऐं तथा तापमान को धीरे-धीरे गिरकर 45 डिग्री तक आने दें ।

अगले 3-4 दिनों तक कम्पोस्ट को सामान्य ताप तक ठंडा होने दें । सामान्य ताप पर आने पर कम्पोस्ट भरनें के लिए तैयार हो जाती है । तैयार कम्पोस्ट गहरे भूरे रंग की तथा गंध रहीत होती है तथा इसका PH लगभग उदासीन होता है ।

Monday, November 11, 2019

इस तकनीक से सड़ रहे प्याज को मिलेगा सही दाम



इस तकनीक से सड़ रहे प्याज को मिलेगा सही दाम 

लखनऊ। अगर आपकी रसोई और घर में प्याज सड़ रहा है तो आप पंजाब के एक किसान के इजाद किए तरीके को अपना सकते हैं। जब प्याज सस्ता हो और आपके घर में सड़ने लगा हो, उस समय किसानों के सड़ रहे प्याज का सही भाव मिल सकें, राजविंदर सिंह राना ने एक ऐसी ही तकनीक की खोज की है।

राजविंदर पाल सिंह राना पंजाब के लुधियाना जिले से उत्तर दिशा में मदियानी गाँव के रहने वाले हैं। ये गाँव कनेक्शन संवाददाता को फोन पर बताते हैं, “जब बाजार में प्याज का भाव बहुत कम हो और प्याज सड़ रहा हो, उस समय किसान प्याज को सीधे न बेचकर उसको एग ट्रे में उगाकर प्याज बेच सकते हैं। हरे प्याज का भाव 40-60 रुपए प्रति किलो तक मिल जाता है। इससे किसानों को अच्छा फायदा होगा।” राजविंदर एग ट्रे में प्याज उगाना नासा की तकनीक मानते हैं।

 हर कोई अपनी किचन से में हरा प्याज उगा सकता है।
शोध कार्यों में दिलचस्पी रखने वाल राजविंदर ने घर में लगातार सड़ रहे प्याज पर शोध करना शुरू किया। ये बताते हैं, “हमने अपनी किचन में 10 खाली एग ट्रे में सात आठ किलो सड़ रहे प्याज को भरकर रख दिया। सप्ताह में दो बार इसमें पानी का छिड़काव किया, जिससे इसमें हरी पत्ती वाला प्याज निकलना शुरू हो गया। एक किलो प्याज में जितनें गुण पाए जाते हैं उतने ही गुण एक हरे पत्ती वाले प्याज में होते हैं।”

हर कोई एग ट्रे तकनीक का प्रयोग अपने किचन में सड़ रहे प्याज के लिए उपयोग कर सकता है। किसानों का सड़ रहे प्याज को कोई नहीं खरीदेगा लेकिन अगर वो किसान एग ट्रे में हरे प्याज को तैयार करके बेचते हैं तो उन्हें प्याज का भाव अच्छा मिल जाएगा।
एग ट्रे में हरा प्याज उगाना कोई एक दिन का काम नहीं बल्कि ये सालों साल चलने वाली प्रक्रिया है। इस तकनीक का उपयोग रसोई से लेकर बाजार तक किया जा सकता है। खासकर इस तकनीक का फायदा उन लोगों के लिए ज्यादा है जिनके पास मिट्टी का कोई साधन नहीं है।