आज की कृषि पूर्ण रूप से जहरीली हो चुकी है। अंधाधुंध कीटनाशकों का प्रयोग एक तरफ भूमि की उर्वरकता को नष्ट कर रहा है, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है। उपभोक्ता पैसे देकर जहर खरीद रहा है। जानलेवा बीमारियां जैसे हार्ट अटैक, कैंसर, दस्त, उल्टियां, अपच कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग का ही नतीजा है। एक तरफ आज की युवा पीढ़ी कृषि से अपना मुंह मोड़ रही है, वहीं औद्योगिकीकरण, विकासशील गतिविधियों तथा बढ़ती जनसंख्या भूमि को सिकोड़ रही है। ऐसी परिस्थिति में जिस बची-खुची भूमि पर खेती हो रही है, वह पूर्ण रूप से विषैली हो चुकी है। कभी मौसम की मार, कभी बीज व अन्य कृषि उपकरणों के अभाव से किसान पिसता रहता है।
ऐसे में कृषि व्यवस्था को अपनाना घाटे का सौदा बन गया है। यही कारण है कि युवा पीढ़ी कृषि से हट कर महज चंद रुपए के लिए नौकरी करने को मजबूर हो गई है। गर्त में जाती कृषि व्यवस्था को बचाने का एकमात्र उपाय जीरो बजट आर्गेनिक खेती ही हो सकती है। जैविक खेती बिना कोई धन खर्च करके की जा सकती है। किसानों को देशी गउओं के गोबर और गोमूत्र का प्रयोग कीटनाशकों और खाद के रूप में करके, महंगे व हानिकारक कीटनाशकों पर पैसा खर्च नहीं करना पड़ेगा। गोमूत्र में जहरीले पौधे खासकर नीम का प्रयोग करके फसलों की गुणवत्ता को बरकरार रखा जा सकता है।

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