Wednesday, September 26, 2018

जैविक कीटनाशक👇👇


रासायनिक कीटनाशकों के कृषि, पर्यावरण एवं स्वास्थ्य विरोधी परिणामों को देखते हुए अब ऐसे वैकल्पिक कीटनाशकों के अनुसंधान पर जोर दिया जाने लगा है, जो

🌱मनुष्य एवं मानवेतर जीवों के लिए अल्प या शून्य हानिकारक तथा सुरक्षित हों

🌱जिसके जैवकीय विघटन होने से मिट्टी, जल एवं वायु दूषित न हों।

🌱जिससे प्रतिकूल कीड़े ही मारे जा सकें, अनुकूल कीड़े नहीं ।

🌱जो लक्षित कीटों की प्रतिरोधी क्षमता विकसित न होने दे ।

🌱जो रासायनिक कीटनाशकों की अपेक्षा सस्ता, सहज प्राप्य एवं पार्श्व प्रभाव रहित हो ।

🌱जिनका प्रभाव भले ही रासायनिक कीटनाशकों की तरह न हो, धीमी ही हो और कीटों द्वारा कुछ नुकसान भी उठाना पड़े, किन्तु खाद्यान्न, मिट्टी, जल, वायु एवं जीवन में विषाक्तता का प्रवेश न हो। इन अपेक्षाओं की पूर्ति सिर्फ वनस्पति जगत से ही हो सकती है और विकल्प की तलाश में 'नीम' एक सर्वोत्तम कीटनाशक रूप में सामने आया है।

भारत सहित विश्व के विभिन्न देशों, मुख्यत: जर्मनी, अमेरिका एवं जापान में विगत ३०-४० वर्षों के दौरान नीम वृक्ष के कीटनाशक तत्वों की खोज के लिए बड़े पैमाने पर सघन अनुसंधान हुए हैं और पाया गया है कि इस वृक्ष के फल, बीज, गिरी तथा डाल, तना एवं जड़ की छाल में कीट-विरोधी कई गुण मौजूद हैं। यह एक ही साथ कीट-भरण प्रतिरोधक (antifeedant), कीटनाशी (Insecticidal), कीट-वृद्धि विघटक (Insect-growth disrupting), गोल-कृमि प्रतिरोधी (Nematicidal), कवक/फफुंदनाशी (Fungicidal), जीवाणुनाशी (Bactericidal), कीट/वायरस/बैक्टेरिया विकर्षक (Insect/Virus/Bacteria-repellent) और कीटों के विरुद्ध बन्ध्यीकरण (Sterilizing) गुण वाला है। वैज्ञानिकों का अभिमत है कि प्रकृति-प्रदत्त नीम वृक्ष कीटनाशक (एवं उर्वरक रूप में भी) बेमिसाल है और इसे व्यापक पैमाने पर उपयोग में लाया जा सकता है।

Wednesday, September 12, 2018

Photos


गाय व भैंस मे मद से जुडी कुछ बातें।



मद की प्रारम्भिक अवस्था:

(1) पशु की भूख में कमी आना |

(2) दूध उत्पादन में कमी|

(3) पशु का रम्भावना (बोलना)व बेचैन रहना |

(4) योनि से पतले श्लैष्मिक पदार्थ का निकलना |

(5) दूसरे पशुओं से अलग रहना|

(6) पशु का पूंछ उठाना|

(7) योनि द्वार (भग) का सूजना तथा बार-बार पेशाब करना |

(8) शरीर के तापमान में मामूली सी वृद्धि|

 

मद की मध्यव्स्था:

गर्मीं की यह अवस्था बहुत महवपूर्ण होती है क्योंकि कृत्रिम ग्रंह धान के लिए यही अवस्था सबसे उपयुक्त मानी जाती है |

इसकी अवधि लगभग 10 घटे तक रहती है |

इस अवस्था में पशु काफी उत्तेजित दीखता है तथा वह अन्य पशुओं में रूचि दिखता है |

 

यह अवस्था निम्नलिखित लक्षणों से पहचानी जा सकती है |

(1) योनि द्वार (भग) से निकलने वाले श्लैष्मिक पदार्थ का गढा होना जिससे वह बिना टूटे नीचे तक लटकता हुआ दिखाई देता है |

(2) पशु ज़ोर-ज़ोर से रम्भावना (बोलने) लगता हैं |

(3) भग (योनि द्वार)की सूजन तथा श्लैष्मिक झिल्ली की लाली में वृद्धि हो जाती है |

(4) शरीर का तापमान बढ़ जाता हैं |

(5) दूध में कमी तथा पीठ पर टेढ़ापन दिखाई देता है |

(6) पशु अपने ऊपर दूसरे पशु को चढने देता हैं अथवा वह खुद दूसरे पशुओं पे चढने लगता |

 

मद की अन्तिम अवस्था:

(1) पशु की भूख लगभग सामान्य हो जाती है |

(2) दूध में कमी भी समाप्त हो जाती है |

(3) पशु का रम्भाना कम हो जाता हैं |

(4) भग की सूजन व श्लैष्मिक झिल्ली की लाली में कमी आ जाती है |

(5) श्लेष्मा का निकलना या तो बन्द या फिर बहुत कम हो जाता है तथा यह बहुत गाढ़ा व कुछ अपारदर्शी होने लगता है |

Sunday, September 9, 2018

जयपुर शिवानी माहेश्वरी



कोई कार्य क्षेत्र ऐसा नहीं जहाँ सफलता की गुंजाईश ना हो बस आवश्यकता होती है तो लगन मेहनत और ख़ुद पर विश्वास की। हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है लेकिन बदलते आधुनिक परिवेश ने खेती और किसान दोनों की परिभाषा बदल दी है। हमारी आज की कहानी भी आधुनिक भारत की ऐसी दो बेटियों की है जो धरती पुत्री अर्थात किसान बनकर खेती को एक व्यवसाय के रूप में विकसित कर रही हैं।

जयपुर की शिवानी माहेश्वरी और दिल्ली की वामिका बेहती ने अच्छी ख़ासी नौकरी छोड़ कर हरियाणा में फूलों की खेती का व्यवसाय करने की तरफ रुख़ किया। और आज एक सफल किसान के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं।
आपको बता दें कि भारत की फ्लोरिकल्चर इंडस्ट्री की सालाना कुल ग्रोथ 30 फीसदी की रफ्तार से भी तेज हो रही है।वहीं इंडस्ट्री बॉडी एसोचैम की मानें तो आने वाले 2015 तक इस इंडस्ट्री का मार्केट कैप 10,000 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगी। ऐसे स्थिति में इस क्षेत्र में कारोबार की बड़ी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में हरियाणा में वामिका और शिवानी की पहल ने किसानों की मदद की है साथ ही उन्हें उन्नत खेती की तकनीकों और व्यावसायिक खेती से अवगत कराया है ।
जयपुर की रहने वाली 23 साल की शिवानी एमबीए ग्रैजुएट हैं तो दिल्ली की 25 साल की वामिका चार्ट्रड अकाउंटेंट हैं।
साल 2015 में शिवानी को फूलों का व्यवसाय करने का ख्याल उस समय आया जब उन्हें रोहतक-दिल्ली जानेे के दौरान एक बार पॉलीहाउस फार्मिंग नेट देखने का अवसर प्राप्त हुआ। शिवानी वहाँ की कुछ तस्वीरें कैमरे में क़ैद कर लाई और फूलों के व्यवसाय के बारे में इंटरनेट पर रिसर्च करना शुरू किया। उसी समय उनकी मुलाकात वामिका से हुई और फिर दोनों ने मिलकर इस पर काम शुरू किया।
हरियाणा खास तौर पर अपने क्षेत्र के किसानों और उनकी खेती के लिये मशहूर है इसलिए दोनों के लिये व्यवसाय से जुड़ी सारी चीजें खुद-ब-खुद बेहतर होने लगी। वामिका की बहादुरगढ़ में एक फैक्ट्री और झझर जिले के तंडाहेरी गांव में खाली जमीन भी थी जिस पर दोनों ने मिलकर यूनिस्टार एग्रो नाम की एक फार्म शुरू कर दी जहाँ लिलियम, गेरबेरा, गुलाब, रजनीगंधा और ग्लेडियोलस की खेती की जाने लगी।
दोनों ने मिलकर अपने फूलों के व्यवसाय में अपनी पढ़ाई का भी पूरा प्रयोग करना शुरू किया जिसका फायदा इन्हें अपने व्यवसाय में मिल रहा है। साथ में ही वामिका को उनके बिजनेसमैन पति की उपयोगी सलाह भी मिलती है।
इन दोनों के उद्यम यूनिस्टार एग्रो को अब हरियाणा सरकार भी सहायता प्रदान कर रही है क्योंकि वामिका और शिवानी की पढ़ाई और तकनीकी जानकारी की वजह से ऑर्गेनिक खेती करने के लिये कई किसानों को सहायता मिल रही हैं।
आज उनका फूलों का व्यवसाय खूब फल-फूल रहा है। उनकी मेहनत और किसानों के फायदों को देखते हुए सरकार ने उन्हें पुरस्कार सब्सिडी और इनसेनटिव भी देना शुरू कर दिया। वामिका और शिवानी अब अपने व्यवसाय को और आगे बढ़ाना चाहती हैं और देश में ही नहीं बल्कि मौका मिला तो विदेशों तक अपने कारोबार को फैलाना चाहती हैं। साथ ही किसानों का आर्थिक स्तर भी सुधारना उनका लक्ष्य हैं।
वाक़ई यदि देश की युवा पीढ़ी इस तरह अपने ज्ञान का उपयोग करेगी तो वो दिन दूर नहीं जब भारत फिर से सोने की चिड़िया कहलाने लगेगा।

विभिन्न फसलों में लगने वाले प्रमुख रोग


1. खेरा रोग - धान
2. लाल सड़न रोग - गन्ने
3. करनाल बंट रोग - गेहूँ
4. श्वेत फफोला रोग - सरसों
5. पनामा सूखा रोग - केले
6. अर्गट रोग - बाजरा
7. उक्ठा रोग - चना
8. टिक्का रोग - मूंगफली
9. ब्लेक आर्म रोग - कपास
10. केंकर रोग - निम्बू
11. ईयर कोकल रोग - गेहूँ
12. कोयलिया रोग - आम
13. फाईलोडी रोग - तिल
14. टुंगरू रोग - धान
15. पीत शिरा रोग - भिंडी, पपीता, तम्बाकू
16. हेन व चिकन रोग - अंगूर
17. बक आई रोट रोग - टमाटर
18. ग्राशि शूट रोग - गन्ने
19. मोल्या रोग - गेहूँ और जौ
20. चूर्णल फफूंद रोग - मटर
21. हरित बाली रोग - बाजरा


पशु पालन


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पशुओं को स्वस्थ और दुधारू बनाये रखने के लिए पशुपालन से सम्बंधित कुछ जरुरी बातें और नियम हैं ,जिसे की  पशुपालकों को पालन करनी चाहिए . पशुओं को हमेशा साफसुथरे माहौल में रखना चाहिए. बीमार होने पर पशुओं को सेहतमंद पशुओं से तुरंत अलग कर देना चाहिए और उन का इलाज कराना चाहिए. इस के अलावा पशुपालकों को पशुपालन से सम्बंधितनिम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए. 
  • पशुओं को सेहतमंद रखने और बीमारी से बचाने के लिए उचित समय पर टीका लगवाना चाहिए.गायभैंसों को गलघोंटू, एंथ्रैक्स लंगड़ी, संक्रामक गर्भपात, खुरपकामुंहपका, पोकनी वगैरह बीमारियों से बचाना चाहिए. पशुओं को ऐसी बीमारियों से बचाव का एकमात्र उपाय टीकाकरण है.
  • दुधारू पशुओं को नियमित रूप से पशु डाक्टर को दिखाना चाहिए. बीमार पशुओं का इलाज जल्दी कराना चाहिए, ताकि पशु रोगमुक्त हो सके. साथ ही, बीमार पशु के बरतन व जंजीरें पानी में उबाल कर विराक्लीन -Viraclean से  जीवाणुरहित करने चाहिए. फर्श और दीवारों को भी विराक्लीन -Viraclean से साफ करना चाहिए. विराक्लीन -Viraclean का हमेशा पशुओं के बाड़ें में और बाड़ें के आस-पास छिड़काव करते रहना चाहिये , यह माहमारी होने और फैलने से बचाता है .
  • पशुओं को भीतरी व बाहरी परजीवियों के प्रकोप से भारी नुकसान होता है और उन का दूध उत्पादन घट जाता है. पशु कमजोर हो जाते हैं. भीतरी परजीवियों के प्रकोप से भैंस के बच्चों में 3 महीने की उम्र तक 33 फीसदी की मौत हो जाती है और जो बच्चे बचते हैं, उन का विकास बहुत धीमा होता है.
  • परजीवी के प्रकोप से बड़े पशुओं में भी कब्ज, एनीमिया, पेटदर्द व डायरिया वगैरह के लक्षण दिखाई देते हैं, इसलिए साल में 2 बार भीतरी परजीवियों के लिए कृमिनाशक दवा का प्रयोग करना चाहिए.
  • बाहरी परजीवियों जैसे किलनी, कुटकी व जूं से बचाने के लिए समयसमय पर पशुओं की सफाई की जानी चाहिए. पशुओं में इन का ज्यादा प्रकोप हो जाने पर निकट के पशु डाक्टर से तुरंत संपर्क करना चाहिए.
  • नए खरीदे गए पशुओं को लगभग एक महीने तक अलग रख कर उन का निरीक्षण करना चाहिए. इस अवधि में अगर पशु सेहतमंद दिखाई दें और उन्हें टीका न लगा हो, तो टीकाकरण अवश्य करा देना चाहिए.
  • पशुओं को साफसुथरे माहौल में रखा जाए,  पशुओं के आवास को हमेशा विराक्लीन -Viraclean से छिड़काव करें उन्हें साफ पानी और पौष्टिक आहार दिया जाए और नियमित रूप से टीकाकरण कराया जाए, तो वे हमेशा सेहतमंद बने रहते हैं और उन से पर्याप्त मात्रा में दूध मिलता रहता है.
 
दुधारू पशुओं में प्रजनन प्रबंध :
पशुपालक कोपशुपालन से सम्बंधित इस बात का खास खयाल रखना चाहिए कि उस का पशु समय से गर्भधारण करे. ब्याने के बाद 2-3 महीने के अंदर दोबारा गाभिन हो जाए व बच्चा देने का अंतर 12-13 महीने से ज्यादा न हो. यह तभी संभव है, जब गायभैंस को भरपूर संतुलित आहार मिले और उन की प्रबंधन व्यवस्था अच्छी हो. गायभैंस के ब्याने से 2 महीने पहले उस का दूध सुखा देना चाहिए. दूध सुखाने के लिए 15-20 दिन पहले से थनों से धीरेधीरे कम दूध निकालते हैं. इस प्रकार दूध सूख जाता है. अब इन 2 महीनों में पशु को पौष्टिक हरा चारा व दाना मिश्रण देना चाहिए. इस अवस्था में जितनी अच्छी देखरेख होगी, उतना ही ब्याने के
बाद अच्छा दूध उत्पादन लंबे समय तक प्राप्त होगा. एक दुधारू पशु की दूध न देने की अवधि जितनी कम होगी, पशुपालक के लिए उतना ही फायदेमंद होगा. इस के लिए जरूरी है कि ब्याने के 8-12 हफ्ते के अंदर गायभैंस को दोबारा गाभिन करा दिया जाए. यदि पशु इस अवधि में गरम न हो, तो उसे गरम होने की दवा देनी चाहिए.
पशुओं में गर्भाधान :
पशुओं में गर्भाधान आमतौर पर 2 विधियों द्वारा किया जाता है. पहली विधि, जिस में सांड़भैंसे द्वारा गर्भाधान कराया जाता है, जिसे प्राकृतिक गर्भाधान कहा जाता है. दूसरी विधि में सांड़भैंसे के वीर्य को कृत्रिम साधनों से मादा में प्रवेश कराते हैं. इसे कृत्रिम गर्भाधान कहते हैं.

प्राकृतिक गर्भाधान :
प्रजनन हेतु भैंसा या सांड़ राजकीय संस्थाओं से प्रमाणित नस्ल का होना चाहिए. अगर गांवों में किसी भैंसे या सांड़ से गर्भाधान कराना हो, तो कम से कम भैंसे या सांड़, जिस की मातादादीनानी अच्छी दुधारू गाय या भैंस व पितादादानाना उत्तम गुण के सिद्ध हो चुके हों, का रिकौर्ड पता होना चाहिए. अगर दादादादी, नाना का रिकौर्ड न पता हो, तो मातापिता का रिकौर्ड अवश्य मालूम होना चाहिए.
सांड़ की उम्र कम से कम 3 साल व भैंसे की उम्र 4 साल या 10 साल से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. एक सांड़ या भैंसे से दिन में एक बार एक मादा से अधिक गाभिन नहीं कराना चाहिए और उसे बीमार मादा के संपर्क से भी बचाना चाहिए.
कृत्रिम गर्भाधान :
इस विधि में मादा को नर से सीधे नहीं मिलाया जाता है, बल्कि कृत्रिम विधि से गाय को गाभिन करा दिया जाता है, क्योंकि गर्भाधान के लिए 1 या 2 शुक्राणु ही काफी होते हैं. लिहाजा, कृत्रिम विधि से निकाले गए वीर्य को पतला कर जरूरत के मुताबिक सैकड़ों मादाओं को गाभिन किया जा सकता है. यही नहीं, अत्यधिक दूध बढ़ाने की क्षमता रखने वाले सांड़ों के वीर्य से दुनिया के किसी भी हिस्से में मादाओं को गाभिन कर के उन की संततियों में दूध की मात्रा बढ़ाई जा सकती है. तरल नाइट्रोजन की मदद से वीर्य को -196 डिगरी सेंटीग्रेड तक ठंडा किया जा सकता है, जिसे कई सालों तक संभाल कर रखा जा सकता है. हमारे देश में जो दुग्ध उत्पादन में वृद्धि हुई है, उस में कृत्रिम गर्भाधान का खास योगदान है.
गर्भ परीक्षण : वीर्य सेचन के बाद जल्दी ही गर्भ परीक्षण आर्थिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है. गाय व भैंस की परीक्षा कुछ लक्षणों को देख कर ही की जाती हैं, जिस की सफलता कार्यकर्ता के प्रशिक्षण व अनुभवों पर आधारित होती है.लक्षणों पर आधारित गर्भ परीक्षा की परंपरागत विधियों में मादा को देख कर गर्भ का अनुमान लगाना, पेट थपथपाना, प्रजनन अभिलेख, वीर्य सेचन के बाद मद में न आना आदि शामिल हैं.

कृत्रिम गर्भाधान से लाभ:
  • अच्छी नस्ल के सांड़भैंसे, जिन की तादाद कम हैं, इस विधि से उन से अधिक संख्या (प्राकृतिक गर्भाधान से 80-100 बच्चे और कृत्रिम गर्भाधान से 2000 बच्चे एक नर से प्राप्त किए जा सकते हैं) में संतति प्राप्त की जा सकती है.
  • उत्तम सांड़भैंसे से इकट्ठा किया हुआ वीर्य एक देश से दूसरे देश, एक स्थान से दूसरे स्थान व दुर्गम क्षेत्रों में भी आसानी से भेज कर नस्ल सुधार का काम किया जा सकता है.
  • नर या मादा के वीर्य या अंडाणु में कोई खराबी है, तो परीक्षण के बाद पता चल जाता है.
  • पशुपालकों को सांड़ या भैंसे के लिए दरदर भटकना नहीं पड़ता है, जिस से समय व पैसे की बचत होती है.
नवजात पशुओं की देखभाल व आहार : नवजात बच्चे भविष्य के पशुधन होते हैं. अगर शुरुआत से ही उन पर ध्यान दिया जाए, तो आगे चल कर उन से अच्छा उत्पादन ले सकते हैं. पैदा होने के बाद उचित देखरेख न होने से 3 महीने की उम्र होने तक 30-32 फीसदी बच्चों की मौत हो जाती है. बच्चे के जन्म लेने के आधे से एक घंटे के अंदर मां का पहला दूध (खीस) जरूर पिलाना चाहिए, जिस से उस के शरीर में किसी भी संक्रमण से लड़ने के लिए प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो जाए. खीस को जरूरत से ज्यादा नहीं पिलाना चाहिए, वरना दस्त होने का खतरा पैदा हो जाता है. दूध 4-4 घंटे के अंतर से 3 बार पिलाना चाहिए. 15-20 दिन के बाद बच्चों को सूखी घास, जितनी वे आराम से खा सके, खिलानी चाहिए. इस से उन के पेट का विकास तेजी से होगा. दाने की मात्रा हर हफ्ते 50 से 100 ग्राम तक बढ़ा कर देनी चाहिए.
अगर पशुपालक दूध का कारोबार कर रहे हों, तो 3 महीने के बाद भरपेट चारादाना देते रहें और अमीनो पॉवर – Amino Power नियमित रूप से दें अमीनो पॉवर -Amino Power ४६ तत्वों का सबसे शक्तिशाली और ४६ प्रोटीन्स ,विकमिन्स और मिनरल्स से भरपूर एक अनोखा टॉनिक है ,जोकी पशुओं के लिए रामबाण का काम करती है
पशुओं के बच्चे को डायरिया होने पर पशु डाक्टर को दिखाएं, वरना बच्चों की इस से बहुत जल्दी मौत हो जाती है. डायरिया की स्थिति में जब तक डॉक्टर को नहीं दिखा सकें तब तक बछड़े को निओक्सीविटा फोर्ट – Neoxyvita Forte और एलेक्ट्रल एनर्जी – Electral Energy नियमित रूप से दें ,यह काफी प्रभावकारी होगा.  डाक्टर की सलाह से कृमिनाशक दवा बच्चे को पिलानी चाहिए.

मटर की वैज्ञानिक खेती














 
मटर का प्रयोग हरी अवस्था में फलियों के रूप में सब्जी के लिए तथा सूखे दानों का प्रयोग दाल के लिए किया जाता हैं। मटर एक बहुत ही पोषक तत्वों वाली सब्जी हैं जिसमें पाचंशील प्रोटीन, कार्बोहाइडेट्स तथा विटामिन पर्याप्त मात्रा में पाया जाता हैं। इसके
अलावा इसमें खनिज पदार्थ भी पर्याप्त मात्रा में पाया जाता हैं। पतली छिलके वाली मटर की समूची फलियों और छिली हुई मटर के दानों को सुखाकर या डिब्बा बंद करके संरक्षित किया जाता हैं। जिसका प्रयोग बाद में सब्जी के रूप में किया जाता हैं। इनके अतिरिक्त मटर के हरे पौधों का प्रयोग जानवरों के हरे चारे व हरी खाद के लिए किया जाता हैं। मटर का पोषक मान निम्न तालिका 1 में प्रदर्षित हैं।
 
तालिका 1 : मटर का पोषकमान (प्रति 100 ग्राम खाद्य पदार्थ)

जल72.0 ग्रामविटामिन ‘ए‘139 आई. यू.
वसा0.1 ग्रामराइबोफलेविन0.01 मि.ग्रा.
ऊर्जा93 किलोकैलोरीथियामिन0.25 मि.ग्रा.
कार्बोहाइड्रेट15.8 ग्रामनिकोटिनिक अम्ल0.8 मि.ग्रा.
प्रोटीन7.2 ग्रामविटामिन ‘सी‘9 मि.ग्रा.
खनिज पदार्थ0.8 ग्राम




मटर की खेती हेतु आवश्यक जलवायु(Climate for Pea farming)
 
मटर की फसल के लिए नम और ठण्डी जलवायु की आवश्यकता होती हैं अतः हमारे देष में अधिकांश स्थानों पर मटर की फसल रबी की ऋतु में उगाई जाती हैं। उन सभी स्थानों पर जहाँ वार्षिक वर्षा 60 से 80 सेमी. तक होती है मटर की फसल सफलतापूर्वक उगाई  जाती है। मटर की वृद्धि काल में कम तापक्रम की आवश्यकता होती है परन्तु फसल पर पाले का अत्यंत हानिकारक प्रभाव पड़ता हैं। फलियां बनने की प्रारम्भिक अवस्था में उच्च तापक्रम एवं शुष्क जलवायु का भी हानिकारक प्रभाव पड़ता है। बीज के अंकुरण के लिए न्यनतम तापक्रम 5 डिग्री सेलसियस तथा उपयुक्त तापक्रम 22 डिग्री सेलसियस होता हैं।

भूमि

फलीदार फसल होने के कारण उन सभी कृषि योग्य भूमियों में जिसमें उपयुक्त मात्रा में नमी उपलब्ध हो सके मटर की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती हैं। मटियार दोमट तथा दोमट भूमि मटर की खेती के लिए अधिक उत्तम होती हैं। मटर के लिए ऐसी भूमि जिसका पी.एच.मान 6.0 और 7.5 के मध्य हो उपयुक्त होती हैं। अम्लीय तथा क्षारीय मृदा में फसल की अच्छी वृद्धि नही होती हैं। अच्छी फसल के लिए भूमि में जलनिकास का उत्तम प्रबंध होना अत्यंत आवश्यक होता है ताकि मृदा में वायु का आवागमन भली प्रकार सम्पन्न हो सकें।

मटर की उन्नत प्रजातियाँ (Pea varieties)

मध्यप्रदेश में उगायी जाने वाली प्रजातियाँ जैसे अर्किल, आजाद मटर- 3, पंत सब्जी मटर-3, पंत सब्जी, मटर-4, अरका अजीत इत्यादि विस्तृत रूप से ली जाती हैं।

मटर उत्पादन के लिए भूमि की तैयारी( Land preparation for Peas)

खरीफ की फसल से खेत खाली होते ही एक जुताई, गहरी की जाती है। इसके बाद 3-4 बार हैरों या देशी हल से खेत की जुताई की जाती हैं। बुवाई के समय भूमि में पर्याप्त नमी का होना आवश्यक है। नमी की कमी होने पर अन्तिम जुताई से पहले पलेवा कर देना चाहिए।

बीज दर एवं अंतरण( Seed rate )

बीज सदैव प्रमाणित एवं उपचारित बोना चाहिए। बीज को 0.25 प्रतिशत की दर से कैप्टान या थायराम से उपचारित किया जा सकता है। बीज दर बोने के समय व प्रयोग की जाने वाली जाति के अनुसार 80-120 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तथा मध्यम और पछेती फसल के लिऐ 80-100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बीज की बुबाई करते है। उचित समय पर बोई गई फसल के लिए पंक्ति की दूरी 30 से.मी. एवं पौधे से पौधे की दूरी 5 से.मी. रखते हैं।

बोने का समय एवं विधि( Sowing time and method for Peas)

मटर की बुवाई का उत्तम समय अक्टुबर की शुरुआत से नवम्बर के मध्य तक करना लाभदायक रहता है। अधिकतर बुबाई हल के द्वारा कूंडों में की जाती हैं। बुबाई के लिए सीड़ड्रिल मशीन का उपयोग किया जाता हैं। पौधों के बीच का अंतर 6-7 से.मी. रखते हैं। बीज को 4-5 से.मी. गहराई पर बोते हैं।

बीज उपचार(Seed treatment)

बुवाई से पहले बीज का उपचार फफूंद नाशक दवाओं, कैप्टान या थीराम के मिश्रण से करना चाहिए। प्रति कि.ग्रा. बीज में 3 ग्राम फफूंद नाशक का मिश्रण काफी हैं।

बीज निवेशन

खेत में बोने से पहले बीज का उपचार राइजोबियाम बैक्टीरिया से होना आवश्यक हैं क्योंकि अधिकांश क्षेत्रों में राइजोबियम बैक्टीरिया की मृदाओं में कमीं हैं। इस बैक्टीरिया के प्रयोग से नत्रजन की मात्रा लगभग 100 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर तक कम कर सकते हैं। मृदा में बैक्टीरिया के पहुँचाने की दो विधियाँ है:-
  1. अगर बैक्टीरिया कल्चर समय पर उपलब्ध न हो तो पुराने खेत में जिसमें 2-3 साल से लगातार मटर की खेती की जा रही हैं। और मृदा में बैक्टीरिया काफी है, से 1 टन मिट्टी लेकर एक हैक्टेयर खेत में छिड़क देनी चाहिए।
  2. बीज के साथ कल्चर को मिलाने के लिये 10 प्रतिशत का गुड़ का घोल (100 ग्राम 1 ली. पानी) 15 मिनट तक उबाल कर कमरे के तापक्रम पर ठण्डा कर लिया जाता हैं। इस घोल को बीज के उपर छिड़क कर बीज के साथ मिलाकर कल्चर इसमे मिला दिया जाता है। और बीज को छाया में सुखाते हैं। इस प्रकार इस बैक्टीरिया की एक पतली सतह प्रत्येक बीज पर जम जाती हैं। कल्चर मिलाया हुआ बीज कभी भी धूप में नही सुखाना चाहिए अन्यथा बैक्टीरिया नष्ट हो सकते है। बीज को अधिक समय तक भी कल्चर मिलाने के बाद नही रखना चाहिए। शीघ्र ही इस बीज की बुआई कर देनी चाहिए।

मटर के लिए खाद एवं उवर्रक(Fertilizers for Peas)

मटर की फसल दलहनी वर्ग  में आती है। अतः इसे नत्रजन की विशेष आवश्यकता नही होती हैं। प्रारम्भ में राइजोबियम बैक्टीरिया के क्रियाशील होने तक 20-30 कि. ग्रा. नत्रजन प्रति हैक्टेयर की आवश्यकता होती हैं। इसके अतिरिक्त 50-60 कि.ग्रा. फास्फोरस व 40-50 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर देना आवश्यक हैं। उर्वरक सदैव बीज की कतारों से 5 से.मी. की दूरी पर बीज सतह से 3-4 से.मी. की गहराई पर डालना चाहिए। फास्फेट उर्वरक उपज में वृद्धि के साथ गुणवत्ता में भी वृद्धि करता हैं। पोटाषिक उर्वरक भी उपज में वृद्धि तथा नत्रजन स्थिरीकरण में सहायता करते हैं। गोबर की खाद 20 टन प्रति हैक्टेयर की दर से भूमि की तैयारी के समय ही देना लाभदायक रहता हैं।

सिंचाई(Irrigation of Peas)

मटर की उन्नतशील जातियों में दो सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। शीतकालीन वर्षा हो जाने पर दूसरी सिंचाई की आवश्यकता नही पड़ती । पहली सिंचाई फूल निकलते समय बोने के 45 दिन बाद व दूसरी सिंचाई आवश्यकता पड़ने पर फल बनते समय, बोने के 60 दिन बाद करें। सिंचाई सदैव हल्की करनी चाहिए। स्प्रिंकलर सिस्टम का प्रयोग सिंचाई के लिए उपयुक्त होता हैं।

निराई-गुड़ाई(Weeding)

फसल बोने के 35-40 दिन तक फसल को खरपतवारों से बचाना आवश्यक हैं आवश्यकतानुसार एक या दो निराई बोने के 30-35 दिन बाद करनी चाहिए। रासायनिक विधि से खरपतवार नियन्त्रण करने के लिए 1 कि. ग्रा. फलुक्लोरेलिन (बेसालिन) का 800-1000 ली. पानी में घोल बनाकर, फसल बोने से पहले, एक हैक्टेयर में छिड़काव कर नम मिट्टी में 4-5 सेमी. गहरे तक हैरो या कल्टीवेटर की सहायता से मिला देना चाहिए।

फलियों की तुड़ाई

सब्जी के लिए नवम्बर माह में बोई गई फसल जनवरी के मध्य से फरवरी के अंत तक फलियाँ देती हैं। फलियों को 10-12 दिन के अंतर पर 3-4 बार में तोड़ते हैं। अगेती प्रजातियाँ जैसे अर्किल दिसम्बर के अंत तक फलियाँ देने लगती हैं। फलियों से सब्जियों के लिए तोड़ते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि फलियों में दाने पूर्णतया भर गए हों और फलियों के छिलके का रंग हरा हो। छिलके का रंग पीला पड़ने पर बाजार में फलियों की कीमत कम मिलती हैं।

उपज(Yield per acre)

हरी फलियों की पैदावार 40-50 कु./हे. तक अगेती से प्राप्त किया जा सकता हैं। मध्यम तथा पछेती फसल से 60-70 कु./हे. उपज प्राप्त हो जाती हैं। तथा फलियाँ तोड़ने के पश्चात् 150 कु./हे. तक हरा चारा प्राप्त होता हैं।

मटर के रोग व उनकी रोकथाम(Pea diseases and their management)

1. चूर्णी फफूंदी रोग (पाउडरी मिल्डयू) 
यह रोग एरीसाइफी पालीगोनी नामक फफूंदी से लगती हैं। यह रोग अधिकतर नम मौसम में लगता है। पत्तियों पर सफेद चूर्ण जैसी रचना दिखाई देती हैं। पछेती किस्मों में इसक आक्रमण गेभीर रूप् से होता हैं। इस बीमारी की रोकथाम के लिए 3 किग्रा. घुलनशील गंधक या सल्फेक्स को 1000 ली. पानी में घोलकर एक हैक्टेयर में छिड़कें। यदि आवश्यकता हो तो 15 दिन बाद दूसरा छिड़काव करें। रोग रोधी किस्में जैसे- अर्का अजीत, पंत सब्जी मटर-4 आदि किस्मों को उगायें।
2. गेरूई रोग (रस्ट) 
यह रोग यूरोमाइसीज फेबी नामक फफूंदी से लगता हैं। यह रोग कभी-कभी फसल को अधिक क्षति पहुंचाता हैं। इसे रोकने के लिए रोग रोधी किस्मों को ही खेत में उगाना चाहिए। इसकी रोकथाम के लिए डाइथेन एम-45 या डाइथेन जेड-78 के 2.25 कि.ग्रा. को 1000 ली. पानी में घोलकर, प्रति हैक्टेयर छिड़काव करें।

मटर में हानिकारक कीट एवं उनकी रोकथाम (Pests of Pea and their management)
1. एफिड़ 
ये जनवरी में अन्तिम सप्ताह में दिखाई देने लगते हैं और वयस्क दानों व पत्तियों के रस को चूसते हैं। इसकी रोकथाम के लिए इमीडाक्लोप्रिड 0.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी की दर से छिड़कना चाहिए। इसके अलावा रोटेनोन या रोटैनोन – निकोटिन का छिड़काव किया जा सकता हैं।
2. तना छेदक 
यह कीट अगेती फसल के लिए बहुत हानिकारक हैं। यह कीड़ा मुलायम हरे तने तथा पीटिओल में छेद करके अंदर सुंरग बनाता हैं। जिससे पौधे सूखकर मर जाते हैं। वयस्क कीट पत्तियों को नुकसान पहुंचाता हैं। पत्तियाँ पीली तथा सूख जाती हैं। इसकी रोकथाम के लिए मटर को नवम्बर में बोना चाहिए तथा ट्राइजोफास 0.75-1.00 मि.ली./ली. पानी से सप्ताहिक अंतराल से दो बार छिड़काव करना चाहिए अथवा बीज का उपचार क्लोरपाईरीफास (5 मिली./कि.बीज) से करके बुबाई करनी चाहिए।
3. फली छेदक
इन कीटों की इल्लियां फली में छेद करके उसमें हरे दानों को खा जाती हैं। इसके लिए ट्राइजोफास 1.00 मि.ली./ली. या प्रोफेनोफास 0.75-1.00 मिली./ली. पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए।

नवजात बछडे की देखभाल

 

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बछड़े की देखभाल शुरुआती दौर में अच्छी तरह से होना काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज की बछड़ी कल की होने वाली गाय या भैंस है। जन्म से ही उसकी सही देखभाल रखने से भविष्य में वह अच्छी गाय या भैंस बन सकती है।

बछड़े की देखभाल शुरुआती दौर में -

1.    जन्म के ठीक बाद बछड़े के नाक और मुंह से कफ अथवा श्लेष्मा इत्यादि को साफ करें।
2.    आमतौर पर गाय बछड़े को जन्म देते ही उसे जीभ से चाटने लगती है। इससे बछड़े के शरीर को सूखने में आसानी होती है और श्वसन तथा रक्त संचार सुचारू होता है। यदि गाय बछड़े को न चाटे तो ठंडी जलवायु की स्थिति में बछड़े के शरीर को सूखे कपड़े या टाट से पोंछकर सुखाएं। हाथ से छाती को दबाकर और छोड़कर कृत्रिम श्वसन प्रदान करें ।
3.    नाभ नाल में शरीर से 2-5 सेमी की दूरी पर गांठ बांध देनी चाहिए और बांधे हुए स्थान से 1 सेमी नीचे से काटकर टिंक्चर आयोडीन या बोरिक एसिड अथवा कोई भी अन्य एंटिबायोटिक लगाना चाहिए।
4.    बाड़े के गीले बिछौने को हटाकर स्थान को बिलकुल साफ और सूखा रखना चाहिए।
5.    बछड़े के वजन का ब्योरा रखना चाहिए।
6.    गाय के थन और स्तनाग्र को क्लोरीन के घोल द्वारा अच्छी तरह साफकर सुखाएं।
7.    बछड़े को मां का पहला दूध अर्थात् खीस का पान करने दें।
8.    बछड़ा एक घंटे में खड़े होकर दूध पीने की कोशिश करने लगता है। यदि ऐसा न हो तो कमजोर बछड़े की मदद करें ।

बछड़े का भोजन:-

1.    नवजात बछड़े को दिया जाने वाला सबसे पहला और सबसे जरूरी आहार है मां का पहला दूध अर्थात् खीस। खीस का निर्माण मां के द्वारा बछड़े के जन्म से 3 से 7 दिन बाद तक किया जाता है और यह बछड़े के लिए पोषण और तरल पदार्थ का प्राथमिक स्रोत होता है। यह बछड़े को आवश्यक प्रतिरोधक क्षमता भी उपलब्ध कराता है जो उसे संक्रामक रोगों और पोषण संबंधी कमियों का सामना करने की क्षमता देता है। यदि खीस उपलब्ध हो तो जन्म के बाद पहले तीन दिनों तक नवजात को खीस पिलाते रहना चाहिए।  
2.    जन्म के बाद खीस के अतिरिक्त बछड़े को 3 से 4 सप्ताह तक मां के दूध की आवश्यकता होती है। उसके बाद बछड़ा वनस्पति से प्राप्त मांड और शर्करा को पचाने में सक्षम होता है। आगे भी बछड़े को दूध पिलाना पोषण की दृष्टि से अच्छा है लेकिन यह अनाज खिलाने की तुलना में महंगा होता है। बछड़े को दिए जाने वाले किसी भी द्रव आहार का तापमान लगभग कमरे के तापमान अथवा शरीर के तापमान के बराबर होना चाहिए।  
3.    बछड़े को खिलाने के लिए इस्तेमाल होने वाले बर्तनों को अच्छी तरह साफ रखें। इन्हें और खिलाने में इस्तेमाल होने वाली अन्य वस्तुओं को साफ और सूखे स्थान पर रखें।  
 
पानी का महत्व:-
ध्यान रखें हर वक्त साफ और ताजा पानी उपलब्ध रहे। बछड़े को जरूरत से ज्यादा पानी एक ही बार में पीने से रोकने के लिए पानी को अलग-अलग बर्तनों में और अलग-अलग स्थानों में रखें। 
 
खिलाने की व्यवस्थाः-
बछड़े को खिलाने की व्यवस्था इस बात पर निर्भर करती है कि उसे किस प्रकार का भोज्य पदार्थ दिया जा रहा है। इसके लिए आमतौर पर निम्नलिखित व्यवस्था अपनाई जाती है -  
बछड़े को पूरी तरह दूध पर पालना।
1.    मक्खन निकाला हुआ दूध देना।  
2.    दूध की बजाए अन्य द्रव पदार्थ जैसे ताजा छाछ, दही का मीठा पानी, दलिया इत्यादि देना।
3.    दूध के विकल्प देना।  
4.    काफ स्टार्टर देना।
5.    पोषक गाय का दूध पिलाना।
6.    पूरी तरह दूध पर पालना।
 
50 किलो औसत शारीरिक वजन के साथ तीन महीने की उम्र तक के नवजात बछड़े की पोषण आवश्यकता इस प्रकार है-

1.सूखा पदार्थ (डीएम) 1.43 किलो
2.पचने योग्य कुल पोषक पदार्थ (टीडीएन) 1.60 किलो
3.कच्चे प्रोटीन 3.15 किलो

यह ध्यान देने योग्य है कि टीडीएन की आवश्यकता डीएम से अधिक होती है क्योंकि भोजन में वसा का उच्च अनुपात होना चाहिए। 15 दिनों बाद बछड़ा घास टूंगना शुरू कर देता है जिसकी मात्रा लगभग आधा किलो प्रतिदिन होती है, जो 3 महीने बाद बढ़कर 5 किलो हो जाती है।
इस दौरान हरे चारे के स्थान पर 1-2 किलो अच्छे प्रकार का सूखा चारा (पुआल) बछड़े का आहार हो सकता है जो 15 दिन की उम्र में आधा किलो से लेकर 3 महीने की उम्र में डेढ़ किलो तक दिया जा सकता है।  
3 सप्ताह के बाद यदि संपूर्ण दूध की उपलब्धता कम हो तो बछड़े को मक्खन निकाला हुआ दूध, छाछ अथवा अन्य दुग्धीय तरल पदार्थ दिया जा सकता है।
 
बछड़े को दिया जाने वाला मिश्रित आहार-
बछड़े का मिश्रित आहार एक सांद्र पूरक आहार है जो ऐसे बछड़े को दिया जाता है जिसे दूध अथवा अन्य तरल पदार्थों पर पाला जा रहा हो। बछड़े का मिश्रित आहार मुख्य रूप से मक्के और जई जैसे अनाजों से बना होता है।
जौ, गेहूं और ज्वार जैसे अनाजों का इस्तेमाल भी इस मिश्रण में किया जा सकता है। बछड़े के मिश्रित आहार में 10 प्रतिशत तक गुड़ का इस्तेमाल किया जा सकता है। एक आदर्श मिश्रित आहार में 80 प्रतिशत टीडीएन और 22 प्रतिशत सीपी होता है।
अतः इन सभी बातों का ध्यान रखकर एवं वैज्ञानिक विधि अपनाकर पशुपालक अपने पशुओं को स्वस्थ एवं डेयरी व्यवसाय को फायदेमंद बना सकते हैं।

कृषि एवं पशु पालन से जुड़ी विभिन्न योजनाएं




01) वानिकी विकास कार्यक्रमों के लिए वित्तपोषण योजना
02) एग्री क्लिनिक्स एवं एग्री बिजनैस केन्द्र (एसीएबीसी) की स्थापना के लिए कृषि स्नातकों को वित्तपोषण योजना
03) बंजर भूमि विकास योजना हेतु वित्तपोषण योजना (ट्री पट्टा योजना सहित)
04) निवेश प्रमोशन योजना के अंतर्गत गैर-वानिकी बंजर भूम.
05)  कृषि उद्देश्य के लिए भूमि की खरीद हेतु किसानों को वित्तपोषण हेतु योजना
06) भूमि खरीदने तथा अन्य कृषि कार्य-कलापों के लिए कृषि स्नातकों को वित्तीय सहायता प्रदान करने की योजना
07) मशरुम की खेती हेतु वित्तपोषण योजना
08) मशरुम स्पान उत्पादन हेतु वित्तपोषण योजना
09) बायोगैस यूनिटों की स्थापना के लिए वित्तपोषण योजना
10) डीलरों को कृषि निविष्टियों के लिए पशु चारा, मुर्गीदाना, डेयरी फीड इत्यादि
11) मुर्गीपालन के लिए वित्तपोषण योजना
12) डेयरी विकास कार्यक्रमों के लिए वित्तपोषण योजना
13) दूध उत्पादन कार्यकलापों के लिए वित्तपोषण अर्थात दूध उत्पादन के लिए दुधारू पशुओं (गाय/भैंसों) की खरीद व रखरखाव
14) अच्छी नस्ल के दुधारू पशुओं हेतु वित्तपोषण योजना
15) पशुपालन से सम्बध्द अन्य नवीन कार्यकलापों के लिए वित्तपोषण
16) डेयरी विकास कार्ड योजना (चुने हुए राज्यों में लागू)
17) नई भैंस खरीदना / मौजूदा भैंस को बदलना
18) मत्स्य विकास वित्तपोषण हेतु योजना
19) मेरीन मछली पालन वित्तपोषण योजना
20)  भेड़-बकरी पालन हेतु वित्तपोषण योजना
21) सूअर विकास हेतु वित्तपोषण योजना
22) गाड़ी एवं भार ढोने वाले पशुओं की खरीद हेतु वित्तपोषण योजना
23) मधुमक्खी पालन वित्तपोषण योजना
24) रेशम उत्पादन के वित्तपोषण के लिए योजना
25) किचन गार्डनिंग वित्तपोषण योजना
26) पीएनबी कृषि कार्ड योजना
27) पादप गृहों के वित्त पोषण के लिए योजना
28) पीएनबी कल्याणी कार्ड योजना
29) पीएनबी जनरल क्रेडिट कार्ड (जीसीसी)
30) पीएनबी कृषक साथी योजना (केएसएस)
31) सौर उर्जा प्रकाश प्रणाली के वित्तपोषण के लिए योजना (एसईएलसी)
32) कृषि अग्रिमों के लिए मार्जिन संबंधी मानदण्ड

आलू की उन्नत खेती


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आलू (Potato) विश्व में सबसे ज्यादा लोकप्रिय और प्रयोग किया जाता है| आलू (Potato) की खेती भी लगभग पुरे विश्व में की जाती है| लेकिन इसका जनक अमेरिका है| भारत में इसकी उत्पति 16 वी सदी में पुर्तगालियों द्वारा मानी जाती है| आलू (Potato) पौष्टिक तत्वों का खजाना है, इसमें सबसे प्रमुख स्टार्क, जैविक प्रोटीन, सोडा, पोटाश और विटामिन ए व डी पर्याप्त मात्रा में पाए जाते है|
आलू (Potato) की सम्भावनाओं को देखते हुए, आलू की उन्नत खेती किसानो के लिए वरदान साबित हो सकती है| भारत में भी आलू की बड़े क्षेत्रफल में खेती की जाती है|
परन्तु अच्छी तकनीकी और जानकारी के आभाव में किसान भाई इसकी अच्छी पैदावार नही ले पाते है| यहां हम किसान भाइयों को उन छोटे छोटे उपायों से अवगत कराना चाहेगे| जिनको उपयोग में लाकर किसान अच्छी पैदावार प्राप्त कर सकते है|

आलू के लिए जलवायु (Climate for Potato)

1. आलू की अच्छी पैदावार के लिए शीत जलवायु की आवस्यकता होती है| आलू की वृद्धि और विकास के लिए 15 से 25 डिग्री, इसके अंकुरण के लिए 25 डिग्री, वनस्पति तरक्की के लिए 20 डिग्री और कन्द के विकास के लिए 15 से 20 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है|
2. 33 डिग्री सेल्सियस तापमान से ऊपर आलू (Potato) की खेती प्रभावित होती है, आलू का विकास रुक जाता है|

उपयुक्त भूमि (Soil Suitable)
आलू की खेत विभिन्न प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है| परन्तु अच्छे उत्पादन के लिए जीवांशयुक्त और भुरभरी और जल निकासी वाली भूमि उपयुक्त मानी जाती है| इसके साथ साथ बलुई दोमट और दोमट मिट्टी भी आलू की खेती के लिए अच्छी मानी जाती है|आलू (Potato) की खेती के ले मिट्टी की अम्लीय और क्षारीय क्षमता (PH) मान 5.1 से 6.7 तक उपयुक्त माना जाता है| 

खेत की तैयारी (Farm Preparation) 
खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए| उसके साथ साथ 3 से 4 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करनी चाहिए| मिट्टी को भुरभुरा बना ले क्योकि आलू मिट्टी की फसल होती है| जितनी भूमि की जुताई होगी उतनी ही आलू की पैदावार अच्छी होगी| खेत को समतल करने के लिए पत्ता लगाना ना भूले|

उन्नत किस्में (Advanced Varieties)

बेहतर पैदावार के लिए किस्म का चुनाव करना अति आवश्यक होता है| आलू (Potato) की सामान्य और संकर किस्में इस प्रकार है|
क्रमांककिस्म का नामपकने का समय (दिन)उत्पादन (प्रति हेक्टेयर) क्विंटलविशेषता
1कुफरी अलंकर65 से 75200 से 250अंगमारी रोग के लिए प्रतिरोधक
2कुफरी चन्द्रमुखी80 से 90200 से 250सफेद व बड़े कन्द
3कुफरी नवताल जी 252475 से 85200 से 250कन्द मध्यम, गुदा हल्का पिला
4कुफरी बहार 3792 ई90 से 110200 से 260सफेद व बड़े कन्द
5कुफरी बादशाह100 से 130250 से 275सफेद व बड़े कन्द
6कुफरी सिंदूरी120 से 125300 से 400बड़े व मध्यम आकर कन्ध
7कुफरी देवा120 से 125300 से 400बड़े व मध्यम आकर कन्ध
8कुफरी लवकर100 से 120300 से 400बड़े व सफेद कन्ध
9कुफरी स्वर्ण100 से 110275 से 300मध्यम कन्ध, पिला गुदा
10कुफरी अशोका70 से 90200 से 250बड़े व सफेद कन्द
11कुफरी ख्याति75 से 90280 से 340कन्द अंडाकार, चपटे सफेद
12कुफरी ज्ह्वार75 से 90220 से 280कन्ध मध्यम, गोल गुदा पिला
13कुफरी पुखराज75 से 100350 से 370सफेद, अंडाकार, गुदा पिला


आलू (Potato) की संकर किस्म इस प्रकार है|

1. कुफरी जवाहर जेएच 222- यह किस्म 100 से 110 दिन में तैयार हो जाती है, और यह झुलसा और फोम रोग की प्रतिरोधी किस्म है| इसकी पैदावार 270 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है|
2. ई 4486- यह किस्म 125 से 135 दिन में तैयार होती है, इसकी पैदावार 250 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टयर है|

बीज बुवाई (Sowing the Seed)

1. किसान भाइयों को चाहिए की वे बीज या तो सरकारी संस्थाओं से खरीदे या फिर विश्वसनीय एजेंसियों से ही प्राप्त करे|आलू (Potato) की बुवाई के लिए 30 से 45 ग्राम वाले अच्छे अंकुरित बीज का उपयोग करना चाहिए| समान्यत आलू की 25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर आवश्यकता होती है|
2. आलू (Potato) बीज को बुवाई से पहले उपचारित करना अति आवश्यक है, इसके लिए 3 ग्राम डाइथेन एम 45 या 2 ग्राम बाविस्टिन प्रति किलोग्राम बीज को पानी के घोल में 30 मिनट तक डुबो कर रखे और छाया में सुखाकर बुवाई करनी चाहिए|
3. आलू (Potato) की अगेती किस्मों की बुआई का उपयुक्त समय 1 से 20 सितंबर और सामान्य किस्मों का 10 से 15 अक्तूबर होता है| लाइन से लाइन की दुरी 60 सेंटीमीटर और आलू से आलू की दुरी उसके बीज के आकर पर निर्भर होती है छोटी आलू के लिए 15 और बड़े के लिए 40 सेंटीमीटर उपयुक्त रहती है| मेड़ो में आलू 8 से 10 सेंटीमीटर निचे छोड़े|

जल और खाद प्रबंधन (Water and Fertilizer Management)
1. आलू (Potato) की फसल में सिंचाई आवश्यकतानुसार करनी चाहिए, आमतौर पर 8 से 10 सिंचाई होती है, पहली सिंचाई बुवाई के 10 से 15 दिन बाद करनी चाहिए और खुदाई के 10 दिन पहले सिंचाई बंद कर देनी चाहिए|
2. आलू की अच्छी पैदावार के लिए बुवाई से पहले जुताई करते समय 150 से 200 टन गोबर की खाद मिटटी में मिलनी चाहिए, इसके साथ 180 किलोग्राम नाइट्रोजन, 80 किलोग्राम फास्फोरस 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट और 120 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की आवस्यकता होती है| खाद की पूरी मात्रा बीज बुआई से पहले देनी चाहिए|

खरपतवार नियंत्रण (Weed Control)

आलू (Potato) की बुवाई के 20 से 25 दिन बाद मेड़ों के बीच खुरपी, क्सोला, फावड़ा या अन्य यंत्र से निराई गुड़ाई करनी चाहिए| जिसे खरपतवार फसल को प्रभावित न करे और दूसरी निराई गुड़ाई में आलू के पौधों को मिटटी चढ़ानी चाहिए| यदि आप खरपतवार पर कीटनाशक से नियंत्रण चाहते है तो पेंडामेथलिन 30 प्रतिशत 3.5 लिटर का 900 से 1000 लिटर पानी में घोल बनाकर बुवाई के 2 दिन तक प्रति हेक्टेयर छिड़काव कर सकते है| जिसे खरपतवार का जमाव ही नही होगा|

रोग व कीट रोकथाम (Disease and Pest Prevention)
1. आलू (Potato) की फसल में प्रमुख रोग झुलसा, पत्तियों का मुड़ना और चित्ती रोग है| इनके उपचार के लिए रोग रोधी किस्मो का चुनाव करना चाहिए| इसके साथ साथ रोगी पौधों को खेत से उखाड़ कर मिटटी में दबा देना चाहिए| कीटनाशक रोकथाम के तौर पर रोगों के लक्ष्ण दिखाई देने से पहले मैन्कोजेब 0.2 प्रतिशत का घोल बनाकर हर 7 से 10 दिन में छिड़काव करना चाहिए या 2 ग्राम डाइथेन एम 45 प्रति लिटर पानी का घोल बनाकर छिडकाव करना चाहिए|
2. आलू की फसल में प्रमुख कीट जैसिड और माहू जैसे फसल कुतरने वाले कीड़े लगते है इनकी रोकथाम के लिए 2 मिलीलीटर क्लोरोफयरिफास प्रति लिटर पानी में घोल बनाकर हर 15 दिन में 3 बार छिड़काव करना चाहिए|

फसल की खुदाई और पैदावार (Crop Excavation and Production) 

1. आलू की फसल की खुदाई से पहले यह सुनिश्चित कर ले की किस्म कोन से है और पकने का समय क्या है, या फिर अच्छे भाव के लिए आप 8 से 10 दिन पहले भी खुदाई कर सकते है|
2. आलू (Potato) की पैदावार किस्म और समय पर निर्भर करती है वैसे आमतौर पर 300 से 350 क्विंटल प्रति हेक्टेयर समान्य किस्म की पैदावार होनी चाहिए|
तो किसान भाई उपरोक्त विधि और अच्छी किस्म का चुनाव कर के आलू की अच्छी पैदावार ले सकते है|