Monday, April 20, 2020

करेला की खेती


परिचय
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सब्जी फसलों में बेल वाली सब्जियों का सबसे बड़ा परिवार है। बेल वाली सब्जियों में करेले का महत्वपूर्ण स्थान है। करेला केवल सब्जी मात्र के लिए नहीं बल्कि आजकल इसका औषधियों में भी काफी प्रयोग है। इसलिए इसका संकर बीज उत्पादन करना और भी लाभदायक हो गया है मध्यम एवं बड़े वर्ग के किसान खासकर युवा एवं महिला किसान सब्जियों का बीज उत्पादन/संकर बीज उत्पादन एक व्यवसाय के रूप में अपनाकर उद्यमी बन सकते हैं और कृषि आय में वृद्वि कर सकते है जिससे संकर बीजों की स्थानीय उपल्बधित्ता में सुधार, कम मूल्य पर किसानों को संकर बीजों की उपलब्धि है सकती है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने सब्जियों की अनेक उन्नत एवं संकर प्रजातियां का विमोचन एवं उनके बीज उत्पादन प्रौद्योगिकी का विकास किया है।

संकर किस्मः-
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भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा करेले की दो संकर प्रजातियां
विकसित हुई हैं, पूसा संकर-1 तथा पूसा संकर-2

संकर किस्म पूसा संकर -
इसके पौधे लम्बे, गांठों के बीच की औसत दूरी 10.5 सेमी. पत्तियां मध्यम अण्डाकार, गहरे कटावयुक्त मुलायम हरे रंग की होती है। फूल एकलिंगी पत्तियों के कक्ष में अकेले-अकेले होते हैं। नर फूल के डंठल लम्बे-पतले तथा मादा फूल की डंठल छोटे व मोटे होते हैं। इस किस्म के फले गहरे हरे रंग व आकर्षक तथा धारियां लगातार होती है। फलों की लम्बाई मध्यम तथा फलों का औसत भार 115 ग्राम होता है।

नर जनक :- बेल छोटी, झाडीदार, गांठों के बीच की दूरी औसतन 9.5 सेमी. पत्तियां मध्यम अंडाकार गहरे कटावयुक्त मुलायम गहरे हरे रंग की होती है। फूल एकलिंगी पत्तियों के कक्ष में अकेले-अकेले होते हैं। नर फूल के डंठल लम्बे-पतले जबकि मादा फूल की डंठल मोटे व छोटे होते हैं। इस किस्म के फल अच्छे हरे व आकर्षक तथा धारियां मुलायम बीच-बीच में कटी होती है। फल की सतह उभरी होती है। फल मध्यम लम्बाई वाले तथा फलों का औसत भार 115 ग्राम
है।

संकर बीज उत्पादन
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जलवायुः - करेला में बीज उत्पादन गर्मी एवं वर्षा दोनों मौसम में किया जा सकता है।
फसल में जमाव के लिए 22-25 डिग्री सेल्सियस और अच्छी पैदावार, पुष्पन एवं फल के लिए 25-30 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त है। संकर बीज उत्पादन हेतु गर्मी का मौसम अधिक उपयुक्त है।

खेत का चुनावः -
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संकर बीज उत्पादन करने के लिए खेत उपजाऊ तथा मिट्टी बलुई दोमट या
दोमट होनी चाहिए। खेत सममतल तथा जल निकास की व्यवस्था के साथ-साथ सिंचाई जल की समुचित व्यवस्था होना आवश्यक है।

खेत की तैयारीः -
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खेत की जुताई कर के उसे सममतल कर लेना चाहिए। बीज की बुवाई के लिए आवश्यकतानुसार दूरी पर नालियां बना लें खेत में जल निकास का अच्छा प्रबंध होना अति आवश्यक है।

खाद एवं उर्वरकः -
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25 से 30 टन सड़ी हुई गोबर की या कम्पोस्ट खाद खेत में बुवाई से 25-30 दिन पहले तथा बुवाई से पूर्व नालियों में 50 किग्रा. डी.ए.पी., 50 किग्रा. म्यूरेट आॅफ
पोटाश प्रति हैक्टेयर के हिसाब से जमीन में मिलाए। बाकी नत्रजन 30 किग्रा. यूरिया
बुवाई के 20-25 दिन बाद व इतनी ही मात्रा 50-55 दिन बाद पुष्पन व फलन की अवस्था में डाले।

बीज स्रेातः -
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संकर बीज उत्पादन के लिए पैतृक जनकों का बीज संबंधित कृषि अनुसंधान संस्थान या कृषि विश्वविद्यालय से प्राप्त कर सकते हैं।

पृथक्करण दूरीः -
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संकर बीज फसल का खेत अन्य करेले की किस्मों के खेत या जंगली करेले के खेत या पौधों से न्यूनतम 1000 मीटर दूरी पर होनी चाहिए। अगर नर व मादा जनकों की बुवाई अलग-अलग खण्डों में की हैं तो नर व मादा खण्डों के बीच की न्यूनतम दूरी 5 मीटर
आवश्यक है। खेत में 1/5 भाग में नर पैतृक तथा 4/5 भाग में मादा पैतृक की बुवाई अलग-अलग खण्डों में करना उचित माना गया है।

बीज दर एवं उपचारः-
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बीज की मात्रा पैतृक जनकों की बुवाई के अनुपात पर निर्भर करती है। मादा पैतृक की 1.75 किग्रा. तथा नर पैतृक की 0.5 किग्रा. मात्रा प्रति एकड़ पर्याप्त रहती है। बुवाई से पूर्व बीजों (नर व मादा) को बाविस्टीन (2 ग्राम प्रति किग्रा.) के घोल में 18 से 24 घंटे के लिए भिगोए ।

बुवाई का समयः -
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15 फरवरी से 30 फरवरी (ग्रीष्म ऋतु) तथा 15 जुलाई से 30 जुलाई (वर्षा ऋतु)

बुवाई की विधि एवं दिशाः -
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बुवाई 2 प्रकार से की जाती है।
(1) सीधे बीज द्वारा
(2) पौध रोपण द्वारा

करेला बीज उत्पदन के क्षेत्रों में बुवाई सीधे बीजों द्वारा की जाती है। परन्तु उत्तर भारत
में सीधी बुवाई मार्च के पहले पखवाड़े में ही संभव है। लेकिन तब बुवाई करने से संकर बीज की मात्रा कम प्राप्त होती है। अतः ग्रीष्म ऋतु में पौधों को पाॅलीथीन या पौध ट्रे में संरक्षित आकृतियों में उगाकर फरवरी के प्रथम सप्ताह में रोपाई करे। संकर बीज उत्पादन के लिए बुवाई/रोपाई क्यारियों की नालियों में करनी चाहिए। पौधे से पौधे की दूरी 100 मी. और क्यारियों की चैड़ाई 1 मीटर होनी चाहिए। बेलों को सहारा देने के लिए जंग अवरोधी तार या रस्सियों का उपयोग करना चाहिए। बुवाई के एक महीने बाद बेलों को तारों या रस्सियों से बांस पर बांधकर सहारा देकर चढ़ाना चाहिए। इससे पौधों की कीट तथा बीमारियों से बचाव होता है और संकर फल भी अच्छे से विकसित हो पाते हैं।

सिंचाई तथा कृषक क्रियाएंः
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सिंचाई खुले खेत में आवष्यकतानुसार दी जा सकती है यद्यपि ड्रिप सिंचाई का प्रयोग अधिक प्रभावी है, तथा यह अनावष्यक पानी का संरक्षण करता है। सिंचाई 15-20 दिन के अंतराल में दे अन्यथा फल एवं बीज की उपज पर प्रतिकूल असर पड़ता है। खरपतवारों की रोकथाम के लिए 3-4 बार निराई पर्याप्त रहती है। पुष्पण आरम्भ होने पर खेत में नत्रजन उर्वरक मिलाकर पौधों पर मिट्टी चढ़ानी चाहिए।

फसल सुरक्षाः -
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चूर्णित आसिता (पाउडरी मिल्ड्यू) तथा मृदुल आसिता (डाउनी मिल्ड्यू) के लिए क्रमशः बेविस्टीन 2.0 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर तथा डायथेन एम-45 या रीडोमिल (2.0 ग्राम प्रति लीटर) पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। वायरस की बीमारियों के लिए कोन्फीडोर (2.5-3.8 मिली./लीटर) पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

संकर बीज उत्पादन विधिः -
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करेला उभयलिंगी पौधा होने के कारण इसमें संकर बीज उत्पादन हाथ द्वारा परागण करना प्रचलित है। इस विधि में मादा पैतृक पौधों में से नर फूलों को प्रतिदिन खिलने से पहले तोड़ दिया जाता है तथा मादा फूलों को खिलने से एक दिन पूर्व सायं के समय बटर पेपर बैग (7.5 से 12 सेमी.) में बंद कर देते हैं। हवा के आदान प्रदान हेतु लिफाफे में 5-6 छिद्र अवश्य करने चाहिए। नर पैतृक पौधों में नर फूलों को भी नर्मी ना सोखने वाली रूई से अच्छी प्रकार ढ़क देते हैं । अगले दिन नर खण्डों से नर फूलों को तोड़कर इकट्ठा कर लें तथा मादा पैतृक में मादा फूलों का लिफाफा हटाकर हाथ द्वारा परागकोष को रगड़कर या परागकणों को एकत्र करके ब्रश द्वारा परागण करें । परागण के तुरन्त बाद बटर पेपर बैग से मादा फूल को दोबारा ढक दें । मादा फूलों से बटर पेपर बैग 8-10 दिन बाद हटाये तथा एक पौधे पर इस प्रकार 10-12 फल तैयार करें अधिक संख्या में फल बनने से फल पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते।

अवांछनीय पौधों का निकालना तथा निरीक्षण अवस्थाः -
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संकर बीज उत्पादन के खेत का चार अवस्था में निरीक्षण करना चाहिए। पुष्पन से पूर्व जिसमें मादा उवं नर पैतृकों की बढ़वार, पत्ते की आकृति, रंग एवं शीर्ष भागों पर रोये के आधार पर पौधों को निकालना चाहिए।
पुष्पीय लक्षणों एवं फलों के आधार पर अवांछनीय पौधों की पहचान कर निकालना
चाहिए। फलों की तुड़ाई एवं पकने पर फल के विकास, रंग, आकार एवं पौधों में रोग आदि की स्थिती को ध्यान में रखते हुए अवांछनीय पौधों एवं फलों को हटा देना चाहिए।

फलों का पकना, तुड़ाई एवं बीज निकालनाः
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परागण के 28-30 दिन बाद फल पकने लगते हैं । पकने पर फल चमकीले नारंगी रंग के हो जाते हैं। फलों की तुड़ाई तभी करें जब पूरा फल नारंगी रंग को हो जाये। कम पके फल में बीज अल्प विकसित रहते हैं। अधिक पकने पर फल फट जाते हैं तथा बीज का नुकसान होता है। पके फलो को दो भागों में फाडकर हाथ द्वारा बीजों को निकालकर रेते या साफ मिट्टी से मसलकर बीजों की चिपचिपी झिल्ली को हटा देना चाहिए। बीजों को साफ बहते हुए पानी से धुलाई करके तेज धूप में सुखाना चाहिए।

बीज उपज एवं 1000 बीजों का भारः -
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प्रति पौध 12-14 फल मिलते है जिनमें से 15-25 बीज प्रति फल मिल जाते है। दिल्ली परिस्थितियों में 150-200 किग्रा. बीज प्रति एकड़ उपज होती है।

बटन मशरूम के लिए कम्पोस्ट खाद तैयार करना



साधारण विधि से कम्पोस्ट बनाना।
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साधारण विधि से कम्पोस्ट बनाने में 20 से 25 दिन का समय लगता है 100 सेंमी लम्बी, 50 सेंमी चौडी तथा 15 सेंमी ऊची 15 पेटियों के लिए इस विधि से कम्पेस्ट बनाने के लिए सामग्री:

1. धान या गेहूं का 10-12 सेंमी लम्बाई में कटा हुआ भूसा - 250 किलोग्राम।

2. धान या गेहूं की भूसी - 20-25 किलोग्राम।

3. अमोनियम सल्फेट या कैल्शियम अमोनियम नाईट्रेट - 4 किलोग्राम।

4. यूरिया - 3 किलोग्राम

5. जिप्सम - 20 किलोग्राम

6. मैलाथियॉन - 10 मिलि लिटर

जिस स्थान पर कम्पोस्ट तैयार करनी हो वहां पर गेहूं के भूसे की 8 से 10 इंच मोटी तह
बिछाकर उसे पानी से अच्छी तरह से भिगो दें। पानी में भीगोने के लगभग 16 से 18 घंटे बाद उसमें जिप्सम तथा कीटनाशक को छोडकर बाकी सभी सामग्री अच्छी तरह से मिला दें।

फिर उस सारी सामग्री का एक मीटर चौडा, एक मीटर ऊचा तथा समायोजित लम्बाई का ढेर बना दें। इस ढेर को प्रत्येक 3-4 दिन के अन्तराल पर हवा लगाने के लिए फर्श पर खोलकर बिछा दें तथा आधा घंटे बाद दोबारा उसी आकार का ढेर बना दें।

अगर भूसा सूखा लगे तो उस पर
हल्का पानी छिडककर गीला कर लें। तीसरी पलटाई के दौरान कुल जिप्सम की आधी मात्रा मिला दें। शेष बचे जिप्सम को चौथी पलटाई के दौरान भूसे में मिला दें।

पॉचवी पलटाई के दौरान 10 मिलि लिटर मैलाथियान को 5 लीटर पानी में घोलकर भूसे पर छिडकाव करें तथा अच्छी तरह से मिलाकर फिर से ढेर बना दें। अगले 3 से 4 दिनों में कम्पोस्ट खाद पेटियों में भरने योग्य हो जायेगा।

निर्जीविकरण विधि से कम्पोस्ट बनाने की तकनीक।
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मशरूम का उत्पादन अच्छी कम्पोस्ट खाद पर निर्भर करता है अत: कम्पोस्ट बनाते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए ।

निर्जीविकरण विधि से कम्पोस्ट खाद दो चरणों में लगभग 14-15 दिनों में तैयार होती है

पहला चरण:
इस विधि से कम्पोस्ट बनाने का पहला चरण साधारण विधि के समान ही है परन्तू इसमें
पलटाई हर दूसरे दिन यानि लगभग 48 घंटे के बाद की जाती है तीसरी पलटाई में जिप्सम मिला दिया जाता है । 8 दिन बाद कम्पोस्ट दूसरे चरण के लिए तैयार हो जाती है।

दूसरा चरण:
दूसरे चरण में कम्पोस्ट को सीधे ही या फिर पेटीयों में भरकर भाप द्वारा पहले से 45 डिग्री ताप पर गर्म किये हुए निर्जीविकरण कक्ष में रखते हैं। इसके बाद इस कक्ष की सभी खिडकीयॉं दरवाजें बंद कर दें तथा अगले 2-3 दिनों तक भाप से अन्दर का तापमान 57-58 डिग्री पर बनाएं रखें ।
तीसरे दिन 2 घंटे के लिए इस कक्ष का ताप 60 से 62 डिग्री पर स्थिर करें तत्पश्चात कक्ष में ताजी हवा का प्रवाह बनाऐं तथा तापमान को धीरे-धीरे गिरकर 45 डिग्री तक आने दें ।

अगले 3-4 दिनों तक कम्पोस्ट को सामान्य ताप तक ठंडा होने दें । सामान्य ताप पर आने पर कम्पोस्ट भरनें के लिए तैयार हो जाती है । तैयार कम्पोस्ट गहरे भूरे रंग की तथा गंध रहीत होती है तथा इसका PH लगभग उदासीन होता है ।

Friday, April 17, 2020

सूरजमुखी की वैज्ञानिक खेती




परिचय
सूरजमुखी एक तिलहनी फसल है , इसकी खेती भारत में प्रमुखता से की जाती है | इसकी खेती वर्ष में तीन बार की जा सकती है परन्तु उत्तर भारत में इसकी खेती सर्दी के मौसम में की जाता है | खरीफ मौसम की सूरजमुखी में कीट का प्रकोप ज्यादा होता है तथा फूल भी छोटा लगता है | जायद फसल के रूप में इसकी खेती सबसे उपयुक्त है तथा उत्पादन भी ज्यादा होता है | किसान समाधान इसकी जानकारी किसानों को  विस्तार से लेकर आया है |

भूमि की तैयारी
फसल किसी भी प्रकार की भूमि में खेती की जा सकती है | इसकी खेती उस भूमि में भी किया जा सकता है जिस भूमि में धान की खेती नहीं किया जा सकता है | उतार – चढ़ाव वाली, कम जल धारण क्षमता वाली उथल  वाली आदि कमजोर किस्म में  फसलें अधिकतर उगाई जा रही है | हल्की भूमि में जिसमें पानी का निकास अच्छा हो इनकी खेती के लिए उपयुक्त होती है |बहुत अच्छी जल निकासी होने पर लघु धन्य फसलें प्राय: सभी प्रकार की भूमि में उगाई जा सकती है | भूमि की तैयारी के लिए गर्मी की जुताई करें एवं वर्षा होने पर पुनः खेत की जुताई करें या बखर चलायें जिसमें मिट्टी अच्छी तरह से भुरभुरी हो जायें |

उन्नत किस्में 

मार्डन :- इस प्रजाति की उत्पादन क्षमता 6 से 8 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है | इसकी उपज समय अवधि 80 से 90 दिन है | इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 90 से 100 सेमी. तक होती है | इस प्रजाति की खेती बहुफसलीय क्षेत्र के लिए उपयुक्त है| इस प्रजाति में तेल की मात्र 38 से 40 प्रतिशत होती है |

#बी.एस.एच. – 1 :- इस प्रजाति की उत्पादन 10 से 15 किवंटल प्रति हैक्टेयर है तथा इसकी उत्पादन समय 90 से 95 दिन है | इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 100 से 150 सेमी. तक होती है | इस प्रजाति में तेल की मात्र 41 प्रतिशत होती है |

#एम.एस.एच. :- इस प्रजाति की उत्पादन 15 से 18 किवंटल प्रति हैक्टेयर  है  तथा इसकी उत्पादन समय 90 से 95 दिन है | इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 170 से 200  सेमी. तक होती है | इस प्रजाति में तेल की मात्र 42 से 44 प्रतिशत होती है |

#सूर्या :– इस प्रजाति की उत्पादन 8 से 10 किवंटल प्रति हैक्टेयर है तथा इसकी उत्पादन समय 90 से 100 दिन है | इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 130 से 135 सेमी. तक होती है | इसप्रजाति की की खेती पिछेती बुवाई के लिए उपयुक्त है |  इस प्रजाति में तेल की मात्र38 से 40  प्रतिशत होती है |

#ई.सी. 68415 :- इस प्रजाति की उत्पादन 8 से 10 किवंटल प्रति हैक्टेयर है तथा इसकी उत्पादन समय 110 से 115 दिन है | इसकी विशेषता यह है की पौधों की ऊँचाई 180 से 200  सेमी. तक होती है | इसप्रजाति की की खेती पिछेती बुवाई के लिए उपयुक्त है |  इस प्रजाति में तेल की मात्र38 से 40  प्रतिशत होती है |

#बीज की बुवाई कब और कैसे करें ?

सिंचित क्षत्रों में खरीफ फसल की कटाई के बाद अक्तूबर से मध्य नवम्बर के बीच करना चाहिए | अक्टूबर माह में की गई बुवाई से अंकुरण अच्छा रहता है | इसके अलावा असिंचित क्षेत्रों में (वर्षा निर्भरता खेती) में सूरजमुखी की बोनी वर्ष समाप्त होते ही सितम्बर माह के मध्य सप्ताह से आखरी सप्ताह तक कर देना चाहिए | ग्रीष्म फसल की बोनी का समय जनवरी माह के तीसरे सप्ताह से फरवरी माह के अन्त तक उपयुक्त होता है | इसी समय के बीच में बोनी करना चाहिए | बुवाई के समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए की वर्ष प्रारम्भ होने से पहले कटाई होकर गहाई किया जा सके |

#बीज की मात्रा

उन्नत किस्मों के बीज की मात्रा – 10 किलोग्राम / हेक्टयर संकर किस्मों के बीज की मात्रा – 6 से 7 किलोग्राम / हैक्टेयर होना चाहिए |

#बुवाई कैसे करें

पिछेती खरीफ एवं जायद की फसल के लिए कतार से कतार की देरी 45 सेमी एवं रबी फसल के लिए 60 सेमी होनी चाहिए | पौधे से पौधे की दुरी 25 से 30 सेमी रखना चाहिए |

#बीजोपचार :-

लाभ :- बीजों की अंकुरण क्षमता बढ़ जाती है एवं फंफूंदनाशक बीमारियों से सुरक्षा होती है |

#फंफूंदनाशक दवा का नाम एवं मात्रा :-

बीज जनित रोगों की रोकथाम के लिए 2 ग्राम थायरम एवं 1 ग्राम कार्बनडाजिम 50 के मिश्रण को प्रति किलो ग्राम बीज की दर से अथवा 3 ग्राम थायरम / किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए | डाउन मिल्ड्यू बीमारी के नियंत्रण के लिए रेडोमिल 6 ग्राम / किलोग्राम बीज की दर से बीज उपचारित करें |

दवा उपयोग करने का तरीका :- बीजों को पहले चिपचिपे पदार्थ से भिगोकर दावा मिला दें फिर छाया में सखाएं और 2 घंटे बाद बोनी करें |

#पोषक तत्व प्रबंधन 

#जैव उर्वरक का उपयोग :-
जैव उर्वरक के उपयोग से लाभ –  पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराने का कार्य करते हैं | जैव उर्वरकों के नाम एवं अनुशंसित मात्रा – एजोटोबेक्टर जैव उर्वरक का एक पैकेट एक हैक्टेयर बीज के उपचार हेतु प्रयोग करें | पी.एस.बी. जैव उर्वरक के 15 पैकेट को 50 किलोग्राम गोबर या क्म्पोष्ट खाद में मिलाकर दें |

#जैव उर्वरकों के उपयोग की विधि :-
जैव उर्वरकों के नाम एवं अनुशंसित मात्रा के अनुसार आखिरी बखरनी के समय प्रति हैक्टेयर खेत में डालें | इस समय खेत में नमी होना चाहिए |

#पोषक तत्व प्रबंधन :-

क्म्पोष्ट की मात्रा एवं उपयोग :- सूर्यमुखी के अच्छे उत्पादन के लिए क्म्पोष्ट खाद 5 से 10 टन / हैक्टेयर की दर से बोनी के पूर्व खेत में डालें |

मिट्टी परीक्षण के लाभ :-

पोषक तत्वों का पूर्वानुमान कर संतुलित खाद डी जा सकती है | संतुलित उर्वरकों की मात्रा देने का समय एवं तारीख – बोनी के समय 30 – 40 किलोग्राम नत्रजन, 60 किलोग्राम स्फुर एवं 30 किलोग्राम पोटाश की मात्रा प्रति हैक्टेयर खेत में डालें | खड़ी फसलों में नत्रजन की 20 – 30 किलोग्राम / हैक्टेयर मात्रा बोनी के लगभग एक माह बाद प्रथम सिंचाई के बाद पौधे के कतारों के बाजू में दें |

#खरपतवार नियंत्रण 

#रासायनिक तरीके से निंदाई करें :-
खरपतवार की निदाई दो तरह से कर सकते हैं पहला यह होगा की खरपतवार को फसल बुवाई से पहले ही नष्ट कर दें | यह ज्यादा अच्छा रहता है दूसरा यह है की बुवाई के बाद पौधा बड़ा हो जाता है तो खरपतवार की निदाई करना जरिरी रहता है \

#बुवाई से पूर्व खरपतवार का निदाई :-
एलाक्लोर दावा की 1.5 किलोग्राम हैक्टेयर की दर से बुवाई के बाद पर अंकुरण से पूर्व प्रयोग कर खरपतवार को नष्ट कर सकते हैं | एलाक्लोर दावा की 1.5 किलोग्राम मात्रा को 700 से 800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें |

खड़ी फसल में :-

कड़ी फसल में खरपतवार की निदाई के लिए मुख्यत: दो दावा का उपयोग कर सकते हैं | इसके लिए क्यूजैलोफाप की 50 ग्राम को 750 से 800 लीटर प्रति हैक्टेयर की दर से उस समय उपयोग करें जब खरपतवार 2 से 3 पत्ती का हो जाए | तथा एमेजामेथाबेन्ज की 75 से 100 ग्राम मात्रा को 750 से 800 ली पानी में घोल बनाकर स्प्रे करें | इसका प्रयोग 4 से 8 पत्ती का होजाने पर इस दावा का स्प्रे करें |

#रोग और उनका उपचार 

फसल में कई तरह का रोग लगता है | कुछ रोग जलवायु परिवर्तन से होता है तो कुछ रोग फसल के अनुसार होता है | इन सभी को नियंत्रित करना जरुरी रहता है | जिससे उत्पादन पर किसी भी तरह का प्रभाव नहीं पड सके | इसलिए सभी रोगों की सारी जानकारी लेकर आया है |

#काले धब्बे का रोग
(अल्टनेकरया ब्लाईट) :-
यह रोग 15 से 20 प्रतिशत तक खरीफ के मौसम में हानि पहुँचा सकती है | इसकी पहचान यह है की आरम्भ में पौधों के निचले पत्तों पर हल्के काले गोल अंडाकार धब्बे बनते हैं जिनका आकार 0.2 से 5 मि.मी. तक होता है | बाद में ए धब्बे बढ़ जाते तथा पत्ते झुलस कर गीर जाते हैं | एसे पौधे कमजोर पद जाते हैं तथा फूल का आकार भी छोटा हो जाता है |

रोकथाम :- इस रोग की रोकथाम के लिए एम – 45 दावा का प्रयोग करें | 1250 से 1500 ग्राम मात्रा को प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें | इसका प्रयोग 10 दिन के अंतराल पर 2 से 3 छिड़काव बीमारी शुरू में ही करें |

#फूल गलन (हेत राट) :-
यह रोग इस फसल की प्रमुख बीमारी है | इसकी पहचान यह है की आरम्भ में फूल के पिछले भाग पर डंडी के पास हल्के भूरे रंग का धब्बा बनता है | यह धब्बा आकार में बढ़ जाता है तथा फूल को गला देता है | कभी – कभी फूल की डंडी भी गल जाती है तथा फूल टूट कर लटक जाता है | इस रोग के कारण फूलों में दाने नहीं बनते |

रोकथाम :- इस रोग की रोकथाम के लिए एम – 45 या कापर आक्सिक्लोराइड दावा का प्रयोग करें | 1250 से 1500 ग्राम दावा को प्रति हैक्टेयर की दर से फूल आने पर 15 – 15 दिन के नत्रल पर 2 छिड़काव करें |

#जड़ तथा तना गलन :-
यह बीमारी फसल में किसी भी अवस्था पर आ सकती है, परन्तु फूलों में दाने बनते समय अधिक आती है | रोग ग्रस्त पौधों की जड़ें गली तथा नर्म हो जाती है तथा तना 4 इंच से 6 इंच तक कला पद जाता है | एसे पौधे कभी – कभी जमीन के पास से टूट कर गीर जाते हैं रोग द्र्स्ट पौधे सुख जाते हैं |

रोगथाम :- इस रोग की रोथं के लिए थाइरम या केप्टान (फंफूंदनाशक) दावा का प्रयोग करें | इस दवा का 3 ग्राम/किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें | इस दावा का प्रयोग बीज बीजोपचार करें व इस रोग से बचाव के लिए भूमि में समुचित मात्रा में नमी रखें |

#झुलसा रोग :-
यह रोग लगभग सभी फसलों में होता है इस रोग से पौधे झुलस जाते हैं |

रोकथाम :- इस रोग का रोकथाम के लिए मैटालेक्सिन दवा का प्रयोग करें | इस दावा का 4 ग्राम / किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें | इस रोग की रोकथाम के लिए बीजोपचार करे व अचछे जल निकास की व्यवस्था करें | फसल चक्र अपनाएं एवं रोग ग्रस्त पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर दें |

#कीट एवं उनका नियंत्रण 

फसल को रोग के अलावा कीट से भी काफी नुकसान होता है | इसकी रोक थाम बहुत जरुरी है | इस फसल में कई तरह के कीट का प्रकोप होता है | कुछ कीट पत्ती में लगती है तो कुछ कीट तने में लगती है | इसलिए सभी कीटों की जानकारी होना जरुरी है |

#कटुआ सुंडी :-
इस रोग का लक्षण यह है कि अंकुरण के पश्चात् व बाद तक भी पौधों को जमीन की स्थ के पास से काट कर नष्ट कर देती है |

रोकथाम :- इस रोग की रोकथाम के लिए मिथाइल पैराथियान दावा का प्रयोग करें | इस दावा का 2 प्रतिशत चूर्ण 25 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर की दर से भुरकाव करें |

#पत्ते कुतरने वाली लट :-
यह कीट दो तिन प्रकार की पत्ते कुतरने वाली लटों (तम्बाकू कतर पिलर, बिहार हेयर कतर पिलर, ग्रीन कतर पिलर) का प्रयोग देखा गया है |

रोकथाम :- इस कीट की रोकथाम के लिए डायमिथोएट 30 ई.सी. का प्रयोग करें | इस दवा की 875 मिली. का प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें |

#तना फली छेदक :-
इस कीट की सुंडिया कोमल पत्तों को काटकर व फूलों में छेड़ करके खा जाती है |

रोकथाम :- इस कीट की रोकथाम के लिए मोनोक्रोतोफास 36 डब्लू.एस.सी. का प्रयोग करें | इस दवा को एक लीटर को प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें |

#कटाई गहाई एवं आय व्यय 

कटाई :- 
फसल में पौध पककर पीले रंग में बदलने लगते है तब कटाई करना चाहिए |
सूरजमुखी की फ्लेटें एक साथ नहीं पकती है अत: यह सावधानी रखना चाहिए की परिपक्क फ्लेटें ही कटी जाए |
फ्लेटों को खेत में सुखाने के लिए 5 से 6 दिन के लिए छोड़ देना चाहिए | जिससे फ्लेटों की अतरिक्त नमी सुख जाए |
यह क्रिया गहाई में सहायक है |

#गहाई :-

गहाई साफ जमीन पर की जाती है |
सूखे फूलों को लाठी से पीटकर या दो फूलों को आपस में रगड कर गहाई की जा सकती है | यदि फसल ज्यादा हो तो थ्रेसर की सहयता ली जा सकती है | बीजों को सुपे से फटककर साफकर धूप में सुखा लें |

#उपज
इस फसल की उपज इसकी प्रजातियों पर भी निर्भर करता है | देरी से पकने वाली 8 से 10 किवंटल/हैक्टेयर एवं मध्यम 15 से 20 किवंटल / हैक्टेयर उत्पादन है |

मक्के से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें




01)  मक्के का वैज्ञानिक नाम "जिया मेज" है।

02) मक्का "पोएसी" कुल का पौधा है।

03) मक्का में 16% #प्रोटीन पाया जाता हैं

04) मक्का में 78.9% #कार्बोहाइड्रेड पाया जाता है ।

05) विश्व में सबसे ज्यादा मक्का की खेती यू. एस. ए. में की जाती हैं।

06) भारत में मक्का 6.6 मिलियन हैक्टेयर भूमि पर की जाती हैं।

07) मक्के की कहे क्षे० के हिसाब से #यूपी में होता हैं

08) भारत में मक्का का कुल उत्पादन 12 मिलियन टन होता हैं।

09) यूपी के #फ़ैजाबाद मंडल में सबसे ज्यादा क्षे० में मक्का की खेती हिती है।

10) यूपी के #बहराइच जिले में मक्के का उत्पादन सबसे ज्यादा होता हैं।

11) मक्का #ग्रीष्मकालीन फसल है।

12) मक्का की समुद्र तल से 3000 मी0 ऊँचाई तक उगाया जा सकता है।

13) मक्का की सभी अवस्थाओं #तापमान 25℃ के आसपास होना चाहिए।

14) मक्का की #वृद्धि के समय 60 - 70% आपेक्षित आद्रता होनी चाहिये।

15) मक्का के अच्छे अंकुरण के लिए 18℃ से कम तापमान नही होना चाहिये।

16) मक्के की अच्छी पैदावार के लिए उपजाऊ दोमट मिटटी सर्वोत्तम होती हैं।

17) मक्के की खेती के लिए मृदा का पीएच मान 6 से 7 तक होनी चाहिये।

18) संकर। मक्का की बुआई के लिए 20 से 25 किग्रा/है० बीज की आवश्यकता होती हैं।

19) संकुल मक्के की बीज दर 16 से 18 किग्रा प्रति हेक्टेयर होती हैं।

20) चारे के लिए मक्के की बीज दर 40 से 45Kg प्रति हैक्टेयर होती हैं।

21) मक्के की बुआई 3.5 - 5.0 सेमि० की गहराई पर करनी चाहिए।

22) मक्के की प्रति हैक्टेयर पौधों की लगभग संख्या 75000 होती हैं।

23) मक्के की बुआई के समय पौध अंतरण 60×25 सेमी० रखनी चाहिए।

24) मक्के की देशी प्रजातियों की बुआई के समय बीज अन्तरण 45×20 सेमी० रखनी चाहिए।

25) उत्तरी भारत में मक्के की बुआई 15 जून से जुलाई के प्रारंभ तक करते हैं।

26) संकर मक्का में एन० पी० के० की प्रति हैक्टेयर मात्रा 120, 60, 60 किग्रा० देना चाहिए।

27) संकुल मक्का में N.P.K. की कुल मात्रा 80, 40, 40 किग्रा/हैक्टेयर की दर से देनी चाहिए।

28) मक्के की देशी प्रजातियों में NPK की कुल मात्रा 60, 30, 30 kg/है० की दर से देनी चाहिए।

29) चारे के लिए बोई गई मक्के की फसल 60 से 65 दिनों में तैयार हो जाती हैं।

30) दाने के लिए एक बोई जाने वाली मक्का की देशी किस्मे 75 से 80 दिनों में तैयार हो जाती हैं।

31) मक्के की संकर प्रजाति 100 से 105 दिनों में तैयार हो जाती हैं।

32) मक्का की संकुल प्रजातियां 80 से 85 दिनों में तैयार हो जाती हैं।

33) मक्के के दानों में नमी की मात्रा 25% रह जाने पर ही मक्के की कटाई करनी चाहिए।

34) मक्के में नमी की मात्रा 15% रहने पर ही मक्के की मड़ाई करनी चाहिए।

35) मक्के के देशी किस्मो की कुल उपज क्षमता 10 से 15 कुंतल प्रति हैक्टेयर होती हैं।

36) मक्के के संकर किस्मो की कुल उपज क्षमता 40 से 45 कुंतल प्रति हैक्टेयर होती हैं।

37) मक्के के संकुल किस्मो की कुल उपज क्षमता 35 से 40 कुंतल प्रति हैक्टेयर होती हैं।

38) भुट्टे के लिए उगाई जाने वाली फसल से औसतन 5075 भुट्टे प्रति हैक्टेयर प्राप्त होते है।

39) चारे के लिए उगाई जाने वाली मक्के की फसल से लगभग 200 से 250 कुंतल प्रति हैक्टेयर हरा चारा प्राप्त हो जाता हैं।

सरसी (पूर्णिया): सफलता की कहानी।


सरसी गांव एक छोटे से किसान 72 वर्षीय सदानंद सिंह ने मक्के की खेती में नई तकनीक का प्रयोग कर देश भर के
किसानों के लिए इंटर क्रॉपिंग की दिशा में नई दिशा दिखाई है. किसान सदानंद सिंह ने मक्का की खेती के बीच बंधगोभी की
उम्दा पैदावार कर कृषि विशेषज्ञों एवं क्षेत्र के सैकड़ों किसानों को अचंभित कर दिया है. यह जानकारी फैलते ही विभिन्न जिलों से बड़े- बड़े किसान एवं कृषि विश्वविद्यालय के छात्र एवं विशेषज्ञ सदानंद सिंह के प्रयोग एवं कृषि पद्धति को देखने पहुंच रहे हैं. और तकनीक की जानकारी जुटाने में लगे हुए हैं. सदानंद सिंह की खेत को देखने कृषि
कॉलेज के छात्र-छात्राएं एवं किसानों का सिलसिला जारी है. कैसे की गयी है खेती
किसान सदानंद सिंह ने बताया कि पहली बार पांच कट्ठा खेत में प्रायोगिक तौर पर मक्के के साथ बंध गोभी की खेती की. उन्होंने बताया कि मक्का बोआई से पूर्व खेत में फर्टिलाइजर आदि डाल कर मक्का का बीज बोया गया. पौधा निकलने के तुरंत बाद बंधगोभी भी बोया. उन्होंने बताया कि बंध गोभी की खेती के लिए अलग से पटवन एवं फर्टिलाइजर की आवश्यकता नहीं है. बंध गोभी के पत्ते की प्राकृतिक बनावट के कारण कभी अलग से पटवन की आवश्यकता नहीं है. स्वत: ओस या कुहासे से पत्ताें जमा पानी बंध गोभी की जड़ों में चला जाता है. जिससे पर्याप्त पानी पौधे को
मिल जाता है. उन्होंने बताया कि बंध गोभी के साथ मक्का की खेती में न तो मक्का को कोई नुकसान है और न ही बंध गोभी को.
उन्होंने बताया कि प्रति एकड़ के हिसाब से 16 हजार पौधा बंध गोभी का आता है जिसमें अनुमानित खर्च 10722 रुपये आता है. मक्के के फसल के बीच बंध गोभी की खेती कर किसान प्रति एकड़ लगभग 80000 (अस्सी हजार) तक अतिरिक्त मुनाफा कमा सकते हैं. इससे मक्का की खेती में लगाया गया लागत फसल करने से पूर्व ऊपर हो सकता है. छोड़ दी थी पोस्टमास्टर की नौकरी : 72 वर्षीय किसान सदानंद सिंह ने बताया कि 75 के दशक में वे पोस्टमास्टर की नौकरी छोड़ कृषि के क्षेत्र में अपना कैरियर बनाने में जुट गये. उन्होंने बताया कि वे लगातार मक्का, गेहूं, धान, पटसन एवं गन्ना की खेती करते आ रहे हैं. वर्ष 2011 में मक्का की खेती को देखने अमेरिका से कृषि वैज्ञानिक पहुंचे थे. इससे पूर्व बनमनखी चीनी मील की तरफ से गन्ना की बेहतर पैदावार के लिए भी पुरस्कृत किये जा चुके हैं. उन्होंने बताया कि कृषि के ही
बदौलत अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिला पाया उनका एक पुत्र सेंट्रल स्कूल में शिक्षक तथा दूसरे पुत्र पशु चिकित्सक है तथा सबसे छोटा पुत्र फौज में कार्यरत है. इसके बावजूद किसान सदानंद सिंह का हौसला खेती के प्रति कम नहीं हुआ है. वे आज भी बेहतर से बेहतर कृषि करने की दिशा में पूरी गंभीरता से प्रयास कर रहे हैं. कृषि की तकनीक समझने आये किसानों ने की तारीफ
मक्का के साथ बंध गोभी की खेती की तकनीक जानने बनमनखी से पहुंचे किसान अजय सिंह, कटिहार से पहुंचे राजू चौधरी, मधेपुरा से पहुंचे डब्लू यादव, बिहारीगंज से पहुंचे जवाहर मंडल, भागलपुर से पहुंचे किसान डा हलधर, विकास मंडल, भूपेंद्र मंडल, रामदेव यादव आदि समेत विभिन्न
जिला से पहुंचे किसानों ने उनके द्वारा अपनाये गये तकनीक की जम कर तारीफ की. किसानों ने बताया कि वे इस प्रकार की तकनीक का प्रयोग अपने-अपने खेतों में भी करेंगे. सफल होने पर बड़े पैमाने पर वे इस
तरह की खेती करेंगे. बाहर से पहुंचे तमाम किसान उनकी खेती देख अचंभित थे.
सरकारी स्तर से नहीं मिल रहा लाभ : किसान सदानंद सिंह का कहना है कि कृषि के लिए उन्हें सरकारी स्तर से कोई लाभ नहीं
मिलता है. यहां तक की समय-समय पर उन्हें खाद एवं बीजों के लिए यत्र- तत्र भटकना पड़ता है. उनका कहना है कि वे बार-बार फसलों को बेच कर ही अगली खेती करते हैं. उनका कहना है कि कृषि संबंधी योजनाएं तथा उनका लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पा रहा है जिसके कारण
क्षेत्र के किसान धन के अभाव में कृषि से अभिमुख हो रहे हैं.

मुंग की खेती की संपूर्ण जानकार



मूंग दलहन फसलों में काफी अहम मानी जाती है. इसकी दाल को छिल्के के साथ और बिना छिलके के खाया जाता है. मूंग की दाल के अंदर 25 प्रतिशत प्रोटीन और 60 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है. इस कारण ये मनुष्य के लिए बहुत उपयुक्त होती है. मूंग की दाल का रंग हरा होता है. इसकी फलियों को कच्चे रूप में भी खाया जाता है. लेकिन पकने के बाद इसे कई तरह से खाने में इस्तेमाल करते हैं.
वर्तमान में इसकी सबसे ज्यादा पैदावार राजस्थान में की जा रही है. क्योंकि राजस्थान की जलवायु इसकी खेती के लिए उपयुक्त होती है. राजस्थान के अलावा इसे हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात में भी बड़े पैमाने पर उगाया जाता है.
मूंग दलहन फसलों में काफी अहम मानी जाती है. इसकी दाल को छिल्के के साथ और बिना छिलके के खाया जाता है. मूंग की दाल के अंदर 25 प्रतिशत प्रोटीन और 60 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है. इस कारण ये मनुष्य के लिए बहुत उपयुक्त होती है. मूंग की दाल का रंग हरा होता है. इसकी फलियों को कच्चे रूप में भी खाया जाता है. लेकिन पकने के बाद इसे कई तरह से खाने में इस्तेमाल करते हैं.
मुंग की खेती ज्यादातर खरीफ के मौसम में की जाती है. जिसके लिए बलुई मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है. इसके पौधों को सामान्य बारिश की जरूरत होती है. लेकिन फलियों के पकने के दौरान होने वाली बारिश इसकी पैदावार को अधिक नुक्सान पहुँचाती है. फलियों के पकने के दौरान बारिश के होने पर फली फट जाती हैं. मूंग की खेती के लिए जमीन का पी.एच. मान सामान्य होना चाहिए.


#उपयुक्त मिट्टी
मूंग की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है. बलुई दोमट मिट्टी के अलावा इसे और भी कई तरह की मिट्टी में उचित देखरेख कर आसानी से उगाया जा सकता है. इसके लिए मिट्टी में पानी का भराव नहीं होना चाहिए. क्योंकि मिट्टी में पानी का भराव होने पर पौधा जल्द खराब हो जाता है. इसकी खेती के लिए मिट्टी का पी.एच. मान 6 से 7.5 तक होना चाहिए
#जलवायु और तापमान
मूंग की खेती के लिए किसी ख़ास जलवायु की जरूरत नही होती. भारत वर्ष में इसे खरीफ और रबी दोनों मौसम में उगाया जाता है. उत्तर भारत में इसकी खेती खरीफ और जायद के मौसम में की जाती है तो दक्षिण भारत में इसकी खेती रबी के मौसम में की जाती है. इसके पौधे को अधिक बारिश की जरूरत भी नही होती.
इसकी खेती के लिए सामान्य तापमान की जरूरत होती है. सामान्य तापमान पर इसके पौधे अच्छी पैदावार देते हैं. इसके पौधे 40 डिग्री तापमान को भी सहन कर लेते हैं. लेकिन पौधों पर फूल और फल बनने के दौरान अधिक तापमान उपयुक्त नही होता. क्योंकि अधिक तापमान होने पर इसके फूल ख़राब होने की संभावना बढ़ जाती है.




#उन्नत किस्में
मूंग की वर्तमान में कई तरह की उन्नत किस्में मौजूद हैं. जिन्हें उनकी पैदावार के हिसाब से तैयार किया गया है.

#आर. एम. जी. – 62
मूंग की इस किस्म को सिंचित और असिंचित दोनों जगहों पर लगाया जा सकता है. इस किस्म के पौधों पर कोण और फली छेदक रोग का प्रकोप देखने को नही मिलता. इस किस्म के पौधों की प्रति हेक्टेयर पैदावार 8 से 10 क्विंटल तक पाई जाती है. इसकी फलियों को पकने के लिए 60 से 70 दिन का वक्त लगता है. इसकी सभी फलियां एक साथ पकती है.

#आर. एम. जी. – 344
मूंग की इस किस्म को खरीफ और जायद दोनों मौसम में उगाया जा सकता है. इसके पौधे 65 से 70 दिन में कटाई के लिए पककर तैयार हो जाते हैं. इस किस्म की प्रति हेक्टेयर पैदावार 9 क्विंटल के आसपास पाई जाती है. इस किस्म को ज्यादातर सिंचित जगहों पर लगाया जाता है।

#आर. एम. एल. – 668
इस किस्म की प्रति हेक्टेयर पैदावार 8 से 9 क्विंटल तक पाई जाती है. इस किस्म के पौधे बीज रोपाई के बाद लगभग 65 से 70 दिन में कटाई के लिए पककर तैयार हो जाते हैं. जिन पर बैक्टीरियल बलाईट का प्रभाव देखने को नही मिलता. इस किस्म की पैदावार खरीफ और जायद दोनों मौसम में की जा सकती हैं.

#गंगा 8
इस किस्म की बुवाई उचित टाइम और उसमें देरी हो जाने पर की जाती है. इसकी फलियों को पकने के लिए 70 से 75 दिन का वक्त लगता है. इस किस्म की प्रति हेक्टेयर पैदावार 10 क्विंटल के आसपास देखने को मिलती है. इस किस्म के पौधों पर बैक्टीरियल बलाईट और पत्ती धब्बा रोग देखने को नही मिलता.

#जी. एम. – 4
इस किस्म के पौधे 65 दिन में कटाई के लिए पककर तैयार हो जाते हैं. इस किस्म की प्रति हेक्टेयर पैदावार 12 क्विंटल के आसपास पाई जाती है. इस किस्म की फलियां एक साथ पकती है. इनके बीजों का रंग हरा और आकार में बड़ा होता है.

#के. – 851
इस किस्म को सिंचित और असिंचित दोनों जगहों के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के बीज आकार में बड़े और चमकीले दिखाई देते हैं. इस किस्म के पौधे 70 से 80 दिनों बाद कटाई के लिए पककर तैयार हो जाते हैं. इस किस्म की प्रति हेक्टेयर पैदावार 10 क्विंटल के आसपास पाई जाती है.

#पूसा विशाल
इस किस्म को उत्तर भारत के राज्यों में गर्मियों के मौसम में उगाया जाता है. इस किस्म के पौधों पर पीली चित्ती का रोग नही पाया जाता है. इस किस्म के बीज गहरे हरे और चमकदार होते हैं. इसकी फलियों को पकने के लिए 60 से 70 दिन का वक्त लगता है. इसकी प्रति हेक्टेयर पैदावार लगभग 12 क्विंटल के आसपास पाई जाती है.

#टाइप – 44
मूंग की इस किस्म के पौधे बौने आकार के होते हैं. इसकी प्रति हेक्टेयर पैदावार 8 से 10 क्विंटल के आसपास पाई जाती है. इस किस्म के बीजों का आकर भी सामान्य और रंग गहरा हरा, चमकीला होता है. जो कटाई के लिए पककर तैयार होने में 60 से 70 दिन का वक्त लेते हैं. मूंग की इस किस्म को किसी भी मौसम में उगाया जा सकता है.

#पूसा बैशाखी
पूसा बैसाखी को टाइप – 44 के संकरण से तैयार किया गया है. इस किस्म की पत्तियां हरी जबकि तने पर कुछ गुलाबी रंग के धब्बे दिखाई देते हैं. इस किस्म के बीज सामान्य आकार के हरे चमकीले होते हैं. इस किस्म की सभी फलियां एक साथ पकती हैं. मूंग की इस किस्म को खासकर गर्मियों के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे 60 से 70 दिनों में पककर तैयार हो जाते हैं. जिनकी प्रति हेक्टेयर पैदावार 12 क्विंटल से ज्यादा पाई जाती हैं.
इनके अलावा और भी कई किस्में हैं जिन्हें लोग अलग अलग समय पर अधिक पैदावार देने के लिए उगाते हैं.



#खेत की जुताई
मूंग की खेती के लिए मिट्टी का भुरभुरा होना जरूरी होता है. इसके लिए खेत की पहली जुताई पलाऊ लगाकर करनी चाहिए. पलाऊ लगाने के बाद खेत में गोबर की खाद डालकर उसकी फिर से दो से तीन तिरछी जुताई कर खाद को मिट्टी में मिला दें. और खेत में पानी चलाकर उसका पलेव कर दें. खेत में पानी चलाने से खेत में खरपतवार निकल आती हैं. जब खेत में खरपतवार निकल आयें तब खेत में रोटावेटर चलाकर उसे समतल बना लें. रोटावेटर चलाने से खेत की मिट्टी भुरभुरी हो जाती है. भुरभुरी मिट्टी में बीजों का अंकुरण अच्छे से होता है.

#बीज बुवाई का वक्त और तरीका
बीज को खेत में उगाने से पहले उसे उपचरित कर खेत में लगाए. इसके लिए बीज को थायरम और कार्बेन्डाजिम से उपचारित कर खेत में उगाना चाहिए. या फिर प्रमाणित बीज को ही किसान भाइयों को खेतों में उगाना चाहिए. मूंग के बीजों की बुवाई अलग अलग मौसम के अनुसार की जाती है.
खरीफ के मौसम में उगाई जाने वाली किस्मों को जून से लेकर जुलाई महीने के पहले सप्ताह तक उगा देना चाहिए. जबकि जायद के मौसम में उगाई जाने वाली फसलों को मार्च से लेकर अप्रैल महीने के दूसरे सप्ताह तक उगा सकते है. मूंग की खेती में एक हेक्टेयर के लिए 10 से 12 किलो बीज काफी होता है.
मूंग के बीजों की बुवाई सहायक फसलों के रूप में भी की जाती है. सहायक फसलों के रूप में इसे परिस्थिति के अनुसार उगाया जाता है. लेकिन साधारण रूप से इसकी खेती करने के लिए इसकी उचित तरीके से बुवाई की जाती है. इसकी बुवाई मशीनों की सहायता से की जाती है. इसकी बुवाई करते वक्त दो पंक्तियों के बीच लगभग एक से सवा फिट की दूरी होनी चाहिए.  पंक्ति में प्रत्येक पौधे को 10 से 15 सेंटीमीटर की दूरी पर तीन से चार सेंटीमीटर की गहराई में उगाना चाहिए.

#उर्वरक की मात्रा
मूंग के पौधों को ज्यादा उर्वरक की जरूरत नही होती. मुंग का पौध खुद जमीन में नाइट्रोजन की पूर्ति करता है. मूंग के पौधों की जड़ों में गाठें पाई जाती है. जो जमीन में नाइट्रोजन छोड़कर जमीन की उर्वरक क्षमता को बढ़ाती हैं. लेकिन शुरुआत में इसके पौधों को उर्वरक की जरूरत होती है.

#मूंग की रोपाई से पहले खेत की जांच करवाकर उसमें आवश्यक तत्वों के आधार पर उर्वरक की उचित मात्र दें. क्योंकि अलग तरह की मिट्टी में इसके पौधे को उर्वरक की अलग अलग मात्रा की जरूरत होती है. जैसे बलुई दोमट मिट्टी में जिंक की कमी होने पर इसे जिंक सल्फेट देना चाहिए. और काली मिट्टी में सल्फर की कमी होने पर आखिरी जुताई के वक्त सल्फर का छिडकाव करना चाहिए.
मूंग की खेती के लिए शुरुआत में खेत की जुताई के वक्त 10 से 15 गाडी प्रति एकड़ के हिसाब से गोबर की पुरानी खाद खेत में डाल दें. इसके अलावा पलेव करने के बाद आखिरी जुताई के वक्त एन.पी.के. की 50 किलो मात्रा को प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में छिड़क दें. एन.पी.के. की जगह डी.ए.पी. का भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

#पौधों की सिंचाई
मूंग की पहली सिंचाई उसकी बुवाई के लगभग 20 से 25 दिन बाद कर देनी चाहिए. इसके बाद दूसरी सिंचाई 10 दिन बाद कर दे. मूंग के पौधे को चार से पांच सिंचाई की जरूरत होती है. इसकी बाकी की सिंचाई आवश्यकता के अनुसार उचित वक्त पर देनी चाहिए. इससे पौधा अच्छे से विकास करता है और पैदावार भी अधिक होती है. पौधे में फली बनने के वक्त खेत में नमी की उचित मात्रा बनाए रखने पर पैदावार अधिक मिलती है. क्योंकि नमी की वजह से फलियों में दानों का आकार और संख्या दोनों में वृद्धि होती है.
जायद के समय में उगाई जाने वाली किस्मों को सिंचाई की ज्यादा जरूरत नही होती. क्योंकि बारिश के मौसम में उगाई जाने के कारण इन्हें पानी की काफी कम आवश्यकता होती है. जायद के मौसम वाली किस्मों को शुरूआती सिंचाई की ही जरूरत होती है.

#खरपतवार नियंत्रण
मूंग के पौधों में खरपतवार नियंत्रण करने से पौधे तेज़ी से विकास करते हैं. जिससे पैदावार भी ज्यादा प्राप्त होती है. मूंग की खेती में खरपतवार नियंत्रण रासायनिक और प्राकृतिक दोनों तरीके से किया जाता है. प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण नीलाई गुड़ाई के माध्यम से किया जाता  है. मूंग के पौधों की पहली गुड़ाई पहली सिंचाई के दो से तीन बाद कर देनी चाहिए. और दूसरी गुड़ाई पहली गुड़ाई के लगभग 20 दिन बाद कर देनी चाहिए.
रासायनिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए खेत की आखिरी जुताई से पहले पेन्डीमेथलीन की 3.30 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में मिलाकर खेत में छिडकाव करना चाहिए.


#पौधों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम
मूंग के पौधे को कई तरह रोग लगते हैं. जिनसे पौधों की सुरक्षा करना जरूरी होता है. इसके लिए पौधों की देखभाल करते रहना चाहिए.

#दीमक
दलहनी फसलों में दीमक का रोग अक्सर दिखाई देता हैं. मूंग के पौधों पर दीमक का रोग किसी भी अवस्था में लग सकता है. लेकिन ये रोग पौधे की शुरुआती अवस्था में अधिक देखने को मिलता है. पौधे के अंकुरण के साथ ही दीमक पौधे को नष्ट कर देती है. इस रोग की रोकथाम के लिए क्यूनालफास की उचित मात्रा को आखिरी जुताई के वक्त खेत में छिडक दें. इसके अलावा क्लोरोपाइरीफॉस की उचित मात्रा से बीज को खेत में लगाने से पहले उपचारित कर लेना चाहिए.

#कातरा
कातरा का रोग मूंग की खेती में अक्सर देखने को मिलता है. इसका कीड़ा कई रंगों में पाया जाता है. जिसके पूरे शरीर पर रुयें (बाल ) दिखाई देते हैं. कातरे का कीड़ा पौधे के नर्म भागों को खाकर पौधे को नुक्सान पहुँचाता है. इस तरह के कीट दिखाई देने पर पौधे पर सर्फ का घोल बनाकर उसका छिडकाव कर दें. इसके अलावा क्यूनालफास का छिडकाव पौधों पर कर दें.

#फली छेदक
मूंग के पौधों पर ये रोग फली बनने के दौरान अधिक देखने को मिलता है. इस रोग का किट फली के अंदर जाकर फसल को नुक्सान पहुँचाता है. इसके कीट का रंग हरा और पीला होता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर मोनोक्रोटोफास या मैलाथियान का छिडकाव उचित मात्रा में करना चाहिए. अगर फिर भी पौधे पर इसका प्रभाव दिखाई दे तो लगभग 15 दिन बाद फिर से एक और छिडकाव कर दें.

#चित्ती जीवाणु रोग
चित्ती जीवाणु रोग पौधे पर मध्य अवस्था में ज्यादा देखने को मिलता है. इस रोग की वजह से पौधे की वृद्धि रुक जाती है. इस रोग के लगने पर पौधे के सभी कोमल भागों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर एग्रीमाइसीन या स्टेप्टोसाईक्लीन की उचित मात्रा का छिडकाव पौधों पर करना चाहिए.

#रस चूसक कीड़े
रस चूसक कीड़े पौधे को अधिक नुक्सान पहुँचाते हैं. रस चूसक कीड़े पौधे की पत्तियों का रस चूसकर उन्हें नष्ट कर देते हैं. जिससे पौधा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया नही कर पाता. इस रोग के लगने पर पौधों पर इमिडाक्लोप्रिड का छिडकाव 15 दिन के अंतराल में दो बार करना चाहिए.

#झुलसा रोग
झुलसा का रोग लगभग सभी दलहन फसलों में देखने की मिलता है. पौधों पर ये रोग ज्यादातर गर्मियों के मौसम में देखने को मिलता है. इस रोग के लगने पर पौधे की पत्तियां सिकुड़कर पीली पड़ने लगती है. और कुछ दिन बाद पत्तियां पूरी तरह से नष्ट हो जाती हैं. इस रोग के लगने पर पौधे का तना भी धीरे धीरे काला दिखाई देने लगता है. इस रोग की रोकथाम के लिए बीज को मैनकोजेब से उपचारित कर लगाना चाहिए. इसके अलावा पौधों पर मैनकोजेब का ही छिडकाव करना चाहिए.


#पती धब्बा
पौधों पर पत्ती धब्बा रोग के लगने पर पत्तियों पर छोटे गोल बेंगनी लाल रंग के धब्बे दिखाई देते हैं. जो धीरे धीरे बड़े होकर एक बड़ा धब्बा बना लेते हैं. जो बीच से सुखा हुआ नजर आता है. इस रोग की वजह से धीरे धीरे पूरा पौधा सुखने लगता है. इस रोग के लगने पर पौधों पर कार्बेन्डाजिम की उचित मात्रा को पानी में मिलकर उसका छिडकाव पौधों पर करना चाहिए. इसके अलावा बीजों की रोपाई के वक्त उन्हें कैप्टान से उपचारित कर उगाना चाहिए.

#किंकल विषाणु रोग
पौधे पर ये रोग उसकी मध्य अवस्था में ज्यादा देखने को मिलता है. इस रोग का सबसे ज्यादा असर पैदावार पर देखने को मिलता है. इस रोग की वजह से पौधे की पत्तियों का आकार विकृत हो जाता है. और पौधे पर काफी कम मात्रा में फलियों का निर्माण होता है. इस रोग के लगने पर पौधों पर डाइमिथोएट 30 ई.सी. का छिडकाव करना चाहिए. इसके अलावा अधिक प्रभाव दिखाई दे तो 15 दिन के अंतराल में मिथाइल डिमेटान 25 ई.सी. का दो बार छिडकाव करें.

#पौधे की कटाई और गहाई
मूंग की फसल लगभग 60 से 70 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाती है. इसकी फली पकने के बाद काली दिखाई देने लगती है. इस दौरान पौधों की कटाई कर लेनी चाहिए. क्योंकि अगर फली काली दिखाई देने के बाद इसे कुछ दिन नही काटते हैं तो इसकी फलियाँ पौधे पर ही फटने लगती हैं.
इसके पौधों को काटने के बाद उन्हें एक जगह एकत्रित कर उन्हें सूखा लेना चाहिए. जब फलियां अच्छी तरह से सुख जाएँ तब उन्हें मशीन की सहायता से निकलवा लेना चाहिए. इस दौरान मशीन को धरे चलाना चाहिए. क्योंकि ज्यादा तेज़ गति होने पर बीज कटने लगते हैं.

#पैदावार और लाभ
मूंग की फसल दो से तीन महीने की होती है. कम समय की फसल होने के कारण किसान भाई अपने खेतों से एक साल में तीन पैदावार ले सकता है. मूंग की प्रति हेक्टेयर पैदावार 8 से 10 क्विंटल तक पाई जाती है. जिसका बाज़ार में थोक भाव 4 हज़ार से 6 हज़ार तक पाया जाता है. इस हिसाब से किसान भाई एक बार में एक हेक्टेयर से 40 हज़ार के आसपास कमाई कर लेता है.

किसानों के लिये वरदान अरहर की धारवाहड़ विधि।



किसानों के लिये वरदान अरहर की धारवाहड़ विधि।

अरहर की धारवाहड़ विधि {रोपाई विधि} उत्पादन की दृष्टि से एक लाभकारी विधि हैं। इस तकनीक से खेती करने से उत्पादन लगभग 15-16 क्विंटल प्रति एकड़ तक ले   सकते हैं। इस विधि में कृषक भाई अरहर के बीज को 10 मई से 10 जून तक पोलीथीन की थैलियों में उपचारित कर बीज की बुवाई कर दें। पौधा तैयार करने वाली थैलियों में भुरभुरी जीवांश युक्त मिट्टी और वर्मी कम्पोस्ट, गोबर खाद एवं 2 किग्रा ट्रॉइकोडरमा, 1 किग्रा पी.एस.बी. कल्चर व 1 किग्रा राईजोबियम कल्चर मिलाकर थैलियों में भरकर छायादार स्थान में रखकर उनमें स्वस्थ्य उन्नत किस्म के 2-2 बीज की बुवाई कर दे।

बीज दर : -
एक एकड़ के लिए 1 किग्रा बीज पर्याप्त होता है। 

बीज उपचार : -
2 ग्राम रिडोमिल गोल्ड एवं 2 ग्राम क्लोरोपायरीपास से 1 किग्रा बीज को उपचारित करें ।

#किस्म : - अपने क्षेत्र अनुसार किस्मों का चुनाव करें या रिचा 2000 लगाये ।

रिचा 2000 अरहर की विशेषताएँ:-
प्रति पौधे गुच्छों में 700 - 800 फलियां एवं फलियां की लम्बाई 11 से. मी. ।
फली में दाने की संख्या 5 - 6 रंग लाल ।

बोने का समय : - 
1. धारवाहड़ विधी : - 10 मई से 10 जून 
2. वर्षा ऋतु : -15 जून - 15 जूलाई

सहफसली खेती : -
अरहर + मूंगअरहर ,उर्द 
अरहर + मक्का 

सिचांई : -
फब्बारा या हजारा से दिन में दो बार सिंचाई करें।

पौधों से पौधों की दुरी : -
3×3 फिट या 4×4 फिट ।

#लाईन से लाईन की दुरी : -
4 × 4 या 5 × 5 या 6 × 6 फिट ।

रोपाई : -
जब रोपणी 25-30 दिन की हो जाये तब तैयार खेत में रोपाई कर दी जाये।

खाद : -
अरहर का पौधा लगाने के पूर्व एक एकड़ में 2 टन वर्मी कम्पोस्ट या 4 टन गोबर खाद मिला दे ।

उर्वरक  : -

मिश्रण : - 1
Urea - 20 kg
S.S.P. - 150 kg
M.O.P. - 15 kg
Zink - 05 kg

मिश्रण : - 2
D.A.P. - 50 kg
Urea - 00 kg
M.O.P. - 15 kg
Zink - 05 kg

मिश्रण : - 3
12:32:16 - 50kg
Zink - 05 kg
प्रति एकड़ की दर से खेत में मिला दें।

नोट : - 
1) तीनों उर्वरक मिश्रण मे से कोई एक मिश्रण का उपयोग करें ।
2) D.A.P. को जिंक के साथ न मिलाये ।

रोपाई : -
पौधा रोपाई का कार्य वर्षा होने के बाद करे और रोपाई के बाद एक-एक मग पानी प्रति पौधा दो दिन तक देना चाहिए। रोपाई के 20 - 25 {1.5-2 फिट} पर पहली खुटाई व 40-45 दिन बाद पौधों की ऊपर से दुसरी खुटाई कर दे। जिससे शाखाओं में वृद्धि हो जाती है। और उत्पादन मे वृद्धि होती है।