Sunday, November 18, 2018

मूली की उन्नत खेती।


मूली, सलाद के रूप में उपयोग की जाने वाली सब्जी है। उत्पत्ति स्थान भारत तथा चीन देश माना जाता है। सम्पूर्ण देश में विशेषकर गृह उद्यानों में उगाई जाती है। मूली में गंध सल्फर तत्व के कारण होती है। इसे क्यारियों की मेड़ों पर भी उगा सकते हैं। बीज बोने के 1 माह में तैयार हो जाती है। फसल अवधि 40-70 दिनों की है। सलाद में एक प्रमुख स्थान रखने वाली मूली स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत लाभकारी, गुणकारी महत्व रखती है। साधारणतः इसे हर जगह आसानी से लगाया जा सकता है।

जलवायु
मूली अधिक तापमान के प्रति सहन शील है किन्तु सुगंध विन्यास और आकार के लिए ठंडी जलवायु कि आवश्यकता होती है अधिक तापमान के कारण जड़ें कठोर और चरपरी हो जाती है मूली कि सफल खेती के लिए 10-15 डिग्री सेल्सियस तापमान सर्वोत्तम माना गया है आज के समय में यह कहना कि मूली सिर्फ इसी मौसम में लगाई जाती है या लगाई जाना चाहिए, उचित नहीं होगा, क्योंकि मूली हमें हर मौसम व समय में उपलब्ध हो जाती है।

भूमि
मूली के उत्तम उत्पादन के लिए रेतीली दोमट और दोमट भूमि अधिक उपयुक्त रहती है मटियार भूमि मूली कि फसल उगाने के लिए अनुपयुक्त रहती है क्योंकि इस में भूमि ऐसी जड़ों का समुचित विकास नहीं हो पाता है ।बीज उत्पादन के लिए ऐसी भूमि का चुनाव करना चाहिए जिसमें पानी के निकास की उचित व्यवस्था हो एवं फसल के लिए प्रर्याप्त मात्रा में जैविक पदार्थ उपलब्द्य हो। मृदा गहराई तक हल्की, भुरभुरी व कठोर परतों से मुक्त होनी चाहिए। उसी खेत का चयन करें जिसमें पिछले एक वर्ष में बोई जाने वाली किस्म के अलावा कोई दुसरी किस्म बीज उत्पादन के लिए ना उगाई गई हो। इसकी फसल के लिए खेत सर्वोत्तम पी.एच. मान 6-7 होता है। खेत खरपतवारों व अन्य फसलों के पौद्यों से मुक्त होना चाहिए। खेत की मृदा रोगों व कीटों से मुक्त होनी चाहिए।

भूमि की तैयारी
5-6 जुताई कर खेत को तैयार किया जाए। मूली के लिए गहरी जुताई कि आवश्यकता होती है क्योंकि इसकी जड़ें भूमि में गहरी जाती है गहरी जुताई के लिए ट्रेक्टर या मिटटी पलटने वाले हल से जुताई करें इसके बाद दो बार कल्टीवेटर चलाएँ जुताई के बाद पाटा अवश्य लगाएं

उन्नत किस्म
अन्य फसलों व सब्जियों की ही तरह मूली की भरपूर पैदावार के लिए आवश्यक होता है कि कृषक भाई उन्नत जाति का चयन करें। मूली की उन्नत किस्मों में प्रमुख हैं- पूसा हिमानी, पूसा चेतवी, पूसा रेशमी, हिसार मूली नं. 1, पंजाब सफेद, रैपिड रेड, व्हाइट टिप आदि। पूसा चेतवी जहाँ मध्यम आकार की सफेद चिकनी मुलायम जड़ वाली है, वहीं यह अत्यधिक तापमान वाले समय के लिए भी अधिक उपयुक्त पाई गई है। इसी तरह पूसा रेशमी भी अधिक उपयुक्त है तथा अगेती किस्म के रूप में विशष महत्वपूर्ण है। इसी तरह अन्य किस्में भी अपना विशेष महत्व रखती हैं तथा हर जगह, हर समय लगाई जा सकती हैं।

बोने का समय
मूली साल भर उगाई जा सकती है फिर भी व्यवसायिक स्तर पर इसे मैदानों में सितम्बर से जनवरी तक और पहाड़ों में मार्च से अगस्त तक बोया जाता है साल भर मूली उगाने के मूली का प्रजातियों के अनुसार उनकी बुवाई का समय का चुनाव किया जाता है जैसे कि मूली की पूसा रश्मि पूसा हिमानी का बुवाई का समय मध्य सितम्बर है तथा जापानी सफ़ेद एवं व्हाईट आइसीकिल किस्म कि बुवाई का समय मध्य अक्टूम्बर है तथा पूसा चैत्की कि बुवाई मार्च के अंत समय में करते है तथा पूसा देशी किस्म कि बुवाई अगस्त माह के मध्य समय  ।

बीज की मात्रा
मूली की एक हैक्टेयर खेती के लिए 5-10 किग्रा बीज पर्याप्त होता है। मूली की बुवाई खेत की मेढ़ों पर की जाती है। यहाँ मेढ़ों के बीच की दूरी 45 सेमी तथा ऊँचाई 22-25 सेमी रखी जाती है। किसान भाई यह अवश्य ध्यान रखें कि मूली के बीजों का बीजोपचार अवश्य हो। इसके लिए गौमूत्र 5 ली. प्रति किग्रा बीज के हिसाब से उपयोग कर सकते हैं।

खाद एवं उर्वरक
50 क्विंटल गोबर की खाद या कम्पोस्ट, 20 किलो नीम की खली बुबाई के समय तथा 15 दिनों के पश्चात् 10 ली. गौमूत्र में 250 नीम का काड़ा, 250 ग्राम लहसुन का पेस्ट 15 ग्राम हींग मिलकर 4 दिनों तक छाया में रख दें बाद में उसे छान कर 200 ग्राम लाल मिर्च का पाउडर डाल दें ( छिड्काब करनें के 10 घंटे पहले )६० ली. पानी मिलकर तर बतर कर छिड्काब करें
रासायनिक काद की दशा में 75 किग्रा नत्रजन, 40 किग्रा फास्फोरस तथा 40 किग्रा पोटाश देना चाहिए। गोबर व गोबर कचरे से बनी कम्पोस्ट खाद खेत की तैयारी के समय ही डाल देना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा तथा पोटाश व फास्फोरस की पूरी मात्रा अंतिम जुताई में दे देना चाहिए तो लाभकारी होता है।

सिचाई
वर्षा ऋतू कि फसल में सिचाई कि कोई आवश्यकता नहीं है गर्मी वाली फसल में ४-५ दिन के अंतर से सिचाई करें जबकि सर्दी वाली फसल में १० से १५ दिन के अंतर से सिचाई करनी चाहिए ।

खरपतवार नियंत्रण
खरपतवारों के नियंत्रण के लिए खेत की 2-3 बार निराई-गुङाई करें दूसरी निराई-गुङाई करने के समय पौधों की छटनी कर दें समय पर डौली से ऊपर निकली जङों को ढक दें । साथ ही मेढ़ों पर मिट्टी भी चढ़ाते रहना चाहिए।

कीट नियंत्रण
मूली की फसल पर एफिड, सरसों की मक्खी, पत्ती काटने वाली सूँडी अधिक हानि पहुँचाती है ।

रोकथाम
इसकी रोकथाम के लिए देसी गाय का मूत्र 5 लीटर लेकर 15 ग्राम के आकार के बराबर हींग लेकर पिस कर अच्छी तरह मिलाकर घोल बनाना चाहिए प्रति 2 ली. पम्प के द्वारा तर-बतर कर छिडकाव करे ।

रोग नियंत्रण
आमतौर पर मूली की फसल पर कोई रोग नहीं लगता है कभी-कभी रतुआ का प्रकोप हो जाता है ।

रोकथाम
इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा या गोमूत्र  तम्बाकू मिलाकर पम्प के द्वारा तर-बतर कर छिडकाव करे ।

खुदाई
पूरी बड़ी मूली जब वह नरम व कोमल हो निकालें क्योंकि देरी से विशेषकर यूरोपियन टाईप कि मूली की जड़ों में पिथ बन जाता है जिसका बाजार में भाव कम मिलता है यूरोपियन किस्मों को बोने के २५-३० दिन बाद निकालना शुरू कर दें एशियाई टाईप की मूली 40-50 दिन बाद निकालना शुरू करें ।

उपज
मूली उपज भूमि की उर्वरा शक्ति उसकी उगे जाने वाली जातियों और फसल की देख-भाल पर निर्भर करती है यूरोपियन जातियों से 80-100 क्विंटल और एशियाई जातियों से 250-300 क्विंटल प्रति हे.उपज मिल जाती है।

Sunday, November 11, 2018

आलू में लगने वाले प्रमुख रोग व कीट एवं उनका प्रबंधन.



1) महू या चेंपा (Aphids)
यह गहरे हरे या काले रंग के होते है प्रौढ़ अवस्था में यह दो प्रकार के होते है पंखदार और पंख  हिन् इसके अवयस्क और प्रौढ़ दोनों ही पत्तियों और शाखाओं का रस चूसते है अधिक प्रकोप होने पर पत्तियां निचे की ओर मुड जाती है और पीली पड़कर सुख जाती है इसकी पंखदार जाती विषाणु फ़ैलाने में सहायता करती है माहुं कीट एक सर्वव्यापी व बहुभक्षी कीट है। ये रस चूसने वाले कीट की श्रेणी में आते हैं।

2) माइजस परसिकी (Myzus
persicae) व एफिस गौसिपी (Aphis gossypii) नामक मांहू आलू की फसल पर प्रत्यक्ष रूप से तो ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाते परंतु ये विषाणुओं को फैलाते हैं। रोग मुक्त बीज आलू उत्पादन में ये कीट प्रमुख बाधक हैं।

रोकथाम के उपाय
हमारे देश के गंगा के मैदानी इलाकों में ही लगभग 90 बीज % आलू की खेती की जाती है। इन क्षेत्रों में बीज आलू की फसल माहुं रहित अवधि में करनी चाहिए। बीज आलू की फसल तथा अन्य सब्जियों की फसल के बीच कम 50 मीटर की दूरी रखें। खेतों में या आसपास उगे माहुं ग्रसित पौधों, विशेषकर पीले रंग के फूल वाले
पौधो को उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए। जैसे हि प्रति 100 पत्तियों पर माहुं की संख्या 20 से ज्यादा होने लगे तो फसल के डंठलों को काट दें।

उपचार
देसी गाय का 5 लीटर मट्ठा लेकर उसमे 5 किलो नीम कि पत्ती या 2 किलोग्राम नीम कि खली या 2 किलोग्राम नीम की पत्त्ती एक बड़े मटके में 40-50 दिन भरकर तक सडा कर - सड़ने के बाद उस मिश्रण में से 5 लीटर मात्रा को 200 लीटर पानी में डालकर अच्छी तरह मिलाकर तर बतर कर प्रति एकड़ छिड़काव करे

3) कुतरा
इस किट कि सुंडिया आलू के पौधों और शाखाओं और उगते हुए कंदों को काट देती है बाद कि अवस्था में इसकी सुंडी आलुओं में छेद कर देती है जिससे कंदों का बाजार भाव कम हो जाता है यह किट रात में फसल को क्षति पहुंचाती है .

उपचार
10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ की पत्ती 2किलो नीम की पत्ती 2किलो बेसरम की पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे .

4) व्हाईटगर्ब
इसे कुरमुला कि संज्ञा भी दी जाती है जो सफ़ेद या सलेटी रंग कि होती है इसका शरीर मुडा हुआ और सर भूरे रंग का होता है यह जमीन के अन्दर रहकर पौधों कि जड़ो को क्षति पहुंचता है इसके अतिरिक्त आलू में छिद्र कर देती है जिसके कारण आलू का बाजार भाव कम हो जाता है .

उपचार
10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ कि पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे .

5) एपिलेकना
यह छोटा , पीलापन लिए हुए भूरे रंग का किट है इसक पीठ का भाग उठा हुआ होता है जिस पर काफी बिंदिया पाई जाती है अवयस्क और प्रौढ़ किट दोनों ही क्षति पहुंचे है पौधों कि पत्तियों को किट इस के बच्चे धीरे धीरे खुरच कर खा जाते है और पत्तियां सुख जाती है .

उपचार
10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ की पत्ती 2किलो नीम की पत्ती 2किलो बेसरम की पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे

रोग एवं उपचार

1) अगेतीअंगमारी
यह रोग आल्तेरनेरिया सोलेनाई नामक फफूंदी के कारण लगता है उत्तरी भारत में इस रोग का आक्रमण शरद ऋतू के फसल पर नवम्बर में और बसंत कालीन फसल में फरवरी में होता है यह रोग कंद निर्माण से पहले ही लग सकता है निचे वाली पत्तियों पर सबसे पहले प्रकोप होता है जंहा से रोग बाद में ऊपर कि ओर बढ़ता है पत्तियों पर छोट छोटे गोल अंडाकार या कोणीय धब्बे बन जाते है जो भूरे रंग के होते है ये धब्बे सूखे एवं चटकने वाले होते है बाद में धब्बे के आकार में बृद्धि हो जाती है जो पूरी पत्ती को ढक लेती है रोगी पौधा मर जाता है .

उपचार
10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ की पत्ती 2किलो नीम की पत्ती 2किलो बेसरम की पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे

2) पछेती अंगमारी
यह रोग फाइटो पथोरा इन्फैस्तैन्स नामक फफूंदी के द्वारा होता है इस रोग में पत्तियों कि शिराओं , तानो डंठलो पर छोटे भूरे रंग के धब्बे उभर आते है जो बाद में काले पड़ जाते है और पौधे के भूरे भाग गल सड़ जाते है रोकथाम में देरी होने पर आलू के कंद भूरे बैगनी रंग में परवर्तित होने के उपरांत गलने शुरू हो जाते है .

उपचार
10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ की पत्ती 2किलो नीम की पत्ती 2किलो बेसरम की पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे 500 ग्राम लहसुन और 500 ग्राम तीखी चटपटी हरी मिर्चलेकर बारीक़ पीसकर 200 लीटर पानी में घोलकर थोडा सा शैम्पू झाग के लिए मिलाकर तर बतर कर अच्छी तरह छिड़काव प्रति एकड़ करे .

3) काली रुसी ब्लैक स्कर्फ
यह रोग राइजोक्टोनिया सोलेनाई नामक फफूंदी के कारण होता है इस रोग का आक्रमण मैदानी या पर्वतीय क्षेत्र में होता है रोगी कंदों प़र चाकलेटी रंग के उठे हुए धब्बो का निर्माण हो जाता है जो धोने से साफ नहीं होते है है इस फफूंदी का प्रकोप बुवाई के बाद आरम्भ होता है जिससे कंद मर जाते है और पौधे दूर दूर दिखाई पड़ते है .

उपचार
10 लीटर देसी गाय का गोमूत्र में 2 किलो अकौआ की पत्ती 2किलो नीम की पत्ती 2किलो बेसरम की पत्ती मिलाकर 10-15 दिन तक सड़ाकर इस मूत्र को आधा शेष बचने तक उबालकर फिर इसके लीटर 1 मिश्रण को 200 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर कर पम्प द्वारा प्रति एकड़ छिड़काव करे भूमि जनित बीमारी जड़ सडन रोग , दीमक आदि के लिए अरंडी कि खली
और नीम खाद अपने खेतो में प्रयोग करें।

जड़ युक्त सब्जियों की जैविक खेती।


हमारे जीवन में हरी पत्तेदार व जड़ वाली सब्जियों का महत्व है। जिसमें शलजम, मूली, गाजर,  अरबी, कमल आदि अति आवश्यक है, जिसका अनुमान हम इस तथ्य से स्पष्ट कर सकते हैं कि विश्व में लगभग 46 करोड़ लोग कुपोषण के शिकार हैं। भारत में कुल जनसंख्या का बहुत बड़ा हिस्सा, विशेषकर महिलाए तथा बच्चे कुपोषण से ग्रस्त हैं, जिसका मुख्य कारण आहार में कम सब्जियों का उपयोग होना है। आहार विशेषज्ञों के अनुसार संतुलित आहार में प्रतिदिन मनुष्य को 285 ग्राम सब्जिया लेनी चाहिए, जिसमें 100 ग्राम जड़ व कन्दीय सब्जिया, 115 ग्राम पत्तेदार सब्जिया एवं 75 ग्राम अन्य सब्जिया होनी चाहिए।
जड़ वाली सब्जियों में विभिन्न प्रकार के विटामिन ए, एस्कार्बिक अम्ल, लोहा, कैल्शियम, फास्फोरस, पोटेशियम तथा अमीनों अम्ल की पूर्ति होती है। साथ ही हम कुपोषण की समस्या से मुक्त हो सकते हैं तथा शारीरिक व मानसिक कमजोरी/अस्वस्थता को भी दूर कर सकते हैं विभिन्न प्रकार की सब्जियों में पेट के विकार को दूर करने की क्षमता के साथ-साथ भोजन को पचाने की शक्ति भी होती है। फसल उत्पादन के लिए रासायनिक उर्वरकों के लगातार व ज्यादा मात्रा में प्रयोग करने पर मृदा की उत्पादकता, उर्वरता, शक्ति एवं सब्जियों की गुणवत्ता व भंडारण क्षमता में गिरावट आ रही है। इसका कारण यह है कि जड़ वाली सब्जियों व अन्य खाद्य पदार्थों को उगाने में नत्रजन का प्रयोग सर्वाधिक होता है। ज्यादा नाइट्रेट उर्वरकों के प्रयोग से मृदा एवं भूमिगत जल लगातार प्रदूषित हो रहे हैं, जो मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत
हानिकारक है। अतः कार्बनिक खादों के प्रयोग से मृदा की उर्वरता व उत्पादन के टिकाऊपन को बढ़ाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त कार्बनिक खादों का मूल्य कम होता है, किन्तु उत्पादन का मूल्य अधिक मिलता है। अतः इनके इस्तेमाल से कम लागत पर जड़ वाली सब्जिया उगाई जा सकती हैं तथा सब्जियों की गुणवत्ता अधिक उत्पादन एवं भूमि की उर्वरकता को बनाए रखा जा सकता है। कार्बनिक खादों को जड़ वाली सब्जियों में बुवाई या रोपाई के 10-15 दिन पूर्व प्रयोग करना चाहिए। कार्बनिक खाद अच्छे से तैयार होना चाहिए, अन्यथा कीट एवं व्याधियों को आश्रय प्रदान करती है। कार्बनिक खेती में जैविक उर्वरकों जैसे एजोस्पाइरिलम, एजोटोबैक्टर, राइजोबियम, फाॅस्फेट, बायोजाइम (दानेदार एवं तरल), घुलनशील बनाने वाले सूक्ष्म जीव, वैस्कुलर आरवेस्कुलर कवक आदि के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाता है। इसके
उपयोग से गुणवत्ता अधिक उत्पादन होने के साथ-साथ हानिकारक रसायनिक उर्वरकों की मात्रा में भी कटौती की जानी चाहिए।